गुरुवार, 19 जनवरी 2012

खाद्यान्न महंगाई पर देश में सन्नाटा क्यों?

  साल-२०१२  का आगमन भारत के परिद्रश्य में  हर नए साल की तरह ही हुआ,किन्तु आर्थिक मोर्चे पर एक विचित्र बदलाव आया जो पढने -सुनने में सुखद और फलितार्थ में बड़ा ही निराशाजनक मालूम होता है.सरकारी आंकड़ों के मुताबिक विगत २४ दिसंबर-२०११ को समाप्त हुए सप्ताह में खाद्द्य मुद्रा स्फीति दर -३.३६ फीसदी पर आ चुकी थी.उससे  ठीक एक साल पहले यानि २४ दिसंबर-२०१० को यह आंकड़ा २०.८४ फीसदीथा.अमेरिका ,फ़्रांस,ब्रिटेन,यूरोप, और जापान आदि देशों में खाद्द्य मुद्रा स्फीति का आकलन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर किया जाता है ,जबकि भारत में यह आकलन थोक मूल्य सूचकांक पर निर्धारित किया जाता है.वास्तव में अर्थव्यवस्था से सम्बंधित इस महत्वपूर्ण खबर पर जनता कीठोस प्रतिक्रिया का न होना गंभीर चिंता का विषय है.
                         इन दिनों 'भृष्टाचार'उन्मूलन ,पूंजी निवेश,आधारभूत अधोसंरचना और लोकतंत्र के सभी अंगों की  अपनी-अपनी स्वायत भूमिका को लेकर मीडिया मेंकाफी चर्चा है किन्तु महंगाई से जुडी इस सबसे महत्वपूर्ण खबर  कि-खाद्द्य मुद्रा स्फीति दर गिरते-गिरते न केवल शून्य पर बल्कि ऋणात्मक स्तर तक जा गिरी है;कोई खास चर्चा इस सन्दर्भ में किसी भी सक्रीय और कारगर फोरम में नहीं हो पा रही है.खाद्द्य मुद्रास्फीति दर की गिरावट से मुझे एकबारगी खुशफहमी हुई कि चलो अब कमसे कम खाद्द्य वस्तुएं तो सस्ती मिलेंगी!लेकिन जब इस बाबत अर्थ शाश्त्रियों के बजाय बाज़ार की हकीकत से रूबरू हुए तो मालूम हुआ कि आम आदमी के लिए आसमान छूती महंगाई से बहरहाल इस पूंजीवादी अर्थ व्यवस्था में कोई राहत मिलने वाली नहीं है.
        जिस वक्त खून को जमा देने वाली कड़ाके की ठण्ड में  कोई वेसहारा,निर्धन,बीमार,अपाहिज और लाचार अपने  अस्तित्व के लिए संघर्षरत होता है ;ठीक उसी कड़ाके की ठण्ड में किसी वातानुकूलित महंगे होटल में पूँजी के लुटेरों और भृष्टाचार की कमाई के अलंबरदारों की औलादें क्या कर रही होतीं है ?सूरा -सुन्दरी और अधुनातन भौतिक सुख संसाधनों पर गुलछर्रे उड़ाने वालों को महंगाई के इंडेक्स की फ़िक्र क्यों होने लगी?आटे-दाल का भाव जानने की जिन्हें कभी जरुरत ही न पड़े ऐंसे अधम मनुज यदि राज्य सत्ता की द्योंडी पर मथ्था टेकते हों तो उन्हें बर्दास्त करना महा पाप है. इस मानव निर्मित दुरावस्था और अमानवीय असमानता के खिलाफ अंतहीन संघर्ष का सिलसिला बहुत पुराना है,किन्तु आधुनिकतम तकनीकी विकाश,लोकतंत्रात्मक व्यवस्था,स्वाधीनता के इस दौर में- जबकि संचार एवं सूचना प्रोद्द्योगिकी ने न केवल  मानव मात्र की व्यष्टि चेतना को जागृत किया है अपितु कतिपय तानाशाही से आक्रान्त राष्ट्रों की जनता को आंदोलित भी किया है -स्वनामधन्य स्वयम्भू तथाकथित योगियों,बाबाओं ,समाज सुधारकों और जन-नायकों की विमूढ़ता धिकार योग्य है.ये 'वतरस के लालची'और ढपोरशंखी गैर जिम्मेदार लोग आवाम को उस  सरकार के खिलाफ खड़ा करने के लिए कटिबद्ध  हैं जिसका प्रधानमंत्री न तो सत्ता का लालची है और न ही भृष्टाचार में स्वयम लिप्त है.ये बात अलहदा सही है कि भारत राष्ट्र की आजादी के तत्काल बाद से  ही सर्व व्यापी भृष्टाचार  का वैक्टीरिया इस देश को खोखला करने में जुट गया थाऔर उसने पूरे तंत्र को अपनी चपेट में लिया था..वर्तमान सरकार कोतो  विरासत में एक महाभ्रुष्ट व्यवस्था मिली थी.आज जो लोग अचानक भृष्टाचार के नाम पर राजनैतिक रोटियाँ सेकने की कोशिश कर रहे है उनसे मेरा अनुरोध है कि वे वर्तमान सरकार की सबसे बड़ी और भयानक गलती के खिलाफ आवाज बुलंद करें. वर्तमान सरकार का सबसे बड़ा अपराध है गलत आर्थिक नीति.आज भले ही भारत भर के गोदाम खाद्यान्न से ठसाठस भरे है किन्तु देश के २० करोड़  निर्धन -नंगे-भूंखों  सर्वहारा जन अभी भी बंचित है.देश खाद्यान्न में कमोवेश वैश्विक स्थिति के सापेक्ष बेहतर स्थिति में है इसके लिए देश के किसानों और सरकार दोनों का शुक्रिया किन्तु जब सरकार की तथाकथित उदारीकरण ,भूमंडलीकरण की नीतियाँ वांग दे रही हों तो दीगर मुल्कों द्वारा भारत के खादायान्न भंडारों पर उनकी कुद्रष्टि होना स्वाभाविक है.परिणाम स्वरूप खाद्यान्न निरंतर महंगा होकर खुदरा बाज़ार में आम जनता तक पहुँचता है.
          जिनकी क्रय शक्ति गाँव में २० और शहर में २६ रुपया रोज़ हो उनका  बाज़ार की ताकतों से मुकाबला कैसा?इसीलिये निरंतर बड़ी तेजी से गरीब वर्ग भुखमरी के  गर्त में धकेला जा रहा है. ये बात सही है कि दुनिया भर में बढ़ रही अनाज की कीमतों के लिए एक ओर कतिपय मुल्कों में जनसंख्या विस्फोट और दूसरी ओर मासाहार ,जैव ईधन,सट्टेबाजी तथा उत्पादन में कमी इत्यादि को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है ;किन्तु भारत में लगभग हर आवश्यक खाद्यान्न के रिकार्ड उत्पादन के वावजूद,खाद्यान्न के इंडेक्स में गिरावट के वावजूद खुदरा बाज़ार में चीजों के दाम नहीं घटाए जाने  पर आम जनता की चुप्पी और विपक्ष का इस मुद्दे पर आंदोलित नहीं होना किस बात को इंगित करता है?
   भृष्टाचार ,कालाधन,लोकपाल ,आरक्षण तथा विदेशी पूँजी विनिवेश जैसे मुद्दों पर तब तक कोई कारगर सफलता  नहीं मिल सकेगी जब तक देश की एक तिहाई आबादी को कम से कम एक जून का भोजन नसीब नहीं हो जाता.सत्ता पक्ष और प्रमुख विपक्ष के हाथ से जन सरोकारों की लगाम छूट चुकी है.महंगाई का घोडा वेलगाम  हो चूका है ,सभी उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर सरकार का कोई नियंत्रण अब नहीं रहा.सब कुछ बाज़ार के हवाले और बाज़ार के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है.जनता के प्रति कोई जबाब देही नहीं रही.सवाल उठाना चाहिए कि जब सब कुछ बाज़ार को तय करना है तो सरकार के होने का क्या मतलब है?यह सवाल उनसे जो सत्ता में हैं ,यह सवाल उनसे भी जो सत्ता में आने के लिए बेताब है और राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों में आम जनता के  वोट  के याचक हैं ; जो गैर राजनीतिक बिसात पर शुद्ध राजनीती के तलबगार हैं उनसे भी यह सवाल किया जाना चाहिए कि मुनाफाखोरों,सटोरियों ,मिलावातियों,जमाखोरों से उनका ऐंसा क्या रिश्ता है कि उनके खिलाफ एक शब्द नहीं निकलता ....
                                                            श्रीराम तिवारी
     
                    

शनिवार, 14 जनवरी 2012

धरती का चीत्कार सुनो!

