सोमवार, 17 जुलाई 2023

पत्नी के हाथ से बने खाने की तारीफ करो

 एक दिन मल्होत्रा जी निर्मल बाबा के पास गये और बाबा को नमन करते हुए अर्ज किया:- "बाबा कृपा नहीं हो रही है"!

निर्मल बाबा;; कभी अपनी पत्नी के हाथ से बने खाने की तारीफ की है?
मल्होत्रा;;जी नहीं!
बाबा;; अपनी पत्नी के हाथ से बने खाने की तारीफ करो, कृपा हो बरसेगी!
घर आते ही मल्होत्रा जी नें आलू के परांठे की जमकर तारीफ की "आज तो खाने का आनन्द आ गया है 20 साल में पहली बार"!!
पत्नी ने आँखें तरेरकर कहा - "20 साल में तुम्हे खाने का मजा नहीं आया और आज पड़ोसन वासी पराँठे दे गयी तो आनंद आ गया"?? छि:
मल्होत्रा जी सदमें हैं,*जय निर्मल बाबा की*
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ईश्वर का वास कैसे होगा ?

 एक सन्यासी घूमते-फिरते एक दुकान पर आये | उन्होंने दुकान में अनेक छोटे-बड़े डिब्बे रखे देखे!

*सन्यासी ने एक डिब्बे की ओर इशारा करते हुए दुकानदार से पूछा, "इसमें क्या है?"
*दुकानदार ने कहा, "इसमें नमक है।"
*सन्यासी ने फिर पूछा, "इसके पास वाले में क्या है ?"
*दुकानदार ने कहा, "इसमें हल्दी है।"
*इसी प्रकार सन्यासी पूछ्ते गए और दुकानदार बतलाता रहा।
*अंत मे पीछे रखे डिब्बे का नंबर आया! सन्यासी ने पूछा,"उस अंतिम डिब्बे में क्या है?"
*दुकानदार बोला, "उसमें श्रीकृष्ण हैं।"
*सन्यासी ने हैरान होते हुये पूछा- "श्रीकृष्ण ! भला यह "श्रीकृष्ण" किस वस्तु का नाम है? मैंने तो इस नाम के किसी सामान के बारे में कभी नहीं सुना !"
*दुकानदार सन्यासी के भोलेपन पर हंस कर बोला,"महात्मन ! बाकी डिब्बों मे तो भिन्न-भिन्न वस्तुएं भरी हुई हैं | किंतु यह डिब्बा *खाली* है| हम खाली को खाली न कहकर हम *श्रीकृष्ण* कहते हैं !"
*संन्यासी की आंखें खुली की खुली रह गई ! जिस बात के लिये मैं दर-दर भटक रहा था, वो बात मुझे आज एक व्यापारी ने समझा दी! वो सन्यासी उस छोटे से किराने के दुकानदार के चरणों में गिर पड़ा ! बुदबुदाकर बोला:- ओह ! तो *खाली* में श्रीकृष्ण रहता है !
*सत्य है ! *भरे*हुए में श्रीकृष्ण को स्थान कहाँ ?
*काम, क्रोध, लोभ, मोह, लालच, अभिमान, ईर्ष्या, द्वेष और भली-बुरी, सुख-दुख की बातों से जब दिल-दिमाग भरा रहेगा तो उसमें ईश्वर का वास कैसे होगा ?

सरकारी सहायता का सही लाभ यदि आम जनता तक नही पहुँच पा रहा है,

 गजब कंट्रोल व्यवस्था है मेरे देश में!एक गरीब मजदूर छुट्टी लेकर पाँव पैदल कंट्रोल की दुकान जाता है तो दुकान बंद मिलती है! हमारे काम करने वाली बाई बता रही थी कि यदि कदाचित "दुकान खुली भी है,तो कहा जाता है कि राशन खत्म! यदि किंचत राशन देने की नौबत आ ही जाए तो चावल सफेद कंकड़, गेहूं में लक्कड़ पत्थर सब मिलाकर तौल दिया जाता है!"

