गुरुवार, 22 जुलाई 2021

आँख से आँसू नहीं शोला निकलना चाहिए

 है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए !

जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए !!


रोज़ जो चेहरे बदलते हैं लिबासों की तरह,
अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए !

अब भी कुछ लोगों ने बेची नही अपनी आत्मा,
ये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए !

फूल बन कर जो जिया वो यहाँ मसला गया,
जीस्त को फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिए !!

छीनता हो जब तुम्हारा हक़ कोई उस वक़्त तो,
आँख से आँसू नहीं शोला निकलना चाहिए !

दिल जवां, सपने जवाँ, मौसम जवाँ, शब् भी जवाँ,
तुझसे मिलने के लिए मुझे और क्या कुछ चाहिए !!

"नजर का आपरेशन तो सम्भव है, पर नजरिये का नही..!

 एक छोटा सा बच्चा अपने दोनों हाथों में एक एक एप्पल लेकर खड़ा था

.
उसके पापा ने मुस्कराते हुए कहा कि
"बेटा एक एप्पल मुझे दे दो"
.
इतना सुनते ही उस बच्चे ने एक एप्पल को दांतो से कुतर लिया.
.
उसके पापा कुछ बोल पाते उसके पहले ही उसने अपने दूसरे एप्पल को भी दांतों से कुतर लिया
अपने छोटे से बेटे की इस हरकत को देखकर बाप ठगा सा रह गया और उसके चेहरे पर मुस्कान गायब हो गई थी...😡😢
.
तभी उसके बेटे ने अपने नन्हे हाथ आगे की ओर बढाते हुए पापा को कहा....
"पापा ये लो.. ये वाला ज्यादा मीठा है.
शायद हम कभी कभी पूरी बात जाने बिना निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं..
.किसी ने क्या खूब लिखा है:
"नजर का आपरेशन
तो सम्भव है,
पर नजरिये का नही..!"
फर्क सिर्फ सोच का
होता है.....
वरना , वही सीढ़ियां ऊपर भी जाती है ,और नीचे भी आती है!