     ओपेक देशों की महती कृपा से कच्चे तेल[पेट्रोलियम]की कीमतों में  निरंतर बृद्धि होती आई है.विकाशशील देशों की जरूरतों के मद्देनजर उनके  विदेशी मुद्रा भण्डारका अधिकांस भाग इस मद में विलीन होता जाता है.आधुनिक वैज्ञानिक एवं तकनीकि विकाश के लिए अत्यावश्यक उर्जा के रूप में स्थापित पेट्रोलियम उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है.विद्दुत उत्पादन,दूर संचार उपकरण सञ्चालन,रेल ,बस,कार,स्कूटर,हवाई जहाज,पनदुब्बियाँ और निर्माण के प्रत्येक उपकरण से लेकर अन्तरिक्ष में मानव की दखलंदाजी तलक हर एक उपक्रम के लिए ईधन चाहिए.इसकी आपूर्ति के वैश्विक श्त्रोत शने-शने छीजते जा रहे हैं.जिन देशों के पास प्रचुर मात्रा में पेट्रोलियम उपलब्ध था ,उनके भण्डार भी अब समाप्ति की ओर हैं.जिनके पास नहीं था या न्यून मात्रा में ही था वे अपनी सकल राष्ट्रीय बचतों का एक बड़ा हिस्सा इस मद में खर्च करते रहने को मजबूर थे.वैकल्पिक उर्जा के श्त्रोत खोजने में लगे वैज्ञानिकों और पर्यावरण चिंतकों ने सौर उर्जा  का महत्व प्रतिपादित किया है.विगत शताब्दी के अंतिम ५० सालों में खनिज तेल समेत तमाम प्राकृतिक संसाधनों का जितना दोहन किया गया वह  मानव सभ्यता के ज्ञात इतिहास के  सकल योगसे  भी अधिकतर है.इस शताब्दी के प्रथम दशक में जितना दोहन किया गया वह उससे भी ज्यादा है.आइन्दा इस क्षेत्र में  मांग की गति तीव्रतर होती जायेगी और उत्पादन संसाधन  खाली होते चले जायेंगे.तब स्थिति भयावह होगी , खनिज तेल ,कोयले और अन्य खनिजों के निरंतर महंगे होते जाने से कृषि क्षेत्र में भी महंगे संसाधन होना स्वाभाविक है और परिणामस्वरूप महंगाई अपने अकल्पनीय चरम पर होगी.
                                              मानव सभ्यता के १० हज़ार सालों में  भी  मानव ने  प्राकृतिक संसाधनों की उतनी दुर्गति नहीं की जितनी विगत १०० सालों में कर डाली.वैज्ञानिक उन्नति और भौतिक सभ्यता के विकाश क्रम में उपनिवेशवादी राष्ट्रों और हिंसक हमलावर जातियों ने जहां एक ओर स्व-राष्ट्रों के प्राकृतिक संसाधनों को निचोड़ डाला वहीँ दूसरी ओर भारत ,अफ्रीका,लातीनी अमेरिका  जैसे प्राकृतिक संपदा से सम्पन्न राष्ट्रों की भी दुर्गति कर डाली.धरती पर के हरे भरे जंगल के जंगल काटकर जहां देशी राजे रजवाड़ों ने अपनी अयाशी के अनगिनत ठिकाने बनाये वहीँ विदेशी आक्रान्ताओं ने  पर राष्ट्रों को अपनी हवस का शिकार बनाया.लन्दन,मानचेस्टर में कई पुराने भवनों में जो शीशम और सागौन की लकड़ी लगी है वो भारत और दक्षिण अफ्रीका की बर्बादी का प्रतीक है.अब भूमंडलीकरण और उदारीकरण के बहाने जमीन के नीचे जो कुछ भी बचा है उसे हथियाने के उपक्रम जारी हैं.यह दुखद त्रासदी है कि सत्य अहिंसा और करुणा के अलमबरदार तब भी कुलहाडी के बैंट बने थे अब भी बन रहे हैं.शायद गुलाम राष्ट्रों और समाजों की इस मानसिकता में जीने के लिए हम अभिशप्त हैं.
        माना की विज्ञान के अनुसंधानों से मानव ने प्रकृति के दुर्भेद्य हिस्सों तक पहुँच बनाई है.जीवन को सरल सुगम और निरापद बनाने की संभावनाएं विकसित कीं हैं,किन्तु अन्वेषण और जिज्ञाषा की इस भूंख ने इस हरी-भरी धरती और नीले स्वच्छ आसमान का जो बंटाढार किया है वह तो उसकी समस्त वैज्ञानिक उपलब्धियों के सापेक्ष बेहद घाटे का सौदा है.जनसँख्या वृद्धि,वेरोजगारी,पर्यावरण प्रदूषण,इत्यादि भयावह समस्याओं पर राज्य सत्ता के लिए कोई कारगर अजेंडा नज़र नहीं आ रहा है.दुनिया भर के लोकतान्त्रिक मुल्कों की जनता आज भी महंगाई,वेरोजगारी,भृष्टाचार  और स्वतंत्रता जैसे स्वार्थों तक चिपटी हुई है.वोट की ताकत को दूरगामी सामूहिक स्वार्थों की ओर मोड़ने का वक्त आ गया है. मानव मात्र को यह भावी पीडियों के लिए अवदान नहीं ,एहसान नहीं अपितु अपराध बोध से छुटकारा होगा कि अपने निहित और भौतिक स्वार्थों से परे....,अपने जातीय,धर्म और सम्प्रदाय के तुच्छ स्वार्थों से परे.....  सारी की सारी धरती के रक्षार्थ..... विराट जनमेदिनी  का तुमुलनाद हो!....
       शायद हम धरती को बचाने में सफल हो सकें .....दुनिया  भर के जालिमों के खिलाफ..... दुनिया के मजदूर-किसान और नौजवान एक हो!सर्वहारा के एकजुट संघर्ष से ही ये संभव है...
     श्रीराम तिवारी

बुधवार, 11 जनवरी 2012

राष्ट्रीय युवा-दिवस पर स्वामी विवेकानंद का पुण्य स्मरण.....

  कभी-कभी एक विशेष समयांतराल के उपरान्त इस पृथ्वी पर  एक ऐसा मनुष्य जन्म लेता है ,जो किसी अन्य लोक से आया हुआ सा प्रतीत होता है.वह अपने व्यक्तित्व-कृतित्व से इस धरा पर महिमा,शक्ति और दीप्ति का जिस तरह  अवदान विखेरता है ,उससे  आभासित होता है कि यह कोई अवतारी आत्मा है.यह महान शख्सियत इस सुख-दुःख ,गुण-दोषमय संसार में आम आदमी की भांति विचरण करते हुए भी कुछ इस भांति छटा बिखेरता  है कि लगता है  मानो वह किसी अन्य दिव्य लोक का अतिथि है जो केवल एक रात के लिए किसी वियावान में ठहरता है और किसी तीर्थयात्री की तरह भोर की वेला में अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान करता है.
     