जबकि दूसरा आदमी एक रुपया किलो गेहूं और दो रूपया किलो वाला चावल (साफ सुथरा)लेने अपनी मोटर साइकिल से या कार से जाता है, कंट्रोल द्वारा उसे सब कुछ तुरंत दे दिया जाता है,बताओ क्यों?
हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी आज दुनिया के सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री हैं, फिर भी अपने देश के अंदर फैले भ्रष्टाचार,खाद्य तेलों में और कंट्रोल के अनाज में हो रही मिलावट पर कोई एक्शन नही लिया जाता! फ्री के नाम पर दी जा रही सरकारी सहायता का सही लाभ यदि आम जनता तक नही पहुँच पा रहा है, तो सिस्टम को टाईट किया जाना चाहिये!जो गरीब लोग किसी कारण वश सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से छूट गए हैं,उन्हें इन योजनाओं में एड किया जाए!देश के किसानों से किये गए वादे निभानें का वक्त गुजरा जा रहा है तुरंत ध्यान देवें! जय हिंद, जय भारत! #PMNarendraModi #शिवराजसरकार
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बरसाती गोबर की तरह हैं,न लीपने के न पाथने के!

 मैं ऐंसे दर्जनों लोगों को जानता हूँ,जो सरकारी हाकिम हैं,जिनके यहाँ रिस्वत का पैसा खूब आता है,तीन तीन मकान हैं,क्रषि फार्म हैं और जो वेतन को हाथ भी नही लगाते ! इनमें कुछ तो बीपीएल धारक भी हैं!और कुछ आरक्षणधारी महानुभाव भी हैं!

दूसरी तरफ मैं ऐंसे हजारों लोगों को जानता हूँ,जो वास्तव में गरीब हैं,गरीबी के कारण पढ़ लिख नही पाये,जो गरीब बेरोजगार हैं, भूमिहीन खेतिहर मजदूर हैं,या गांव में थोड़ी सी ऊसर जमीन है और ऐंसे कई निर्धनों के पास बीपीएल आयुष्मान कार्ड भी नही है! इन्हें बनवाने के लिये उनके पास रिस्वत के पैसे नही है! उनके पास मकान,प्लॉट और सरकारी नौकरी भी नही है!इन वंचितों के मुद्दे उठाने के बजाय, सांसद, विधायक और मीडिया वाले और तमाम जातिवादी निठल्ले लोग उन' मुद्दों पर चर्चा करते रहते हैं,जो प्रतिपक्षी दल की फजीहत करने में कारगर हो!
अभी तो इस्लामिक आतंक का मुकाबला करने के बजाय टीवी चैनलों वाले आतंकवाद की गाथा गा रहे हैं,जो बरसाती गोबर की तरह हैं,न लीपने के न पाथने के! केवल हिंदू कौम के दुश्मन हैं और दीन -ए -इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं!

नैतिकता ,अनुशासन, लोकतंत्र

 यह सच है कि भारत में *स्थाई* होने के बाद *सरकारी अधिकारी/ कर्मचारी* का रवैया बदल जाता है! इसीलिये शायद आम जनता निजीकरण के खिलाफ आक्रोश नही जता रही! गोकि चीन, जापान,जर्मनी,फ्रांस से हम नई नई टैक्नालॉजी तो ला सकते हैं,किंतु नैतिकता या अनुशासन नही!