गुरु पूर्णिमा पर देश के विद्द्वत जनों को नमन …!
सभी' दर्शनों' मतों और सभ्यताओं पर सरसरी नज़र डालने से ही स्पष्ट परिलक्षित होने लगता है कि दुनिया के तमाम धर्म-मजहब और पंथ किसी न किसी प्राचीन कबीले या सभ्यमानव समूह द्वारा तत्कालीन दौर की आवश्यकताओं के मद्देनजर स्थापित किये गए जाते रहे होंगे . कबीलों के मुखिया या उस कबीले में उपलब्ध आध्यत्मिक चेता और उदात्त चरित्र के जिन व्यक्तियों ने अपने पूर्वजों के सार्थक अनुभवों को अपनी तात्कालिक -लौकिक -पारलौकिक और सामूहिक जिजीविषा के अनुभवों को कबीले के कल्यार्थ संहिताबद्द किया होगा वे 'गुरु' कहलाये ,और उनके जिन उत्तर्वर्तियों ने इस मानवीय विधा को सातत्य प्रदान किया होगा वे 'शिष्य' कहलाने लगे . याने गुरु शिष्य परम्परा का प्राकट्य सार्वभौम और सर्वकालिक है . भारत में यह परम्परा 'वेदों ' से ही प्रारम्भ हो चुकी थी . उपनिषद कल में यह'गुरु-शिष्य 'परम्परा परवान चढ़ी और आज तक बरकरार है .
'भारत'में आषाढ़ की पूर्णिमा को 'गुरु पूर्णिमा ' के रूप में मनाया जाता है . यह महर्षि व्यास की पूजा -अर्चना के लिए भी सुविदित है . मैंने ' भारत ' की जगह हिन्दू' जानबूझकर नहीं लिखा, क्योंकि 'हिन्दू' शब्द की उत्पत्ति अर्वाचीन है और यह संज्ञा सूचक नाम समस्त भारतीयों के लिए था , जिसे पश्चिम एशिया से आये यायावरों या हमलावरों और खास तौर से तुर्कों और फारसियों ने दिया था . जबकि 'गुरु पूर्णिमा ' के मनाये जाने की परम्परा पांच हजार साल से भी ज्यादा पुरानी है . जैसा कि जर्मन दार्शनिक मक्स्मूलर ने निर्धारित किया है कि दुनिया का सबसे प्राचीन ग्रंथ ' ऋग्वेद ' है और चूँकि इस में उपलब्ध मन्त्रों के 'मंत्रदृष्टा ' ऋषियों ' को ही कालान्तर में 'गुरु ' माना गया है . चूँकि महर्षि वेद व्यास ने चारों वेदों , अठारह पुराणों,सेकड़ों उपनिषदों,आरण्यकों और ब्राह्मण ग्रंथों का पुन्रसम्पादन किया था और वे श्रीमद्भागवत-पुराण तथा 'महाभारत ' के रचनाकार थे अतएव उनकी विराट शिष्य मण्डली ने उनकी विराट' साहित्यिक धरोहर ' को अक्षुण बनाए रखने के लिए 'गुरु -शिष्य ' परम्परा को सुध्रुढ़ बनाया . उन्हें पांडवों के वंशजों का राज्याश्रय प्राप्त था और उनके महान क्रन्तिकारी तपोनिष्ठ पुत्र 'शुकदेव ' का मार्ग दर्शन प्राप्त था .
भारत में वैदिक वाङ्ग्य्मय के अलावा अधिकांस धार्मिक ,आध्यात्मिक और दार्शनिक साहित्य का सृजन गैर ब्राह्मण कवियों ,संतों ,ऋषियों और समाज सुधारकों ने ही किया है . ऋषि नारद दासी पुत्र थे जिन्होंने 'नारद संहिता ' की रचना की थी . महर्षि बाल्मीकि अपनी जवानी के दिनों में 'रत्नाकर डाकू ' थे जो ' मरा-मरा ' के कहते -कहते ' कविकुल गुरु ' हो गए . ऋषि अगस्त , विश्वामित्र ,जाबाली और काग्भुसुंड में से कोई भी ब्राह्मण नहीं था किन्तु ये तमाम 'गुरु जन ' समस्त भारत की जनता के न केवल पथ प्रदर्शक अपितु वन्दनीय भी थे और आज भी है . महर्षि वेद व्यास की माँ 'सत्यवती' एक मछुआरे की बेटी थी जो कुँआरे में ही
' पराशर ' के पुत्र की माता बनी थी . पराशर भी ब्राह्मण नहीं थे वे शैव मत के अनुयाई होकर 'वाम मार्गी' थे जो कि'कन्या पूजन ' के लिए कुख्यात थे . ब्राह्मण या वैष्णव परम्परा और दर्शन तो इस अघोरपंथी कर्मकांड के विरुद्ध था. अतः यह बहुत स्पष्ट है कि महर्षि वेद व्यास 'ब्राह्मण' कतई नहीं थे . भले ही उनका समग्र ज्ञान भण्डार किसी को ब्राम्हण वादी लगता हो किन्तु यह तथ्यान्वेषण अकाट्य है . जिस पुस्तक को लोग ब्राम्हण वादी कहा करते हैं ,जिसे लेकर आधनिक समाज में भी अलगाव की कोशिशें की जातीं रहीं हैं, जो 'मनु स्मृति ' के नाम से प्रसिद्ध है , उसके रचनाकार और उद्घाटक'स्वायम्भुव मनु ' इक्ष्वाकु वंश केप्रतापी क्षत्रिय राजा थे जिनकी रानी 'शतरूपा थी . उन्होंने अपनी रचना में तत्कालीन'भारतीय ' समाज के लिए कुछ दिशा निर्देश और आचार-विचार संपादित किये थे . जो अधिसंख्य भारतीय यथावत पालन करते चले जा रहे हैं . इस पुस्तक को भले ही ब्राह्मण वादी कहा जाता है किन्तु यह किसी ब्राह्मण की कृति नहीं है . भारतीय [हिन्दू ] परम्परा में मनु को भी ऋषि तुल्य याने'गुरु ' माना गया है .