          ऐंसे   सत्पुरुष  अपने आपको सम्पूर्ण मानवजाति से सम्बद्ध रखते हुए भी उनके  भयावह दुर्गुणों से अनुरक्त नहीं हुआ करते बल्कि उनके हर्ष-विषाद के हमसफर बन जाते हैं.ऐंसे ही सत्पुर्षों के लिए श्रीमद भागवत पुराण में कहा गया है;-
                   कुलं  पवित्रं  जननी कृतार्थः, वसुंधरा पुण्यवती  च तेन;
                    अपार सम्वितु सुखसागरेअस्मिन्न लीनं परे ब्रह्मणि  अस्य चेत;
 सम्पूर्ण मानवीय संवेदनाओं,लौकिक-पारलौकिक स्थापनाओं,अध्यात्म की विवेचनाओं से सम्पन्न आदर्श अवतारी तो इस धरा पर बहुतेरे हुए है किन्तु सांसारिक सच्चाइयों,वैश्विक चुनौतियों,सर्वधर्म एकत्व के साक्षात् अवतार स्वामी विवेकानंद का अवतरण न केवल चिरस्मरणीय  है अपितु मानव मात्र के लिए अनुकरणीय भी है.
 स्वामी विवेकानंद वास्तव में आधुनिक मानव के आदर्श प्रतिनिधि हैं.विशेषकर भारतीय युवकों के लिएतो  स्वामी विवेकानंद से बढ़कर दूसरा कोईआदर्श नेता  नहीं हो सकता.
                           भारत के स्वाधीनता संग्राम में जिन देशवासियों ने अपने प्राण न्यौछावर किये  या जेलों की यातनाये सहीं उन सभी के दिलों में  मष्तिष्क में स्वामी विवेकानंद का सन्देश विद्यमान था. राष्ट्रीय गौरव,स्वाभिमान और निर्भयता के साथ-साथ धर्म निरपेक्षता के बीज भी  स्वामी विवेकानंद के 'वैज्ञानिक अध्यात्मवाद' में समाये हुए थे. कालांतर में वे  अपने पूर्ववर्ती महापुरषों से वे कई मायनों में भारत भाग्य-निर्माता सिद्ध हुए हैं.
   वेदान्त का प्रतिपादन, हिंदु-धर्म का महिमा गान अथवा विश्वधर्म सम्मलेन के शिकागो अधिवेशन में अभिव्यक्त सांगोपांग  भारतीय ज्ञान मञ्जूषा कि अविरल  भागीरथी को भारत ,अमेरिका और यूरोप में  ही नहीं बल्कि सारे सभ्य-संसार ने अनवरत प्रवाहमान देखा है. ये भी कोई अचरज की बात नहीं थी क्योंकि यह सब तो उनके पूर्ववर्तियों और उत्तर्वर्तियों  ने कमोवेश  किया ही है .स्वामी विवेकानंद अपने युग के समकालीन और अपने से पूर्ववर्ती अवतारों, महापुरषों और धर्म-ध्व्जों से इस मायने में श्रेष्ठ हैं कि  उन्होंने सर्व प्रथम भारत राष्ट्र की परिकल्पना  की थी. वे पाश्चात्य अधुनातन  विज्ञान ,अर्थशास्त्र ,फिलोसफी और प्रजातांत्रिक समाजवादी राजनैतिक विज्ञान के प्रथम प्रखर भारतीय थे. इन सभी दृष्टिकोणों से स्वामी विवेकानंद का केवल भारत या अमेरिका ही नहीं वरन विश्व के धार्मिक,सांस्कृतिक,और आध्यात्मिक इतिहास में सर्वोच्च स्थान है. वे उस विचारधारा से न केवल अवगत थे बल्कि भारतीय पोषक भी थी जो उन्हें यूरोप और विशेषत;फ़्रांस की यात्रा के दौरान पढने,समझने और सुनने में आई थी.इस विचारधारा को उनको समकालीन चिन्तक कार्ल मार्क्स और एंजिल्स  ने सम्पादित किया था.
   अपने भारत भ्रमण के दौरान स्वामीजी ने अनेकों बार इस विचार और दर्शन की ओर इंगित किया था.उन्होंने दरिद्रनारायण के उत्थानके लिए  और भारतीय युवाओं को स्वाभिमानी बनकर भारत राष्ट्र के प्राचीन गौरव के प्रति सचेत होने हेतु  बारम्बार आह्वान किया था,
    उनका नारा था ;-
                                      उतिष्ठत जागृत प्राप्य वरन्य वोदहत.......
    संयुक्त राष्ट्रसंघ के निर्णयानुसार जब १९८५ वर्ष को 'अंतर्राष्ट्रीय युवा वर्ष'घोषित किया गया तो इसके महत्त्व को अंगीकृत करते हए तत्कालीन भारत सरकार ने १२ जनवरी को स्वामी विवेकानंद के जन्म दिन को 'राष्ट्रीय युवा दिवस'के रूप में मनाने का अभिमत लिया.
 स्वामीजी का दर्शन,उनकी जीविनी,उनके कार्य,उनकी शिक्षाएं और उनका आदर्श हर युग की युवा पीढी के लिए प्रेरणा स्त्रोत  रहेगा.
                                   श्रीराम तिवारी

शनिवार, 7 जनवरी 2012

जनता की जनवादी क्रांति से ही भारत को चीन पर बढ़त हासिल हो सकती है.

विगत दिनों भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने भुवनेश्वर में स्वदेशी तकनीकी को बढ़ावा देने का ऐलान किया और इस क्षेत्र में  चीन की बढ़त को स्वीकार किया.अब यक्ष प्रश्न ये है कि क्या  अमेरिकी मंत्रनाओं से चीन आगे  बढ़ा है? भारत किन कारणों से पिछड़ा है ? इन सवालों के उत्तर जाने बिना कोई निदान सम्भव नहीं.भारत चीन से या अमेरिका से केवल नीतियों में अंतर  के कारण नहीं पिछड़ा है, बल्कि इस् घोर राष्ट्रीय  दीनता के प्रमुख कारन ये हैं;- [१] भयानक शोषण, अशिक्षा ,अन्धविश्वास,सरकारी क्षेत्र की मक्कारी [२] रिश्वतखोरी ने भारत को इस मुकाम पर ला खड़ा किया है किउसके बिना पत्ता भी नहीं हिल -दुल  सकता.[३]     विदेशी मिशनरियों द्वारा आदिवासियों और उत्तर पूर्व के भारतीयों  को राष्ट्र की  मुख्यधारा से अलग  करने के कुटिल मंसूबे.[४]आंतरिक अलगाववाद.एवं पाकिस्तानी हुक्मरानों का कश्मीर के मामले में  भारत के साथ स्थाई किस्म का शत्रुतापूर्ण व्यवहार [५] भारत की आधुनिक पीढी के रूप में  मध्यवित्त वर्गीय जनता का  राजनीती के प्रति वितृष्णा पूर्ण  नजरिया.[६]आजादी के तत्काल बाद से ही गरीब -अमीर के बीच के फासले में उत्तरोत्तर बृद्धि होती चली गई और जनता के संघठित संघर्षों से यदि थोडा बहुत सुधार हुआभी है  तो उसकी उपलब्धि  जातीय आधारित आरक्षण त था पहुँच वालों के उदरमें समा गई.
 .बाकी जो बचा तो अफसर और सत्ताधारी नेता ले उड़े.आम जनता के हिस्से ठन-ठन गोपाल प्रस्तुत .इन ६ कारणों के अलावा भी अन्य कारण हो सकते हैं किन्तु बहरहाल इस आलेख की विषय वस्तु मात्र कारणों की खोज करना ही नहीं बल्कि किसी ठोस क्रांतिकारी आवश्यकता को रेखांकित करना है.