उन लोगों में नैतिकता,राष्ट्रवाद और देश के प्रति जिम्मेदारी का भाव कैसे आएगा जो केवल आरक्षण की वैशाखी ढूंढ़ते रहते हैं? उन लोगों में राष्ट्रवाद कैसे आएगा जो खानदानी बेरोजगार हैं,जो अच्छे नंबरों से पास होने के बावजूद,मेरिट होल्डर होने के बावजूद विदेश जाने को मजबूर हैं? इसी तरह उन लोगों से राष्ट्रवाद की आशा करना व्यर्थ है जो इस मुल्क को सिर्फ मजहब का चरागाह समझते हैं या हमेशा अपने कौमी अधिकारों की बात करते हैं।आरक्षण की बात करते हैं!
असली राष्ट्रवाद तो क्रांतिकारी और ऊँचे दर्जे के महामानवों में खुद के अंतस से ही स्वत:स्फूर्त हो सकता है!ऐंसा प्रतीत होता है कि सैकड़ों सालकी गुलामी ने कुछ भारतियों को स्थाई रूप से अनैतिक,स्वार्थी,लालची और अनुशासनविहीन बना डाला है!
विगत 2020,2021,20220 के कोरोना काल में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कोरोना संकटकाल में कावड़ यात्रा मत निकालो,तब भी देश में कई जगहों पर श्रद्धालुजन इसकी धज्जियां उड़ाते रहे।महामारी में मरते रहे। यह लोकतंत्र जनित आजादी के माध्यम से की गई हाराकिरी है।
भारतीय लोकतंत्र की ढीलपोल का सबसे भयानक मंजर सरकारी क्षेत्र में सदाबहार मक्कारी और घूसखोरी में द्रष्टव्य है।यह सच है कि स्थाई होने के बाद सरकारी कर्मचारी या अधिकारी का रवैया बदल जाता है! वह अंग्रेजी साहिबों के अवतार में आ जाता है।नैतिकता, सत्यनिष्ठा,ईमानदारी को लतियाकर आजाद भारत का समाज कुछ इस तरह ढल गया हैकि
*काजल की कोठरी में कैसे भी सयानों जाय,एक रेखा काजल की लागिहै पै लागि हेै।*
भारत सरकार चीन और जापान से तकनीक तो ला सकती है,किंतु वहां की नैतिकता और अनुशासन कदापि नही! कुछ पाकिस्तान परस्त लोग भी चोरी छिपे भारतीय लोकतंत्र को चूहों की तरह कुतर रहे हैं।वे लोकतंत्र का मखौल उड़ा कर मजहबी इंतजामात करने पर आमादा रहते हैं! ये गद्दार लोग जब बदमासी करते पकड़े जाते हैं तो संविधान -संविधान रटने लगते हैं।
आजादी के 77 साल बाद ऐंसा आभासित हो रहा है कि भारतीय समाज को,भारतीय एकता के लिए लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत रास नही आ रहा है! सवाल उठता है कि भारत में असफल हो रहे पश्चिमी ढंग के लोकतंत्र का विकल्प क्या है?लगता है भारत को ताकतवर बनाने के लिये इंदिरा गांधी,माओ या स्टालिन जैसा नेतत्व ही सही है। श्रीराम तिवारी

गुरुवार, 13 जुलाई 2023

आगामी कुछ दिनों बाद

 आगामी कुछ दिनों बाद कॉल करते ही फोन पर आवाज सुनाई देगी .....

"महँगाई एक बीमारी है,इससे बचें, खाना कम खाएँ,टमाटर तथा अन्य महंगी सब्जियों का बहिष्कार करें।कपड़े कटे फटे पुराने ही पहने, बड़े बड़े मकानों में रहने के बजाय झोपड़ों और कंदराओं में रहें!कहीं आना जाना हो तो पैदल ही जाएँ !पेट्रोल,डीजल से चलने वाले वाहनों का प्रयोग न करे!ध्यान रखिये, हमें महँगाई से लड़ना है,सरकार से नही" धन्यवाद, आपका एक ❤शुभ चिंतक❤
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जो कोई मेहनत-मजदूरी से इंकार करे, वही काफिर है।

 प्रश्न: इस्लाम क्या है? काफिर कौन?