भारतीय स्थापित मूल्यों को जाने बिना ही कुछ लोग भारत के 'संत साहित्य ' या कहें भारतीय दर्शन से प्रेरित मेथोलाजी ' में विद्द्य्मान 'अप्रिय ' प्रशंगों और मान्यताओं को ब्राह्मण वादी बताकर उस सत्य को भी ध्वस्त करते आये हैं जो अधिकांस गैर ब्राह्मणों द्वारा ही स्थापित किये गए हैं . कुछ लोग कबीर को शायद इसलिए मुफीद मानते हैं कि वे हिन्दू-मुसलमान दोनों की खिल्ली उड़ाते थे . कबीर ने तत्कालीन समाज की कुरीतियों और शोषण कारी ताकतों का मान मर्दन किया है , वे वेदों और कुरआन का भी सम्मान नहीं करते थे क्योंकि वे पढ़े -लिखे नहीं थे और वेद तो क्या वे 'गायत्री मन्त्र ' भी नहीं पढ़ सकते थे . चूँकि वे सभ्रात्न्त वर्ग से इतर अधिसंख्य जनता के जैसे थे और उसी की भाषा में बात करते थे अतएव जन-मानस में छा गए . घोर ब्राह्मण विरोधी कबीर ने भी अपना 'गुरु ' बनाया और ब्राह्मण को ही बनाया और जिद से धोखे सेगंगा घाट पर रात के अँधेरे में सीढ़ियों पर लेटकर ,स्वामी रामानन्द' के पैरों की ठोकर खाकर कबीर ने दीक्षा ली' . रामानंद के मुख से निकले शब्द 'राम-राम' को ही तो कबीर ने आजीवन गुरु माना .कबीर ने 'गुरु' को भगवान् से भी बड़ा बताया है ;-
गुरु गोविन्द दोउ खड़े ,काके लागुन पाय ;
बलिहारी गुरु आपकी , गोविन्द दियो मिलाय . .
जो लोग कबीर को जनवादी ,प्रगतिशील मानकर उन्हें चने के झाड पर चढ़ाकर 'वर्ण -संघर्ष ' की चेष्टा करते आये हैं उन्हें शायद ये सब मालूम ही न हो . कबीर आज दुनिया में सबसे ज्यादा लोकप्रिय 'गुरु' हैं और उनके शिष्यों की तादाद भारत में करोड़ों में है , जब 'गुरु परम्परा ' ब्राह्मण वादी है तो इसतथाकथित ब्राह्मणवादी ' परम्परा का अनुशरण क्यों किया जा रहा है ? गीता 'श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निकली और वेद व्यास ने अपने विराट ग्रन्थ' महाभारत ' के भीष्म पर्व ' में उसे यथावत उद्दृत किया है या संपादित किया है . भगवान् श्रीकृष्ण 'पिछड़े वर्ग याने 'यादव' वंश के थे और वेद व्यास 'वर्णशंकर ' समाज से थे. ये दोनों ही ब्राह्मण नहीं थे फिर क्यों लोग'भगवद गीता ' को ब्राह्मण वादी मानते हैं ?पुरातन पंथी या सामंतवादी ठप्पे के डर से हमारे प्रगतिशील साहित्यकार और विचारक भी सच लिखने और कहने से बचते हैं ,क्या कोई मार्क्सवादी गीता को पढ़े बिना बता सकता है किवो तो ब्राह्मण वादी सिद्धांतों की पोथी है ? मनुस्मृति के आद्द्योपांत पढ़े बिना ही उसके कुछ उद्धरण पेश कर उसे 'अवांछनीय ' पुस्तक करार कर दिया गया और हमारे प्रचंड क्रान्तिकारी विचारक 'हंस जैसी पत्रिकाओं में उस पर निरंतर हल्ला बोलते रहते हैं . क्या यह जातीय पक्षधरता और अन्याय नहीं है ?
ज्ञान केवल ब्राह्मणों की बपौती नहीं है और अतीत का सब कुछ जो साहित्य उपलब्ध है वो सब ब्राह्मणों के द्वारा ही नहीं रचा गया . दक्षिण भारत में ,महारष्ट्र में और आंध्र में अनेकों सुप्रसिद्ध विचारक ,संत कवि और साहित्य कार हुए हैं जो ब्राह्मण नहीं थे किन्तु वेदों ,पुराणों , रामायण , महाभारत पर उनकी टीकाएँ संसार भर में प्रसिद्ध हैं . वेशक आज भारत में जो कुछ भी मानवीय है ,प्रगतिशील है वह निसंदेह प्रजातंत्र के रूप में सर्वमान्य है और यह भारत में फ्रांसीसी क्रांति ,अमेरिकन क्रांति और ब्रिटेन की पूँजीवादी क्रांति का 'सारतत्व ' है . लेकिन इसके कुछ नैतिक और राजनैतिक मूल्य मध्ययुगीन भारत में 'बौद्ध और जैन ' युग से पूर्व 'महाजनपदों ' के रूप में विद्द्य्मान थे. इन नए पंथों के आगमन के बाद भारत 'अहिंसा' की 'अँधेरी सुरंग में चल पड़ा और जब बाहर निकला तो देखा की वो तो गुलाम हो चूका है . भारतीय इतिहास की इन भयंकर भूलों पर किसी का ध्यान शायद न गया हो किन्तु अंग्रेजों को ये सब मालूम था अतएव भारत की जनता को बाँटने-लड़ाने के लिए भारतीय वाङ्ग्मय-आगम-निगम - पुराणोंऔर उसके खास रक्षकों याने ब्राह्मणों को गैर ब्राह्मणों की दुर्दशा का कारण घोषित किया और हर समाज और जात से इन अंग्रेजों ने अपने बफादार तैयार भी किये . इन्ही चापलूसों को उन्होंने इस्तेमाल कर देश को बाँटने का काम किया . अंग्रेज तो बचे खुचे भारत को भी कई और टुकड़ों में बांटने के लिए प्रयासरत थे किन्तु 'महात्मा गाँधी ' और तत्कालीन धर्मनिरपेक्ष नेतत्व की बदौलत मामला शांत किया गया .
भारत में निसंदेह प्रगतिशील तत्व जर्मन ,अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा के माध्यम से ही आये . किन्तु उससे पहले भारत में फारसी और उर्दू इंकलाबी भाषा थी जिसने शहीद भगतसिंह जैसे महान क्रांतिकारियों को तराशा इन भाषाओँ के बरक्स हिन्दी और उसकी जननी 'संस्कृत ' केवल अतीत के गुणगान में लगी रही , दुनिया बहुत आगे निकल गई और भारत के 'गुरु ' केवल पाद पूजन करवाने में लगे रहे . राजनीतिग्य और विचारक अपनी प्रगतिशीलता का शौर्य दिखाने के लिए 'ब्राह्मणवाद' के काल्पनिक तराने गाते रहे . इसीलिये आज भारत की खुद की कोई राह नहीं है . पहले वो सामन्तवाद के पैरों में कुचला जाता रहा ,अभी पूँजीवाद के शिकंजे में कराहता हुआ ओउंधे मुँह पड़ा है . अब तो समाजवादी समाज और जनवादी जनतंत्र के लिए आज के गुरुओं को सोचना चाहिए .
श्रीराम तिवारी
१ ४ - डी , एस-४ स्कीम -७ ८