                     भारत के पढ़े लिखे मध्यम वर्ग की आदत है कि पश्चिमी विकसित राष्ट्रों की नक़ल करके गौरवान्वित होना .ये आदत कोई नई या अनहोनी जैसी  चीज   नहीं  है.वस्तुत  एक सह्श्त्र वर्ष की गुलामी की मानसिकता  से यही वर्ग नैतिकता विहीन श्रीहीन और पौरष विहीन हुआ था.इसके  रीढ़ विहीन हो जाने का परिणाम ये हुआ कियह वर्ग  देश की  तमाम विज्ञान सम्मत विरासतों,सामाजिक -आर्थिक-चारित्रिक परम्पराओं और नैतिक मूल्यों  को जमीन दोज़ करते हुए सर्व आयातित संसाधनों के साथ-साथ नीतियाँ को  भी उन्ही राष्ट्रों से  मुफ्त में प्राप्त करने चला,जिनके स्वार्थों ने भारत को न केवल गुलाम बनाया अपितु सदियों तक बुरी तरह लूट खसोट भी की.
    चीन में एक भी भिखारी नहीं,एक भी अनिकेत [बेघर]नहीं एक भी शिक्षित बेरोजगार नहीं जबकि चीन की तमाम जनता का ७० फीसदीहिस्सा  बूढा हो चला है ,वहां  कामगारों से पेंशनर्सकी संख्या ज्यादा हो चुकी हैफिर भी सरकारी या गैरसरकारी दोनों ही तरह के चीनी कामगारों को पेंशन सुविधा का संवैधानिक अधिकार है. जबकि भारत में सिर्फ सरकारी क्षेत्र केसेवा निवर्त्त्कों - जो की देश की जनता का मात्र २.०५% है -पेंशन दी जा रही है.चूँकि निजी क्षेत्र में ;खास तौर से आई टी सेक्टर और मीडिया क्षेत्र में सीनियर सिटीजन को पेंशन देने का न तो कोई सम्वैधानिक प्रावधान है और न ही इस शोषित युवा वर्ग की कोई संगठित संघर्ष की तैयारी है.आवास सुरक्षा या खाद्द्यान सुरक्षा का तो केवल सपना ही देखा जा रहा है.
   आज़ादी के उपरान्त जिन आर्थिक नीतियों और अंतर्राष्ट्रीय  नीतियों  का भारत ने अनुशरण किया  कमोवेश उनमें राष्ट्रीय स्वाभिमान और भारतीय आत्मावलोकन विद्यमान हुआ करता था.आपातकाल के बाद सत्ता में जनता पार्टी के आने से लगा की भारत ने लोकतंत्रात्मकता में एक और पग आगे बढाया है किन्तु दरसल यह एक भावुक तथा अल्पकालीन मृग मरीचिका ही सावित  हुआ .गैर कांग्रेसवाद के नाम पर सिंदीकेटों,जनसंघियों,समाजवादियोंऔर  तत्कालीन तमाम गैर कांग्रेसी गैर वामपंथी दलों एवं ग्रुपों  ने 'जनता पार्टी' नामक जो खिचडी पकाई थी वो भारत के तात्कालिक हित साधने में तो कुछ हद तक सफल रही किन्तु गैर कांग्रेसी मानसिकता और निरंतर विपक्ष में रहने की आदत के सिंड्रोम से पीड़ित  तथा इंदिराजी की लोकप्रियता से भयाक्रांत जनता पार्टी में उसके अपने धडों में घोर द्वन्द छिड़ जाने से वो  तथाकथित पहली गैरकांग्रेसी सरकार असमय ही काल कवलित हो गई थी .जनता पार्टी के धडों में जिन मुद्दों पर घमासान छिड़ा था उनमें से तीन मुद्दे आज भी भारतीय राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं. [१]राष्ट्रीय स्वयं सेवकों का गैर राजनैतिक संगठन आर एस एस में काम करते हुए या काम कर चुकने के बाद 'राजनीति ' में केरियेर  तलाशना,[२]राजनीति में विचारधारा वनाम जतीय्तावाद  का नासूर.[३]वैदेशिक आर्थिक नीति और घरेलु आर्थिक मोर्चे पर कोरी शाब्दिक लफ्फाजी.
   वैदेशिक आर्थिक नीतियों में तब तक कोई खराबी नहीं जब तक कि घरेलु बचतें सुरक्षित रहें,राजकोषीय घाटा सकल राष्ट्रीय आय से ज्यादा न होऔर आयात-निर्यात में उचित संतुलन हो.किन्तु जब राष्ट्रीय हितों की अनदेखी कर अंधाधुन्द निजीकरण ,अंधाधुन्द मशीनीकरण और बाज़ार की ताकतों को सिर्फ और सिर्फ मुनाफाखोरी के लिए लाइसेंस दिए जायेंगे तो आर्थिक नीति को  असफल होना ही था.
   सोवियत पराभव उपरान्त जब दुनिया एक धुर्वीय होकर रह गई तो अमेरिकी साम्राज्वाद के प्रभाव में अधिसंख्य दुनिया समेत भारत के दक्षिणपंथी अर्थश्स्त्रियों ने आई एम् ऍफ़ और विश्व बैंक से निर्देशित 'नयी आर्थिक नीति '
को भारत के लिए उपयुक्त समझकर चरण बध्ध लागु भी कर दिया.जिन लोगों ने इन प्रतिगामी और विनाशकारी आर्थिक नीतियों की मुक्त कंठ सेपैरवी की थी उन्ही में से एक प्रमुख हैं हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री जी और वे अब  भी उन नीतियों को जबरिया देश पर थोपते चले जा रहे हैं,जिनके चलते आज का भारतीय युवालगभग  विद्रोह की मुद्रा में आ चूका है.जो नीतियां अमेरिका में फेल हो गईं  वे भारत का उद्धार करेंगी यह  सिद्धांत उसे स्वीकार्य नहीं.
   हमारे देश केउच्च शिक्षित नौजवानअमेरिका समेत सारी दुनिया के विकसित राष्ट्रों में अपनी योग्यता का झन्डा बुलंद किये हुए हैं.यह क्यों संभव नहीं की वे स्वदेश के दीनता और दारिद्र निवारण में देश का नेत्रत्व करें?
  यह तो हर कोई जानता है की भारत ही दुनिया का  वो देश है जो सबसे अमीर होते हुए भी सबसे ज्यादा गरीबों की सबसे बड़ी गरीब जनसंख्या- ३० करोड़ को भूंख -कुपोषण -महामारी और घोर यंत्रणा  के साथ २१ वीं शताब्दी के दुसरे दशक में भी निर्लज्जता से बनाए रखे है.किसी भी कसबे या महानगर में   पूस की रातों में कडकडाती ठण्ड में सेकड़ों वेरोजगारों को फुटपाथों पर भूंख और ठण्ड दोनों को भोगते देखा जा सकता है.यह नजर देखने के लिए इंसानियत और जज्वे की नजर चाहिए.
     भारत में एक बिडम्बना है की  उपजाऊ जमीन जिनके पास है ;उन्ही बड़े जमींदारों के बच्चे अच्छे स्कूलों में पढने  की क्षमता रखते हैं ,इसके आलावा जिनके बापजी-माताजी किसी सरकारी गैरसरकारी संसथान में मुलाजिम हैं या जो राज्यसत्ता के गलियारों तक पहुँच रखते हैं ऐसे लोग ही बेहतर शिक्षा के सोपान तक और परिणामस्वरूप सामाजिक आर्थिक और पारलोकिक आनंद के भोक्ता हो सकते हैं.इन्ही में से कोई एक आर वी आई का गवर्नर ,कोई आर्थिक सलाहकार बनता है फिर सवाल उठता है की मांग और आपूर्ती के बारे में ,गड़बड़ी क्यों है?भारत की ८० करोड़ जनता के पास मोबाइल हैं ,लगभग ४० करोड़ भारतीय गोदामों में भरे पड़े हैं और इनमें से ५० फीसदी 'मेड इन चाइना'ही हैं ,भारत में ऐसी क्या कमी है की आज तक एक भी मोबाइल देश में नहीं बन सका .आदरणीय प्रधानमंत्री जी की सदिच्छा है की भारत भी चीन जैसा बने! तो क्या  दुनिया भर के देशों की आउट डेटेड टेक्नोलाजी देश में लानेसे,  उनका कबाड़ा महंगे दामों पर खरीदने से,अपने राष्ट्रीय स्थापित उद्द्य्मों को देशी -विदेशी पूंजीपतियों के हाथो बेचने से वो गौरव और राष्ट्रीय स्वाभिमान  हासिल हो सकेगा जो चीन ने अपनी जनता की जनवादी क्रांति  की बदौलत हासिल किया है?