उत्तर :-एक बार नबीए करीम हुजूर स अ व हजरत मुहम्मद साहब ने अपने अनुयाइयों को हुक्म फरमाया कि ''खुदा के दीन में न कोई गनी है, न कोई मुंहताज है,न कोई शाह, बादशाह है,न कोई गुलाम है ,सभी उसके बंदे हैं और बराबर बंदगी का अखित्यार रखते हैं! आपने पुनः फरमाया ''बक्त-बक्त पर मुस्लिम अपना खलीफा मुकर्रर करेंगे!इमाम होंगे, वली होंगे,गौस और कुत्बों अब्दाल होंगे! ये सब मिल्लते इस्लाम के रहबरो पासबाँ होंगे! ये खुदा का दीन [मजहब] है और उसी ने हमें बख्शा है, वही उसकी परवर्दी भी करेगा!
उन्होंने फरमाया-जो कोई मेहनत-मजदूरी से इंकार करे,और जो उनके दीन की निंदा करे, वही काफिर है।
और नबी ए करीम स अ वसल्लम ने यह भी फरमाया है ''किसी मजदूर का पसीना सूखने से पहले उसकी मजदूरी उसे मिल जानी चाहिए!" तालीमे-इस्लाम की असल तस्वीर यही है। कट्टरपंथियों ने जेहाद के नाम पर न केवल इंसानियत का क़त्ल किया है ,न केवल दुनिया में दहशतगर्दी को बढ़ावा दिया है, बल्कि वे हुजूर मुहम्मद साहिब की शान में गुस्ताखी के गुनहगार भी हैं,क्योंकि इन क्रूर जाहिल आतंकवादियों ने कभी भी मुहमम्द साहिब के बताए किसी एक भी सिद्धांत का पालन या आचरण ठीक से नहीं किया है!
भारत में इस्लाम के उसूलों का पालन कम और धर्मांधता अधिक है !इसी मजहबी धर्मांधता से अलगाववादियों और पत्थरबाजों को खाद पानी मिलता है!
-श्रीराम तिवारी !

सदुगुण ही धर्म के लक्षण हैं!

 आमतौर पर संस्कृत के 'धर्म' शब्द का अनुवाद अरबी/फारसी के 'मजहब' और अंग्रेजी के रिलीजन शब्द से किया जाता है, यह अनुवाद पूर्णत: भ्रामक है!वास्तव में जितना फर्क पाश्चात्य दर्शन और भारतीय दर्शन में है,जितना फर्क भौतिकवादी और अध्यात्मवादी दर्शन में है! और जितना फर्क किसी प्रमेय के सिद्धांत और सूत्र में है,उतना ही फर्क मजहब और 'धर्म' में है! और उतना ही फर्क रिलीजन और धर्म में भी है!धर्म के बारे में संस्क्रत वांज्ञ्मय में अनेक परिभाषाएं हैं,उनमें से कोई भी रिलीजन या मजहब से मेल नहीं खाती!पाणिनी कहते हैं,- 'मनुज: सत्यम् धारयते इति धर्म:' और महावीर स्वामी का प्रसिद्ध सूत्रवाक्य है-"वस्तु स्वभावो धम्म:!"