भारत में राष्ट्रीय चेतना का संकट:-

 भारत में राष्ट्रीय चेतना का संकट:-

भारत में हर चीज के लिये ,हर वर्ग संघर्ष कर रहा है! भाजपा अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिये निरंतर संघर्षरत है,कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिये संघर्षरत है! वामपंथ किसानों मजूरों के हितसाधन हेतु संघर्षरत है! क्षेत्रीय दल अपने-अपने नेता के माध्यम से निहित स्वार्थों के लिये संघर्षरत हैं! देश की एकता अखंडता और राष्ट्रीय चेतना के लिये किसी के पास समय नही है!हर किसी को कुछ न कुछ चाहिये, राष्ट्र को कुछ देना कोई नही चाहता!
भारत में संवैधानिक राष्ट्रवाद की चेतना के बरक्स पहली शर्त है कि देशमें भृष्टाचार मुक्त शासन व्यवस्था हो, समानता पर आधारित पक्षपातविहींन सुशासनतंत्र हो! जनता मूक दर्शक या केवल वोटर मात्र न होकर रहे!और वर्तमान धनतंत्र की जगह,शासन-प्रशासन में जन-भागीदारी का व्यवहारिक लोकतंत्र हो। इसके बिना भारत में धर्मनिर्पेक्ष समाजवादी गणतांत्रिक राष्ट्रवादकी स्थापना संभव नहीं !
'राष्ट्रवादी' चेतना के बगैर न तो पूँजीवादी लोकतंत्र की बुराइयाँ खत्म होगीं,और न ही किसी तरह की आर्थिक-सामाजिक बुराई और असमानता का खात्मा संभव है। मौजूदा दौर के निजाम और उसकी नीतियों से किसी तरह की मानवीय या समाजवादी क्रांति के होने की भी कोई उम्मीद नहीं है।
इतिहास बताता है कि दुनिया के तमाम असभ्य यायावर आक्रमणकारी और लालची मजहबी -बर्बर हत्यारे भारत को लूटने में सफल ही इसलिए हुए, क्योंकि यहाँ यूरोप की तर्ज का 'राष्ट्रवाद' नहीं था,अरबों की तरह मजहबी उन्माद नही था और मध्य एशियाई कबीलाई दरिंदों की तरह भारतीय भूभाग के मूल निवासियों में धनदौलत और युवतियों को अपहरण से बचाने की परंपरा नही थी
उनकी रक्षा के लिए या तो 'भगवान' का भरोसा था या भगवान के प्रतिनिधि के रूप में इस धरती पर राजा -महाराजा जनता के तरणतारण थे ! किसान-मजूर -कारीगर के रूप में जनता की भूमिका केवल 'राज्य की सेवा'करना था। जिन्हे यह कामधाम पसंद नहीं थी वे ''अजगर करे न चाकरी ,पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए सबके दाता राम।। ''गा -गा कर विदेशी आक्रांताओं के जुल्म -सितम को आमंत्रित करते रहे !
राष्ट्रवाद ,समाजवाद,धर्मनिरपेक्षता और क्रांति जैसे शब्दों का महत्व उस देश की जनता उस सामन्ती दौर में कैसे जान सकती थी ?जिस देश की अत्याधुनिक तकनीकी दक्ष ,एंड्रॉयड फोनधारी आधुनिक युवा पीढ़ी 'गूगल सर्च 'का सहारा लेकर भी इन शब्दों की सटीक परिभाषा नहीं लिख पाती।

यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं!