      श्रीराम तिवारी

   
       

रविवार, 25 दिसंबर 2011

   आदरणीय  रश्मीजी अपने छोटे बेटे रिषभ उर्फ़ सन्नी के साथ इंदौर आईं और उन्होंने मेरा ब्लॉग देखा .

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

जनकवि रामनाथसिंग 'अदम गौँडवी' को क्रांतिकारी श्रद्धांजलि....

यह एक क्रमिक एवं स्वाभाविक युति है कि  जिन कवियों की मातृभाषा हिंदी या कोई अन्य आंचलिक भाषा होती है,और यदि वे जनवाद या क्रांति जैसे विचारों से प्रेरित है तो  वे प्रगतिशीलता के तत्वों को उर्दू शब्दों के सहारे ही थामने में सफल हुए हैं.इस विधा में गैर उर्दू भाषियों में जब भी कविता या शायरी की चर्चा होगी गजानन माधव मुक्तिबोध और दुष्यंत  के बाद 'अदम गौंडवी'उर्फ़ रामनाथसिंह सदैव याद किये जाते रहेंगे.
    राम नाथसिंह ने शायरी लिखने के शुरुआती दौर  में ही न केवल अपना नाम बदल डाला बल्कि परम्परागत उत्तर आधुनिक कविता को शायरी का नया लिबास भी पहनाया.दुष्यंत ने जिस हिन्दी शायरी में आम आदमी का दर्द उकेरा था ,अदम गौंडवी ने   जनता की आवाज बनाकर उसे  अमरत्व प्रदान किया है.उनकी कई गजलों में व्यवस्था कि लानत-मलानत की गई है. जन- गीतों के तो मानो वे सरताज थे.पूंजीवादी,साम्प्रदायिक और निहित स्वार्थियों की जकड़न में कसमसाती आवाम को 'अदम 'के शेर संबल प्रदान करते है-
                
         हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेडिये!
          अपनी कुर्सी के लिए ज़ज्वात को मत छेडिये!!
            हैं कहाँ  हिटलर हलाकू जार या चंगेज खाँ!
           मिट गए सब कौम की औकात को मत छेडिये!!
          छेडिये इक जंग मिल जुलकर गरीबी के खिलाफ!
          दोस्त !मेरे मजहबी नगमात को मत छेडिये!!
  एक और वानगी पेश है-
          काजू भुने प्लेट में,व्हस्की गिलास में,
          उतरा है रामराज ,विधायक  निवास में!
          पक्के समाजवादी है,तस्कर हों या डकैत,
          इतना असर है खादी के लिबास में!
           आजादी का जश्न वो मनाएं किस तरह,
            जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में!
......................................
    ........एक ही चारा है वगावत ....
         यह बात कह रहा हूँ में होशो-हवाश में!
  २२ अक्तूबर १९४७ को जन्में अदम गौंडवी के दुखद निधन से भारतीय उपमहादीप के प्रगतिशील साहित्य जगत में भले ही शोक का तमस छा गया हो किन्तु उनकी सृजनशीलता के धूमकेतु निरंतर उन सभी श्रेष्ठतम मानवों का पथ प्रशस्त करते रहेंगे ,जो मानवीय मूल्यों की हिफाज़त करते हुए  , शोषण के अन्धकार को समूल नष्ट करते हुए मानव मात्र को शान्ति-मैत्री-बंधुत्व और समता  से  परिपूर्ण  देखने की तमन्ना रखते हैं....
         जनकवि रामनाथसिंह अर्थात 'अदम गौंडवी'ने आजीवन दलित,शोषित,पिछड़ों और गरीबों के संघर्षों में न केवल परोक्ष सहयोग किया बल्कि अपनी सशक्त लेखनी से इन वंचित वर्गों को उपकृत भी किया है.वे दुष्यंत पुरस्कार से सम्मानित किये जा चुके थे.भले ही उन्होंने मात्र दो काव्य संग्रह 'धरती की सतह पर'और 'समय से मुठभेड़'सृजित किये हों किन्तु 'संछिप्त्ता सौन्दर्य की जननी है' अतः अदम गौंडवी का सृजन,उनका व्यक्तित्व और संघर्षों में अवदान अप्रतिम है,पर्याप्त है,जीवन है...
                            श्रीराम तिवारी
     

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

'द सीक्रेट'में भारतीयों के लिए कुछ भी 'रहस्य'नहीं.