धर्म को परिभाषित करते हुए मनु स्म्रति का सर्वाधिक प्रचलित श्लोक है-:
"धृति क्षमा दमोSस्तेयम्,शुचितेंद्रिय निग्रह:,
विद्या बुद्धि च अक्रोधस्य,एष: धर्मस्य लक्षणम्!"
अर्थ:-"धैर्यशीलता,जितेंद्रियता,सभी इंद्रियों की विषयों से असम्बध्ता याने भावों की पवित्रता, सुशिक्षित होना,अपना अहित करने वाले पर भी क्रोध न करना इत्यादि सदुगुण ही धर्म के लक्षण हैं!"
इन दिनों आमतौर पर लोग उक्त सद्गुणों की कोई परवाह नही करते! वे मॉब लिंचिंग को या किसी राजनैतिक पार्टी को जिताने के लिये 'जय श्रीराम' के नारों को एवं मजहबी उन्माद जैसे हथकंडों को 'हिन्दू धर्म' कहते हैं! वास्तव में भारतीय आर्यों का वास्तविक धर्म तो 'सनातन धर्म' ही है! आज जिस हिंदू धर्म के नाम पर लोग लाल पीले हो रहे हैं,उस का तो गीता,वेद,पुराण,उपनिषद,संस्क्रत या पाली,अपभ्रंश महाकाव्यों और संहिताओं में उल्लेख भीं नहीं है।
जब भगवान महावीर कहते हैं कि 'वस्तु स्वभावो धम्म' तब उनका आसय यह है कि मिर्च यदि चिरपिरी है तो यह मिर्च का धर्म है और गन्ना मीठा है तो यह गन्ने का धर्म है और यदि मनुष्य का स्वभाव है कि समूहमें रहकर नियमान्तर्गत सानंद रहे,तो यह मनुष्यका धर्म है!इस तरह सभी भारती़य मत पंथ दर्शन नियति की अनूकूलता से संचालित हैं!उनका रिलीजन और मजहब से तुलना करना वैसा ही है जैसे फारसी में सिंधु नदी को हिंदस और यूनानी में इंडस(Indus) तथा फारसी में भारत को सिंधुदेश या हिंदुदेश कहना !
चाहे महाभारत हो,रामायण हो या उसके बाद जैन-बौद्ध साहित्य हो 'हिन्दू धर्म' के नाम से किसी धर्म के होने का उल्लेख नहीं है! वेशक दुनिया की तमाम सभ्यताओं ने अपने-अपने धर्म-मजहब का नामकरण खुद ही किया है। सिवाय 'हिन्दू धर्म' के। यह नाम करण खुद हिन्दुओं ने नहीं किया!बल्कि यह तो गैर हिन्दुओं द्वारा की गई नाम उपाधि है।
भारतीय उपमहाद्वीप में जब तक आर्यों की मोनोपॉली चलती रही,तब तक उन्होंने यहाँ 'आर्यधर्म'अथवा 'वैदिक पद्धति' नाम से अपना धर्म पालन किया!बाद में महाकाव्यों ने भारत से लेकर कंबोडिया,इंडोनेसिया और सीरिया तक'भागवत धर्म' की धूम मचाई!जब जैन और बौद्ध धर्म का बोलवाला हुआ तो यहाँ श्रमण परंपरा और 'बौद्ध धर्म' की साख परवान चढ़ी!जब आदि शंकराचार्य ने वेदों और अद्वैत वेदांत की नवीन व्यख्या की तथा अपने पूर्ववर्ती सभी भारतीय -सिद्धांतों -पंथों, दर्शनों और वादों का परिमार्जन करते हुए उत्तर मीमांसा को भारतीय वेदांत दर्शन घोषित किया!आर्य धर्म की नवीन व्याख्या की! तब भारत की जनता ने उनके सिद्धांत 'ब्रह्म सत्यम जगन्मिथ्या' को सर माथे लिया।
सम्भवतः कालांतर में दक्षिण भारत से पुन: पल्लवित पुष्पित 'भक्तिमार्ग' तीर्थाटन और अवतारवाद के समिश्रण से सज्जित होकर उत्तर भारतकी ओर आया होगा और तभी से भारतीय आध्यात्मिक चेतना और धार्मिक परम्पराओं को 'सनातन धर्म' कहा जाने लगा। बाद में कुछ विदेशी आक्रमणकारियों और यायावर विदेशी धर्म प्रचारकों ने इस भारत भूमि को हिंद और यहां के निवासियों को हिंदू कहा और यहां के रहने वालों के धर्म को 'हिंदू धर्म' का नाम दिया।
इस कालप्रवाही सामाजिक सांस्क्रतिक यात्रा में 'हिंदू धर्म' शुद्ध आर्य या वैदिक अथवा परम भागवत धर्म न होकर-आर्यों, द्रविड़ों, हमलावर शक,हूण कुषाणों तथा आदिम जन जातियों की मिश्रित सभ्यता- संस्क्रति और आध्यात्मिक जीवन शैली का एकीक्रत रूप होकर 'हिंदू धर्म' बन गया!श्रीराम तिवारी
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Gajendra Vishwakarma and Madhawendramani Kaushik