 

...

एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए, उजड़े वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये!
हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ??
यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा !
भटकते-भटकते शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज की रात बीता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे !
रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे, उस पर एक उल्लू बैठा था।
वह जोर से चिल्लाने लगा।
हंसिनी ने हंस से कहा- अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते।
ये उल्लू चिल्ला रहा है।
हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ??
ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही।
पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों की बातें सुन रहा था।
सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई, मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ करदो।
हंस ने कहा- कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद!
यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा
पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो।
हंस चौंका- उसने कहा, आपकी पत्नी ??
अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है,मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है!
उल्लू ने कहा- खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है।
दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग एकत्र हो गये।
कई गावों की जनता बैठी। पंचायत बुलाई गयी।
पंचलोग भी आ गये!
बोले- भाई किस बात का विवाद है ??
लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है!
लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे।
हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है।
इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना चाहिए!
फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों की जाँच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की ही पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है!
यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया।
उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली!
रोते- चीखते जब वह आगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई - ऐ मित्र हंस, रुको!
हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ??
पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ?
उल्लू ने कहा- नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी!
लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है!
मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है।
यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं!
शायद इतने साल की आजादी के बाद भी हमारे देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि हमने उम्मीदवार की योग्यता व गुण आदि न देखते हुए, हमेशा , ये हमारी जाति का है, ये हमारी पार्टी का है, ये हमारे एरिया का है, के आधार पर हमेशा अपना फैसला उल्लुओं के ही पक्ष में सुनाया है, देश क़ी बदहाली और दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं
देश की जनता ही जिम्मेदार है!

सिर्फ मेहनत से कामयाब होना एक मिथ है, जिसे बहुत मेहनत से खड़ा किया गया है।”

 “सिर्फ मेहनत से कामयाब होना एक मिथ है, जिसे बहुत मेहनत से खड़ा किया गया है।”

जब भी कोई दावा करे कि वह अपने मेरिट से और अपने संघर्ष से बड़ा बना/बनी है तो उस व्यक्ति का सोशल कैपिटल यानी नेटवर्क, कनेक्शन, संपर्क, पैरवी करा पाने की क्षमता, जान पहचान का दायरा ज़रूर चेक करना चाहिए।
संघर्ष के क़िस्सों के पीछे पहला मौक़ा या अमिताभ बच्चन जैसे केस में असफल होने के 17 मौक़े कैसे मिले, ये समझने की ज़रूरत है। शाहरुख खान को मुंबई में पहला मौक़ा क्यों और कैसे मिला। उसे पहला फ़्लैट रहने को किसने दिलाया?
वे मेहनती हैं। लेकिन मेहनत करने का मौक़ा उन्हें कैसे मिला? किसने दिलाया?
इन तस्वीरों में अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ खान की माताएँ तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से गपशप कर रही हैं। समझिए नेटवर्क की ताक़त।
सोशल कैपिटल के बारे में ज़्यादा जानने के लिए अपने आसपास के सफल लोगों का बैकग्राउंड चेक करें या पियरे बॉरद्यू (Bourdieu) की थीसिस - The Forms of Capitals पढ़ें।
जिन परिवारों के लोग तीन या चार पीढ़ी से अमेरिका जा रहे हैं, वे कनेक्शन के दम पर वहाँ जाते हैं और कहते हैं कि मैं अपने टैलेंट के कारण यहाँ पहुँचा हूँ। करोड़ों स्टूडेंट्स को यही नहीं पता कि GRE और GMAT क्या है। उन्हें बताएगा कौन?
कनेक्टेड परिवार के बच्चे MA के बाद PhD या विदेश जाने की सोचते हैं। कनेक्शन या आस पास ऐसे लोग न हों, तो MA का टॉपर बच्चा BEd कर लेता है। इस फ़र्क़ को समझिए कि ऐसा क्यों होता है।
आपको संपर्क विरासत में भी मिलता है। जैसे संपत्ति मिलती है। आपके संपर्कों की क्वालिटी आपके जीवन की उपलब्धियों को काफ़ी हद तक निर्धारित करती है। कल्पना कीजिए उस परिवार के वारिस की जिन्होंने 1901 की जनगणना में अपनी भाषा इंग्लिश लिखाई थी। हो पाएगा मुक़ाबला?
मैं ऐसे परिवारों को जानता हूँ जो ज़मीन बेचकर करोड़पति बने। लेकिन उन्हें पता ही नहीं कि बच्चा विदेश कैसे भेजते हैं। इन्वेस्टमेंट कैसे करते हैं। एक पीढ़ी में वे अपेक्षाकृत गरीब पर कनेक्टेड परिवारों से काफ़ी नीचे हो गए। उनके किराएदार उनसे आगे निकल गए।
संपत्ति के कई रूप है। आपकी शिक्षा, भाषा, संपर्क सब आपकी संपत्ति है। इनमें एक का इस्तेमाल आप दूसरी चीज को हासिल करने के लिए कर सकते हैं।
कनेक्शन से मिली सफलता समाज का नियम है। लाखों में एक अपवाद मिल जाएगा। लेकिन वह लाखों में एक होगा। इसी लिए ऐसी कहानियाँ छपती हैं।
फिर आप कहेंगे कि हर दो साल में एक रिक्शावाला या सब्ज़ी वाले का बच्चा IAS कैसे बन जाता है? क्योंकि ऐसा किए बिना सिस्टम टिकाऊ नहीं हो सकता। 2000 सिविल सर्वेंट में दो ऐसे क़िस्से का होना ज़रूरी है।
ज़मीन-जायदाद की ही तरह, कनेक्शन, नेटवर्किंग, सपनों की ऊँचाई, मिलने वाले मौक़े, भाषा संस्कार भी पीढ़ियों का संचय है।