    प्रख्यात लेखिका 'रोन्दा वार्न'ने अपनी पुस्तक ' द सीक्रेट' में  बहुत उपयोगी और मानवोचित सिद्धांतों की नए सिरे से मीमांसा  की है.उच्च शक्ति की विचार तरंगों,उद्दाम आकांक्षाओं,पृकृति प्रदत्त अवदानों की सहज प्राप्ति इत्यादि विषयक वैज्ञानिक विश्लेषणों के साथ इस पुस्तक में वह सब कुछ है जो एक खुशहाल और जिंदादिल व्यक्ति,समाज और राष्ट्र के लिए अनुकरणीय है.'रोन्दा वार्न' ने इस पुस्तक के समानांतर  एक लघु फिल्म भी इसी विषय को लेकर बनाई है.डा जान ग्रे ,डा जान डेमार्तिनी ,डा जेम्स रे इत्यादी दर्जनों उद्भट विद्वान् दार्शनिकों ,मनोवैज्ञानिकों ,लेखकों और समाजशास्त्रियों को इस पुस्तक में उल्लेखित किया गया है.
      पुस्तक में लेखिका ने अप्राप्त की प्राप्ति,इच्छा  शक्ति की असीम प्रबलता,प्रकृति-पदार्थ और मनोभावों के आपस में अवगुंठित ताने -वाने को सप्रमाण और जीवंत रेखांकित किया है.चेतन-अचेतन,व्यक्ति-समूह,ब्रम्हांड-पिंड और उर्जा-पदार्थ के आपसी रिश्तों में मानवीय जीवन को आनंदमय ,निरापद और सफलतम बनाने के जो सूत्र इस पुस्तक में उपलब्ध हैं वे सभी कभी न कभी कहीं-न-कहीं यत्र-तत्र-सर्वत्र इस धरती पर या तो आजमाए जा चुके हैं या आजमाए जा रहे है.
       न केवल    इस पुस्तक की लेखिका अपितु इस पुस्तक में उल्लेखित  अन्यान्न विद्वत जनों में अधिकांश या तो बाइबिल प्रेरित है याआधुनिक पाश्चात्य दर्शन से प्रभावित है. भारतीय प्राच्य वांग्मय से वे नितांत  अनभिग्य से लगते है.
 .मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं की इस पुस्तक का सार  गीता के किसी एक श्लोक के चतुर्थांश के बराबर भी नहीं है.यह पुस्तक निसंदेह किसी निराश इंसान को "सकल पदार्थ हैं जग माहीं!कर्महीन नर पावत नाहीं!!से आगे नहीं ले जा सकती ;किन्तु गीता तो व्यक्तिगत  लौकिक या  पारलौकिक उपलब्धियों  से भी आगे न केवल जीवन संग्राम में अपितु मानसिक संवेदनाओं के हाहाकार में भी जीवन को उजास प्रदान करने में समर्थ है.,
   प्रस्तुत पुस्तक में 'कृतज्ञता'का महत्व  कुछ इस तरह प्रतिपादित किया गया है कि भारतीय परम्पराओं और लोकाचार को यदि लिपिबद्ध कर उसे किसी खास  पुस्तक की शक्ल में प्रकाशित किया जाए तो अमेरिकी बौद्धिक संपदा के रहनुमा उसे रातों रात अपने नाम से पेटेंट कराने से नहीं चूकेंगे!

    "कृतज्ञता का अभ्यास मेरे  लिए  बहुत ज़बरदस्त सावित हुआ है.हर सुबह में जल्दी उठकर सबसे पहले जब फर्श पर पैर रखता हूँ तो 'धन्यवाद'[धरती को ]कहता हूँ/................................उन चीजों को याद करता हूँ ,जिनके लिए में कृतज्ञ हूँ......................में इसे ब्रह्मांड की ओर भेज रहा हूँ.........कृतज्ञता की भावनाएं महसूस कर रहा हूँ....."
               डा जेम्स रे ' को इसी पुस्तक के पृष्ठ ७५ [हिंदी अनुवाद] पर उक्त कोटेशन के साथ उद्धृत किया गया है.
    भारत में ५ हज़ार वर्ष पूर्व रचित आर्ष ग्रुन्थों और गुरुकुल परम्पराओं में सहस्रों उदहारण मौजूद हैं.जहां गुरु शिष्य ,के उदाहरण में आरुणि-विरोचन,रघु-वशिष्ठ,चन्द्रगुप्त-चाणक्य,शिवाजी-समर्थ रामदास और गाँधी-गोखले के उदाहरन मौजूद हैं. माता-पिता के प्रति राम और श्रवणकुमार के  बलिदान जग जाहिर हैं.
  सुन जननी सोई सूत बडभागी !जो पितु -मात चरण अनुरागी!!
  तनय मातु-पितु तोषनिहारा! दुर्लभ जननिं सकल संसार!!
         इस तरह के असंख्य उदहारण भारतीय वांग्मय में उपलब्ध हैं,किन्तु बिडम्बना यह है कि जहां प्रस्तुत पुस्तक द सीक्रेट'सीधे -सीधे सरल लफ्जों में बिना किसी विराट महाकाव्यात्मक आख्यान के ही मानवीय ज्ञानामृत का रसास्वादन करती है ;वहीं भारतीय और प्राच्य ज्ञान रूपी मणि-माणिक्यों को कुछ इस तरह पेश करने की परम्परा सी रही है कि जब तक एक ट्रक भूसा नहीं छानोगे तब तक सुई नहीं मिलेगी. इतना ही नहीं आगम -निगम ,पुराणों में तो जिस तरह की अलिफ़ लेलाई किस्म की कथात्मकता में ज्ञानामृत छिपाया गया हैउसके नकारात्मक पहलु न केवल दीर्घसूत्रता में आये हैं अपितु समाज के श्रमिक,सर्वहारा और कामगार  नर-नारियों को उससे महरूम रखने के क्षेपक  भी घुसेड़े गए हैं.भाषाई जटिलता और आम जनता की निरक्षरता से न केवल भारतीय उप्म्हद्वीप अपितु दुनिया के तथकथित सभ्य और शुशिक्षित समाजों तक वो ज्ञान नहीं पहुँच पाया जो 'रोन्दा वार्न 'के लिए रहस्य है और जिसको उन्होंने कुछ इस अंदाज़ में पेश किया है कि उन्हें दुनिया में किसी खास नए रहस्य का पता चला है सो उन्होंने 'द सीक्रेट ' में दुनिया के सामने ओपन किया है?
        श्रीराम तिवारी

रविवार, 4 दिसंबर 2011

जनसंख्या नियंत्रण के बिना भारत ओर चीन का उद्धार नहीं....