मंगलवार, 20 जुलाई 2021

कनेक्शन से मिली सफलता समाज का नियम है

 सिर्फ मेहनत से कामयाब होना एक मिथ है, जिसे बहुत मेहनत से खड़ा किया गया है।”

जब भी कोई दावा करे कि वह अपने मेरिट से और अपने संघर्ष से बड़ा बना/बनी है तो उस व्यक्ति का सोशल कैपिटल यानी नेटवर्क, कनेक्शन, संपर्क, पैरवी करा पाने की क्षमता, जान पहचान का दायरा ज़रूर चेक करना चाहिए।
संघर्ष के क़िस्सों के पीछे पहला मौक़ा या अमिताभ बच्चन जैसे केस में असफल होने के 17 मौक़े कैसे मिले, ये समझने की ज़रूरत है। शाहरुख खान को मुंबई में पहला मौक़ा क्यों और कैसे मिला। उसे पहला फ़्लैट रहने को किसने दिलाया?
वे मेहनती हैं। लेकिन मेहनत करने का मौक़ा उन्हें कैसे मिला? किसने दिलाया?
इन तस्वीरों में अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ खान की माताएँ तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से गपशप कर रही हैं। समझिए नेटवर्क की ताक़त।
सोशल कैपिटल के बारे में ज़्यादा जानने के लिए अपने आसपास के सफल लोगों का बैकग्राउंड चेक करें या पियरे बॉरद्यू (Bourdieu) की थीसिस - The Forms of Capitals पढ़ें।
जिन परिवारों के लोग तीन या चार पीढ़ी से अमेरिका जा रहे हैं, वे कनेक्शन के दम पर वहाँ जाते हैं और कहते हैं कि मैं अपने टैलेंट के कारण यहाँ पहुँचा हूँ। करोड़ों स्टूडेंट्स को यही नहीं पता कि GRE और GMAT क्या है। उन्हें बताएगा कौन?
कनेक्टेड परिवार के बच्चे MA के बाद PhD या विदेश जाने की सोचते हैं। कनेक्शन या आस पास ऐसे लोग न हों, तो MA का टॉपर बच्चा BEd कर लेता है। इस फ़र्क़ को समझिए कि ऐसा क्यों होता है।
आपको संपर्क विरासत में भी मिलता है। जैसे संपत्ति मिलती है। आपके संपर्कों की क्वालिटी आपके जीवन की उपलब्धियों को काफ़ी हद तक निर्धारित करती है। कल्पना कीजिए उस परिवार के वारिस की जिन्होंने 1901 की जनगणना में अपनी भाषा इंग्लिश लिखाई थी। हो पाएगा मुक़ाबला?
मैं ऐसे परिवारों को जानता हूँ जो ज़मीन बेचकर करोड़पति बने। लेकिन उन्हें पता ही नहीं कि बच्चा विदेश कैसे भेजते हैं। इन्वेस्टमेंट कैसे करते हैं। एक पीढ़ी में वे अपेक्षाकृत गरीब पर कनेक्टेड परिवारों से काफ़ी नीचे हो गए। उनके किराएदार उनसे आगे निकल गए।
संपत्ति के कई रूप है। आपकी शिक्षा, भाषा, संपर्क सब आपकी संपत्ति है। इनमें एक का इस्तेमाल आप दूसरी चीज को हासिल करने के लिए कर सकते हैं।
कनेक्शन से मिली सफलता समाज का नियम है। लाखों में एक अपवाद मिल जाएगा। लेकिन वह लाखों में एक होगा। इसी लिए ऐसी कहानियाँ छपती हैं।
फिर आप कहेंगे कि हर दो साल में एक रिक्शावाला या सब्ज़ी वाले का बच्चा IAS कैसे बन जाता है? क्योंकि ऐसा किए बिना सिस्टम टिकाऊ नहीं हो सकता। 2000 सिविल सर्वेंट में दो ऐसे क़िस्से का होना ज़रूरी है।
ज़मीन-जायदाद की ही तरह, कनेक्शन, नेटवर्किंग, सपनों की ऊँचाई, मिलने वाले मौक़े, भाषा संस्कार भी पीढ़ियों का संचय है।

सोमवार, 19 जुलाई 2021

अहिंसा का पुजारी,

 एक बुजुर्ग अपनी ओल्ड मारुति से कहीं जा रहे थे,रास्ते में उनकी कार से एक नई नवेली *ऑडी कार* को जरा सी खरौंच लग गई !वे कुशल क्षेम पूछने के वास्ते रुक गये! तभी ऑडी कार से चार लंबे तड़ंगे दाड़ी पगड़ी कृपाणधारी नीचे उतरकर बुजुर्ग को पीटने पर उतारू हो गये!

तभी बुजुर्ग ने कहा कि आप चार हट्टे कट्टे मुस्टंडे हैं और मैं अकेला बुजुर्ग,और अहिंसा का पुजारी,यह तो सरासर नाइंसाफी है !

उन चारों पहलवानों में से जो सबसे बड़ा था,वह बोलुा -
सुरजीते और अमरजीते, तुम दोनों अंकल की तरफ हो जाओ!
बुजुर्ग बोला-किंतु तब तो हम तीन और तुम दो रह जाओगे! यह भी गलत है!
तो सबसे बड़ा सुरजीते बोला - कोई बात नही अंकलजी आप तो घर जाओ जी!
इन दोनों से-हम दोनों निपट लैंगे!

मीडीया को कांग्रेस और भाजपा से आगे कुछ नजर नही आता !

 भारतमें सत्तारूढ़ नेताओं,भ्रस्ट अफसरों और धनाड्य वर्ग द्वारा पोषित पतनशील पूँजीवादी व्यवस्था सिर्फ अभिजात्य वर्ग को रास आ रही है! लोकतांत्रिक राजनीति में जातिवर्ण,धनबल,बाहुबल,अल्पसंख्यकता इत्यादि सब मिलकर भारतीय सभ्यता, संस्क्रति और भारत राष्ट्र की अस्मिता का उपहास कर रहे हैं!