   अपने दुसरे कार्यकाल के अंतिम दिनों में तत्कालीन अमेरिकन  प्रेसिडेंट मिस्टर जार्ज बुश [जूनियर]ने फ़रमाया था"भारत और चीन के लोग चूँकि अब ज्यादा खाने लगे हैं [अर्थात पहले तो भुखमरे ही थे?]इसलिए अमेरिका और शेष विकसित देशों पर आर्थिक मंदी की मार पडी है"अभी कुछ दिनों पहले वर्तमान प्रेसिडेंट ओबामा ने फ़रमाया "अमेरिकी युवाओं को शंघाई और बंगलुरु से टक्कर लेने का माद्दा रखना होगा"वास्तव में इन वक्तव्यों के पीछे की मंसा भले ही कुंठित हो किन्तु सचाई यही है किभारत और चीन में एक नव -धनाड्य वर्ग  तो जरुर समृद्ध हुआ है ,भले ही गरीव और अमीर के बीच की खाई बेतहासा बड़ी हो.चूँकि भारत और चीन की जनसंख्या वाकई दुनिया की एक तिहाई के करीब पहुँचने वाली है जबकि जमीनी हिस्सा १/२० भी नहीं है.इस सूरते हाल में विराट श्रम शक्ति के काल्पनिक आधार और गैर जिम्मेदार वित्त नियोजन  को अर्थ व्यवस्था का उन्नायक कैसे कहा जा सकता है ?
   नव उदारवाद के रास्ते पर कुलांचे भरते हुए भारतीय अर्थ-व्यवस्था ने आर्थिक वृद्धि दर की जो कल्पना की थी
   वह आज अपने अंतिम अंजाम से मीलों दूर पहले भारतीय पूंजीवादी राजनीतिज्ञों को आगाह कर रही है कि  मात्र व्याज दरों में कमी वेशी करने ,विदेशी निवेश बढाने,जन-कल्याणकारी मदों से सरकारी इमदाद में कमी करने और वित्तीय पूंजीगत लाभों को राष्ट्र विकाश का माडल भर मान लेने से  अर्थ व्यवस्था को सुरखाव के पंख  नहीं लगने वाले हैं.जनसँख्या को नियंत्रित किये बिना क्या होगा? खेती के लिए और उद्द्योगों के लिए जमीने क्या आसमान से आयेंगीं?पीने का पानी और उसी अनुपात में शुद्ध आक्सीजन के लिए शुद्ध वायुमंडल भी होना चाहिए कि नहीं?केवल व्यापारिक ताने-बाने से ये सब हासिल नहीं होगा.
             खुदरा व्यापार के मल्टी ब्रांड में १००%और एकल जिंसों में ५१%ऍफ़  डी  आई को आर्थिक सुधारों की संजीविनी निरुपित करते हुए ,एम् एन सी और उनके वैश्विक  नियामक नियंताओं ने  वर्तमान नव उदारवादी भारतीय  देशी शासक वर्ग को भीवेहद उहापोह की स्थिति में ला खड़ा कर दिया है.ऊपर से भले ही यह दिखाने की कोशिश की जाती रही है  कि  भारतीय और चीनी अर्थ व्यवस्थाएंवैश्विक आर्थिक संकट की  काली डरावनी -विनाशकारी घटाओं से   कमोवेश  सुरक्षित हैं ;किन्तु जानकारों की आशंकाओं को यत्र-तत्र-सर्वत्र साकार देखा जाने लगा है.यदि चीन और भारत को एक बाज़ार समझकर विकसित देश, अपने आर्थिक संकट से निजात पाने के लिए, अपने अति शेष उत्पादों को इन विकाशशील राष्ट्रों में खपा कर ;अपना उद्धार करना चाहते हैं तो इसमें किसी को तब तक कोई आपत्ति नहीं जब तक उसके हितों पर आंच नहीं आती.अब यदि भारत और चीन की जनता को लगता है कि उनके हितों को खतरा है तो वे ऍफ़ डी आई समेत उन तमाम पश्चिमी पूंजीवादी हथकंडों का विरोध क्यों नहीं करेंगे?विकीलीक्स के ताजे खुलासों में भारत और चीन पर अमेरिकी नीति निर्माताओं के तत विषयक उद्देश्य स्पष्ट होने लगे हैं.
                चीन की अर्थव्यवस्था  विशुद्ध साम्यवादी व्यवस्था के दौर में नितांत सफल,निरापद और निष्कंटक हुआ करती थी;किन्तु सोवियत पराभव से आक्रांत होकर देंग शियाओ पिंगके अनुयाइयों  ने जिस तरह से अर्ध पूंजीवादी अर्ध साम्यवादी खिचडी  पकाई उससे  निसंदेह चीन को आधारभूत संरचनाओंमें आशातीत  सफलता  और तीव्र औद्यौगीकरन  की मृग मरीचिका का दिग्दर्शन भले ही हुआ हो किन्तु अब उसके लिए आगे कुआँ और पीछे खाई है  चीन की अर्थव्यवस्था का संकट प्रारंभ हो चला है.विगत तीन सालों में लगातार आर्थिक रफ़्तार घटने और विनिर्माण क्षेत्र सिकुड़ने के संकेत मिलने लगे हैं.यही वजह है कि चीन को मजबूरन अपनी मौद्रिक नीति को नरम करने की आवश्यकता आन पडी है'.चाइना फेड्रेसन आफ लाजिस्टिक्स एंड perchesing के अनुसार नवम्बर में  पी एम् आई घटकर ४९ पर आ गिरा है  जबकि अक्तूबर में ५०.४ था.उसके निर्यात में अप्रत्याशित गिरावट और अन्दुरुनी प्राकृतिक झंझावातों ने राजकोषीय घाटे को वैश्विक देनदारियों के समकक्ष ला खड़ा कर दिया है.मजदूर,कर्मचारी ,किसान और वेरोजगार युवाओं में वर्तमान चीनी शासकों के प्रति अवज्ञा का भाव पैदा हो चला है .हड़ताल,प्रदर्शन और सत्ता प्रतिष्ठान विरोधी गतिविधियाँ अब चीन में आम हो चली है .चीन का मीडिया सिर्फ वही बतलाता है जो वर्तमान शासकों और पूंजीवादी संसार को लुभाता हो.चीन की कोम्मुनिस्ट पार्टी अब मार्क्स,लेनिन और माओ के जनवादी सिद्धांतों-वास्तविक साम्यवादी व्यवस्था  से पदच्युत होकर केवल पेंशन भोगियों और सत्ता के दलालों की एकांगी दिग्भ्रमित नाम मात्र की साम्यवादी होकर रह गई है.यही वजह है कि जनसंख्या नियंत्रण ,कृषि उत्पादन में आनुपातिक वृद्धि और समतामूलक समाज व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों से भटकती हुई चीन की वर्तमान हु जिन्ताओ सरकार वैश्विक बाजारीकरण की राह पर  चलते हुए हाराकिरी  की ओर अग्रसर है.जनसँख्या  नियंत्रण के कठोर और वैज्ञानिक उपायों के बिना  चीन का भविष्य तो खतरे में है ही किन्तु भारत को प्रकारांतर से इससे  बेजा खतरा हो सकता है.
          भारत में कृषि उत्पादन,जनसँख्या बृद्धि तथा  सार्वजनिक वितरण व्यवस्था इत्यादि महत्वपूर्ण विषयों को वर्तमान यु पी ऐ सरकार के अजेंडे में कोई खास महत्व नहीं है.उत्तम गुणवत्ता के बीज,उर्वरक,सिचाई,बिजली,की किल्लत का आलम यह है कि हजारों क़र्ज़ ग्रस्त  सीमान्त किसानों ने विगत ५-६ सालों में आत्म हत्या कर ली .महंगाई,भृष्टाचार और आधुनिकीकरण पर तो फिर भीजनता और मीडिया कि  निरंतर सक्रियिता बनी हुई है किन्तु जनसँख्या नियंत्रण,पर्यावरण,प्रदूषण,अनुत्पादक श्रम नियोजन तथा सार्वजनिक वितरण व्यवस्था पर न तो जन मानसगंभीर है  और न ही राज्यसत्ता के हितग्राहियों को उतनी उत्कंठा या व्यग्रता है जितनी की सांसदों के भत्ते बढवा लेने,विदेशी निवेशकों को लाल कालीन बिछाने या कारपोरट लाबी के सरोकारों को उनके हितों  के परिप्रेक्ष्य में परिपूर्ण करने की व्यग्रता रहती है.राजनीतिक भृष्टाचार और अफसरों की लूटखोरी ने देश को अन्दर ही अन्दर खोखला कर डाला है.  यही वजह है कि विगत जून २०११ में भारत का विदेशी ऋण  ३१६.९ अरब डालर तक जा पहुंचा जो मार्च २०११ में ३०६.५ डालर था.विदेशी वाण्जिक उधारियों  को विनियमित करने ,अनिवासी भारतीयों के द्वारा जमा राशियों पर इंटरेस्ट रेट  को युक्ति संगत बनाए जाने की चर्चा भी पक्ष -विपक्ष नहीं करता.इन सभी मशक्कतों का परिणाम यह कि' ऊँट के मुंह में जीरा'.वाली कहावत ही चरितार्थ हो सकती है.
     भारतीय मीडिया का एक खास हिस्सा हैजो बाबाओं,समाज सेवकों ,धर्म गुरुओं और गैर राजनैतिक आवरण में छिपकर विशुद्ध राजनीती करने में निरंतर जुटे निहित स्वोर्थियों को राजनीती का समस्थानिक सिद्ध करने में  व्यस्त है.  देशी-विदेशी इजारेदारों की गिरफ्त वाला मीडिया भी अपने नव उदारवादी अजेंडे पर काम करते हुए कभी १-२-३,एटमी करार,कभी रिटेल में ऍफ़ डी आई  और कभी राष्ट्र्रीय सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथो में सौंपने का वातावरण तैयार करता रहता है.यह पूंजीवादी दुमछल्ला  वैश्विक  नव  उदारवादीआर्थिक उद्घोष  इतने यकीन से करता है कि इसका असर न केवल भारत और चीन बल्कि तीसरी दुनिया के अन्य  देश भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहते.राष्ट्रीय मुख्य धारा के मीडिया को स्वनियंत्रण सीखना होगा और जन संख्या नियंत्रण,साम्प्रदायिक पाखंड और एन जी ओ रुपी परजीवी अमर्वेलों पर प्रतिघाती कदम उठाना चाहिए.
    विगत दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ ने च्र्तावनी दी है कि दुनिया एक और आर्थिक मंदी की चपेट में आ सकती है.वर्ष २०१२ में दुनिया की आर्थिक विकाश दर धीमी होती चली जायेगी और भारत तथा चीन जैसे तथाकथित उभरती अर्थव्यवस्था वाले देश भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे.चीन और भारत के बारे में मिस्टर ओबामा का काल्पनिक भयादोहन भी अब असरकारक नहीं होगा.संयुक राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार यूरोप ,अमेरिका और तथाकथित एशियन  चीतों की जान सांसत में होगी.नयी नौकरियों का आभाव ,बढ़ता क़र्ज़ संकट और वित्तीय क्षेत्रों में आ रही दुश्वारियों  के बरक्स नवउदारवादी   अर्थव्यवस्थाओं की नाकामी सारी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगी.भारत और चीन भी इस भयावह सुनामी  से  अछूते नहीं रह पायेंगे. जनसँख्या नियंत्रण के बिना 'किसी का गुजारा  नहीं.आवश्यकताओं की आपूर्ति ,जिंसों का उत्पादन और जनसँख्या में वैज्ञानिक आनुपातिक सामंजस्य होना चाहिए.केवल राजनीतिज्ञों या व्यवस्थाओं पर काबिज शक्तियों को कोसने से काम नहीं चलने वाला.भावी पीढीयाँ नारकीय यंत्रणा भोगने को अभिशप्त होंगी ;यदि वर्तमान पीढी ने अपने हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वहन ठीक से नहीं किया,अर्थात जनसंख्या नियंत्रण के ठोस और वैज्ञानिक उपायों का क्रियान्वन.
 अभी तक     आम धारणा रही है कि भारत और चीन में चूँकि श्रम सस्ता और कच्चा माल इफरात में मौजूद है  भारत और चीन दोनों हीपड़ोसी  देशों के विकसित देशों से व्यापार और वित्तीय रिश्ते गहरे हैं और विश्व अर्थ व्यवस्था को सहारा देने की क्षमता रखते हैं ,सहारा दिया भी है किन्तु वर्ष २०१२ में भारत की विकाश दर लुढ़कती हुई ७-७ से नीचे जाती दिख रही है .डालर के मुकाबले रुपया और युयान दोनों ही अब पस्त होते दिख रहे हैं ९% से ऊपर की आर्थिक विकाश दर और आशातीत आर्थिक अवलंबन में भारत और चीन अब विश्व के संकट ग्रस्त पूंजीवादी देशों को कुछ खास नहीं दे सकेंगे.भारत और चीन को अपने घरेलू रक्षात्मक संसाधनों में कटौती करते हुए दुनिया के अस्त्र उत्पादकों से पीछा छुड़ा लेना चाहिए.भारत चीन  को अपने यहाँ  ज्यादा नौकरियां पैदा करनी होंगी,सड़क-बिजली -बंदरगाह  जैसे अधोसंरचना क्षेत्र में निवेश बढ़ाना होगा.न केवल उर्जा खपत  नियंत्रण के उपाय करने होंगे बल्कि टिकाऊ उर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी.भारत के लिए स्थिति चीन से भी दुष्कर है .आंतरिक वाह्य  खतरों को केवल आतंकवादी या अलगाववादी ही नहीं बल्कि भारतीय अस्मिता को जमींदोज किये जाने के खतरे भी विद्यमान हैं . आर्थिक मंदी दुनिया को फिर से दस्तक देने लगी है ,भारत और चीन भी उससे से अछूते नहीं रह पायेंगे.दोनों सनातन पड़ोसियों को अपने सीमा विवादों को ठन्डे वसते में रख   देना चाहिए.खास तोर से चीन  के वुद्धिजीवियों,साहित्यकारों,छात्रों,युवाओं ,मजदूरों और किसानो की यह एतिहासिक जिम्मेदारी है की वे अपने शासक  वर्गों पर दवाव बनाएं ताकि वे     भारत के खिलाफ पाकिस्तान रुपी बिगडेल  निजाम का इस्तेमाल न करे.जहां तक भारतीय विदेश नीति का सवाल है ,वह पूरी तरह पारदर्शी ,विश्व बंधुत्व आधारित,अहिंसा,स्वतंत्रता और समानता के नीति निर्देशक सिद्धांतों पर अवलंबित है.आज़ाद भारत में विगत ६५ सालों में भारत की विदेश नीति को पूरे राष्ट्र ने उसे ही  तस्दीक किया जिसे  पंडित नेहरु के नेत्रत्व में उदीयमान भारत ने अपने शैशव काल में अनुप्रमाणित किया था. अब जो कुछ भी बदलना है या सकारात्मक कदम उठाना है वो चीन को  ही करना है.भारत तो अपने हिस्से के तमाम जिम्मेदारियां पहले ही पूर्ण कर चूका है.अब यदि पाकिस्तान के कंधे पर बन्दूक रखकर चीन अपने सनातन पड़ोसी और पंचशील प्रणेता   भारत को शत्रु मानकर चलता है तो उसमें चीन का ही नुक्सान ज्यादा है..