मानव सभ्यता के इतिहास में सबल मनुष्य द्वारा निर्बल मनुष्य का शोषण ,सबल समाज द्वारा निर्बल समाज का शोषण और सबल राष्ट्र द्वारा निर्वल राष्ट्र के शोषण का सिलसिला जितना पुराना है। भाई-भतीजावाद और भृष्ट तत्वों के अनैतिक संरक्षण का इतिहास भी उतना ही पुराना है।
भ्रस्टाचार का यह दस्तूर आजादी और लोकतंत्र से भी पहले से इस भूभाग पर चला आ रहा है। यह सिलसिला तो तुगलकों, खिुलजियों और सल्तनतकाल जमाने से ही चला आ रहा है ,जो मुगलकाल में परवान चढ़ा!
बाद में जब सात समंदर पार से योरोपियन व अंग्रेज पधारे तो उन्होंने भी २०० साल तक भारतीय जनता को 'क्लर्क' के लायक ही समझा। वह भी तब ,जब १८५७ की क्रांति असफल रही या विद्रोह असफल हुआ! जब महारानी विक्टोरिया हिन्दुस्तान की मलिका बनी,तब साम्राज्ञीने देशी धनिकों और कुछ देशी राजाओं को नौकरशाही में छोटे पदों पर 'सेवाओं' की इजाजत दी।
यह बात जुदा है कि अंग्रेज अपने स्वार्थ के लिये साइंस और टेक्नालॉजी लाये ! बाद में अंग्रेजों के संविधान और दुनिया भर की मशहूर सर्वहारा क्रांतियों से प्रेरणा लेकर कुछ वकीलों और बॅरिस्टरों ने देश को आजाद कराने का सपना देखा!दादाभाई, नौरौजी, एनीवैसेंट,राजा महेंद्रप्रताप, टैगोर, तिलक,गोखले,गांधी,नेहरु,पटैल,आजाद, भगतसिंह जैसे लाखों शहीदों के बलिदान से भारत आजाद हुआ!
किंतु आजादी के कुछ साल बाद कांग्रेस और उसके नेताओं ने तथा देशके चालाक सभ्रांत वर्ग ने पूंजीवादी भ्रस्ट परम्परा को परवान चढ़ाया।
जो कांग्रेस आज विपक्ष में आकर हरिश्चंद्र बन रही है। उसका अतीत बेदाग नही है !एमपी में 5 साल पहले व्यापम के खिलाफ कांग्रेस ने कोई खास आंदोलन नही किया ! हनी मनी ट्रैप कांड में कमलनाथ ने भ्रस्ट अफसरों और अय्यास मंत्रियों को भी बचा लिया!
इसी कांग्रेस के ६० सालाना दौर में आजादी के बाद वर्षों तक देशी पूंजीपतियों -भूस्वामियों और कांग्रेस के नेताओं के खानदानों को ही शिद्द्त से उपकृत किया जाता रहा है। एमपी और छग में द्वारिकाप्रसाद मिश्रा से लेकर शुक्ल बंधूओं तक ,अर्जुनसिंह से लेकर ,प्रकाश चंद सेठी तक , शिव भानु सोलंकी , सुभाष यादव और जोगी से लेकर दिग्विजयसिंह तक कोई भी उस 'अग्निपरीक्षा' में सफल होने का दावा नहीं कर सकता। जिसके लिए उन्होंने बार-बार संविधान की कसमें खाईं होंगी कि -''बिना राग द्वेष,भय, पक्षपात के अपने कर्तव्य का निर्वहन करूंगा ......." !
अब यदि मोदी युग में 'संघ परिवार' वाले और उसके अनुषंगी भाजपाई भी उसी 'भृष्टाचारी परम्परा' का शिद्द्त से निर्वाह किये जा रहे हैं ,जो परम्परा और 'कुलरीति' कांग्रेस ने बनाई है तो किसी को आश्चर्य क्यों ? सवाल किया जा सकता है कि कांग्रेस और भाजपा के भृष्टाचार में फर्क क्या है ? जो लोग कभी कांग्रेस को 'चोर' कहा करते थे वही लोग इन दिनों भाजपा को 'डाकू' कहने में जरा भी नहीं हिचकते। चोर और डाकु में जो भी फर्क है वही कांग्रेस और भाजपा का चारित्रिक अंतर है।
कुछ लोगों को इन दोनों में एक फर्क 'संघ' की हिंदुत्व वादी खंडित मानसिकता का ही दीखता है। वैसे तो कांग्रेस ने पचास साल तक पैसे वालों व जमीन्दारों को ही तवज्जो दी है। किन्तु यूपीए के दौर में वाम के प्रभाव में कुछ गरीब परस्त काम भी किये गए। यदि आज आरटीआई ,मनरेगा और मिड डे मील दुनिया में प्रशंसा पा रहे हैं तो उसका कुछ श्रेय तो अवश्य ही वामपंथ को जाता है । लेकिंन जनता को और मीडीया को कांग्रेस और भाजपा से आगे कुछ भी नजर नही आता !श्रीराम तिवारी

रविवार, 18 जुलाई 2021

स्टालिन जैसा नेतत्व चाहिये है?

 यह सच है कि भारत में *स्थाई* होने के बाद *सरकारी अधिकारी/ कर्मचारी* का रवैया बदल जाता है! इसीलिये शायद आम जनता निजीकरण के खिलाफ आक्रोश नही जता रही! गोकि चीन, जापान,जर्मनी,फ्रांस से हम टैक्नालॉजी तो ला सकते हैं,किंतु नैतिकता या अनुशासन नही!

उन लोगों में नैतिकता,राष्ट्रवाद और देश के प्रति जिम्मेदारी का रंचमात्र भाव नही जो इस मुल्क को चरागाह समझते हैं या हमेशा अपने अधिकारों की बात करते हैं,आरक्षण की बात करते हैं!
असली राष्ट्रवाद तो क्रांतिकारी और ऊँचे दर्जे के महामानवों में खुद के अंतस से ही स्वत:स्फूर्त हो सकता है!ऐंसा प्रतीत होता है कि सैकड़ों सालकी गुलामी ने कुछ भारतियों को स्थाई रूप से अनैतिक,स्वार्थी,लालची और अनुशासनविहीन बना डाला है!
सुप्रीम कोर्ट यदि कह रहा है कि कोरोना संकट काल में कावड़ यात्रा मत निकालो,तब भी देश में कई जगहों पर श्रद्धालुजन इसकी धज्जियां उड़ा रहे हैं! इयह सच है कि स्थाई होने के बाद सरकारी कर्मचारी का रवैया बदल जाता है!चीन और जापानसे तकनीक तो आ सकती है,किंतु नैतिकता या अनुशासन नही!उसी तरह दूसरे धर्म मजहब के लोग भी इस कोरोना संकट की तीसरी लहर का चोरी छिपे मजहबी इंतजाम करने पर आमादा हैं! ऐंसा आभासित हो रहा है कि भारतीय समाज को लोकतंत्र रास नही आ रहा है! क्या भारत को,इंदिरा गांधी, नेपोलियन या स्टालिन जैसा नेतत्व चाहिये है?