          श्रीराम तिवारी

रविवार, 27 नवंबर 2011

चल अन्ना घर अपने रेन भई यह देश...

 चाहे तथाकथित     अन्ना  हजारे   टीम  हो  ,बाबा रामदेव की  नाटक मण्डली हो या  उनके कन्धों पर चढ़कर राजनीति की उद्दाम आकांक्षा के तथाकथित गैर राजनैतिक  असंवैधानिक सत्ता केंद्र हों ,इन को गंभीरता से देश की जनता ने कभी नहीं लिया.एक सौ बीस करोड़ जनता में से भूले -भटके दस-बीस हजार भावुक भारतीयों और सत्ता विरोध का बाजारी उत्पाद बेचकर अपनी आजीविका चलाने वाले दक्षिण पंथी मीडिया और अधुनातन तकनीकी प्रौद्दोगिकी के संचालकों ने भले ही बहती गंगा में हाथ धो लिए हों किन्तु आम भारतीय जन-मानस ने अपनी राष्ट्रीय चेतना के नीति निर्देशक सिद्धांतों  पर कोई समझोता नहीं किया.
       अन्ना हजारे की बौद्धिक चेतना-राजनैतिक-आर्थिक-सामाजिक-वैदेशिक और जन -क्रांति विषयक समझ बूझ पर मुझे कभी कोई शक नहीं रहा.अपने ब्लॉग -इन्कलाब जिंदाबाद पर, प्रवक्ता.कॉम पर ,हस्तक्षेप.कॉम पर मेने जितने लेख प्रस्तुत किये वे इन तथ्यों  की स्व्यम्सिद्ध पुष्टि करते हैं.मुझे प्रारंभिक दौर में पूरा यकीन हो गया था कि राष्ट्रीय चेतना और मूलगामी बदलाव समेत भृष्टाचार इत्यादि बिन्दुओं पर अन्ना और रामदेव अपरिपक्व ही हैं.सोच समझ और मौलिक जनवादी चेतना या क्रन्तिकारी दर्शन कि अज्ञानता के वावजूद मेने कई मर्तवा अन्ना और रामदेव समेत  अन्य सत्ता विरोधी आवाजों को मुखरित होने  में सहयोग  किया.क्यों?
        जो लोग यह सोच रखते हैं कि सबकी बेहतरी में ही मेरा भी बेहतरी है,देश और दुनिया की भलाई में ही मेरी भी भलाई है ,सबकी बर्बादी में ही मेरी भी बर्बादी है और देश कि बर्बादी में मेरी बर्बादी असंदिग्ध है और  यदि देश को भृष्टाचार रुपी कठफुरवा अन्दर से खोखला कर रहा है तब में भी तो अन्दर से खोखला ही होता जा रहा हूँ!इत्यादी ...इत्यादि...स्वाभाविक है कि में भी इस कतार में खड़े होकर अपने हिस्से की आहुति के लिए तैयार रहूँगा.मैं जनता हूँ,मैं आम आदमी हूँ,मुझे जमाने भर के राजनैतिक -सामाजिक-आर्थिक और वैज्ञानिक परिवर्तनों  और उनके परिणामस्वरूप पृकृति प्रदुत्त अवदानो का कोई ज्ञान भले न हो किन्तु ' हित अनहित पशु पक्षिंह जाना 'तदनुसार यह भी स्वभाविक है की चाहे कोई राजनैतिक पार्टी हो ,व्यक्ति हो ,गैर राजनैतिक {?}बाबा या गांधीवादी समाज सुधारक होयदि वह इस तरह के सैधांतिक सुधारों की अपेक्षा प्रकट करता है तो  उसके स्वर में स्वर मिलाकर अपने सामूहिक हितों की रक्षा करना मेराभी  कर्तव्य है.भले ही वैचारिक और दार्शनिक स्तर पर अन्ना और रामदेव जैसे व्यक्तियों का सरोकार शून्य है किन्तु वे बिजुका  ही सही ,कागभागोड़े  ही सही देश की जनता के एक हिस्से -खास तौर से उत्तर भारत के मध्यम वर्ग को उद्देलित करने  का काम तो कर ही रहे थे.भले ही चेनई ,त्रिवेंदृम या हैदरावाद में इनकी पूंछ परख न हो किन्तु दिल्ली के राम लीला मैदान से लेकर हरिद्वार और रालेगन सिद्धि तक तो बोलबाला था ,इसमें किसी को कोई शक नहीं.ये विजूके कुछ हद कारगर हो रहे थे कि "बस एक ही थप्पड़"ने किये कराये पर पानी फेर दिया.
     बाबा रामदेव तो तभी खाली कारतूस सावित हो चुके थे जब दिल्ली पुलिस के डर से सन्यासी पीत वस्त्र त्याग कर महिला वस्त्रों में छिप -छिपाकर जान बचाने की जुगत में जग हँसाई के पात्र बन गए थे.किन्तु अन्ना रुपी बिजुका फिर भी कारगर लग रहा था.दिल्ली में उनके अनशन के ५ वें रोज तो भारत के भड़काऊ-डरावु-उडाऊ-खाऊ मीडिया ने कभी थ्येन आन मन चौक कभी तहरीर चौक तो कभी क्रेमलिन स्कुँयर की उपमा से अन्ना एंड कम्पनी के उपक्रम को महिमा मंडित किया ही था.किन्तु जिस तरह शेर की खाल ओडने से सियार सिंह नहीं जाता या मात्र काला होने से कौआ कोयल नहीं हो जाता उसी तरह गाँधी टोपी लगाने और नैतिकता की हांक लगाने या सत्याग्रह का स्वांग रचाने से कोई गांधीवादी नहीं हो जाता .चलो मान भी लेते हैं की आप सच्चे गांधीवादी ही हैं तो?इससे क्या फर्क पड़ता है स्वयम गाँधी जी ने और उनके वाद उनके महानतम पत्तशिष्यों
-जे.पी.नेहरु,कृपलानी,विनोवा,मोरारजी,इंदिराजी,राजाजी,सीतारामैयाजी जी,से लेकर देश के तमाम वामपंथी और दक्षिणपंथी गांधीवादियों ने आजादी के ६४ साल में  उस तथाकथित 'गांधीवाद'से क्या हासिल किया है?
 पूरा देश एकमत से मानता है कि व्यवस्था परिवर्तन के बिना भृष्टाचार से देश और देश की जनता की मुक्ति संभव नहीं!गांधीवाद तो यथास्थ्तिवाद का पर्याय है.शरद पवार भी पुराने गांधीवादी हैं  किसी ने यदि उन्हें एक थप्पड़ जड़ दिया तो दूसरा गाल उस हमलावर के सामने करने में चूक क्यों?शरद पंवार की पार्टी राकपा भी तो गांधीवादी ही है ,फिरइस क्षेत्रीय पार्टी के वफादारों {गांधीवादियों?}के मार्फ़त  पूरे महाराष्ट्र में हिंसा का तांडव क्यों?क्या अन्ना ,क्या शरद पंवार सब एक ही बांस भिरे  के झंडा वरदार हैं.तभी तो शरद पवार को लगे थप्पड़ पर अन्ना ने जो आप्त बचन उच्चरित किये'बस एक ही थप्पड़' वे खुद अन्ना के दोनों गालों पर और न केवल अन्ना एंड कम्पनी बल्कि पूरी की पूरी तथाकथित गांधीवादी बिरादरी के गालोँ पर दोगलेपन की कालिमा का कलंक बनकर ;सत्याग्रह'अनशन और अहिंसा के सिद्धांतों  की छाती पर अठ्ठास कर रहे हैं.
     अन्ना हजारे की सोच ,समझ और प्र्ग्याशक्ति के सन्दर्भ में देश के प्रबुद्ध वर्ग ने  भी गच्चा खाया हैयह तो होना ही था.अलबतता .जो उन्हें बिजुका मानकर भृष्टाचार रुपी हिंसक जंतुओं से भारत रूपी खेत की रक्षा के  लिए  उपयुक्त मानकर चल रहे थे उनकी सदाशयता को जरुर धक्का लगा होगा.एक मजबूत लोकपाल बिल बने ,देश में आनैतिक लूट खसोट बंद हो,समानता,बंधुत्व,शांति,और समृद्धि में सभी को बराबर अबसर मिले और इस महान उदेश्य के लिए जो कदम उठाये जा रहे हैं वे किसी विक्षिप्त युवा के एक थप्पड़ से धुल धूसरित न हों इसके लिए जरुरी है कि अन्ना को अपने संगी साथियों समेत संयमित होना होगा.कभी शराबियों को पेड़ से बाँधने और कोड़े मारने के तालिवानी वयां ,कभी किसी पार्टी या उसके नेता को चुनाव में हराने का बयान ,कभी कहना कि 'बस एक थप्पड़'ये किसी उच्च विचारधारा के प्रमाण नहीं.धीरोदात्त उज्जवल धवल चरित्र के स्वामी ,मनसा बाचा -कर्मणा और सामूहिक नेत्र्त्वाकारी व्यक्तित्व के धनि व्यक्ति ही    जनता जनार्दन का विश्वाश हासिल कर सकते हैं चापलूसों  दुवारा लिखी पटकथाओं के संवाद बोलकर लोक प्रसिद्धि भले ही मिल जाये किन्तु धैर्य और बुद्धि चातुर्य की परीक्षा तो संघर्षों के दरम्यान बार-बार हुआ करती  है तब मौन वृत से काम नहीं चलेगा और अनर्गल बाचालता तो नितांत वर्जनीय है.अच्छे -खासे जन आन्दोलन को पंचर करने में लगी अन्ना टीम अपनी असफलता का ठीकरा सरकार या राजनीतिज्ञों पर ढोलने लग जाए ये भी संभव है.शरद पवार को थप्पड़ मारे जाने पर अन्ना की प्रतिक्रिया ने खुद अन्ना टीम को 'विश्वाश के संकट'में धकेल दिया है .खुदा खेर करे!!!
     श्रीराम तिवारी
 

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

विश्व पूंजीवाद के स्वर्णिम दिन लदने को हैं

एक  ध्रुवीय   गतिज उर्जा के नकारात्मक परिणाम उसके सृजनहार द्वारा छुपाये नहीं छुप रहे हैं.सोवियत समाजवादी व्यवस्था की जड़ों में मठ्ठा डालने वालों को अब दुनिया भर में अपनी फजीहत कराने में भी शर्म नहीं आ रही है.पेंटागन आधारित और बहुराष्ट्रीय एकाधिकारवादी कम्पनियों द्वारा निर्धारित वैश्वीकरण की पूंजीवादी आर्थिक नीतियों के दुष्परिणाम अब अमेरिका तक  सीमित नहीं रहे.श्री ओबामा जी लाख चाहें  कि अमेरिका अपने संकट कोशेष विश्व के कन्धों पर लादकर अपने परंपरागत पूंजीवादी-साम्राज्यवादी निजाम को बरकरार रख ने में बार -बार कामयाब होता रहे,किन्तु नियति को या यों कहें कि आधुनिक विश्व चेतना को ये मंजूर नहीं.अमेरिकी प्रशासन को ज्ञात हो कि 'रहिमन हांडी काठ कि ,चढ़े न  बारम्बार..'या   'ये इश्क नहीं आशां इतना समझ लीजे,इक आग का दरिया है;डूब के जाना है.' उधर आर्थिक संकट से जूझ रहे ग्रीस {यूनान}को राहत देने के लिए' यूरोप संघ 'ने प्रस्ताव का प्रारूप  तैयार ही किया , कि  इधर इटली ,फ़्रांस की आर्थिक बदहाली के अफ़साने भी  मीडिया की जुबान पर आ ही गए.यूरोपीय यूनियन अर्थात यूरोजों के  वित्त मंत्रियों की  जनरल बॉडी मीटिंग के बाद सभी सम्बंधित देशों और उनके बैंकों को चेतावनी दी गई की वे अपने-अपने घाटे कम करें.ग्रीस के आर्थिक संकट ने न केवल यूरोपीय संघ ,न केवल उसके हमराहएवं  घोर पूंजीवाद परस्त -सरपरस्त अमेरिका,बल्कि सारी  वैश्विक वित्त मण्डली को बैचेन कर डाला है.पूरी दुनिया के पूंजीवादी अलमबरदार बड़ी -बड़ी बैंकों और पूँजी संचलन केन्द्रों पर दवाव बना रहे हैं कि इस अधोगति और बदनामी से बचाने के पूंजीवादी उपचारों को खंगालिए. ,हमारी ठेठ हिंदी में इसे यों कहा जाता है कि 'मस्के पाद महा पापी-उत्तम्पाद धड़कानाम' अर्थात अपान वायु को  विसर्जित करने का अधम तरीका तो हुआ 'मसकैं-पाद' और उत्तम तरीका हुआ धड़कानाम !!!
       चूँकि वर्तमान दौर के यूनानी आर्थिक संकट की धुरी विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के मार्फ़त सम्पूर्ण यूरोप और उसके सहयात्री अमेरिका के मर्मस्थल में धसी हुई है,अतएव यूरोपीय यूनियन पर दुनिया भर के सभ्रांत लुटेरों का बेजा दवाव है की इस मौजूदा  आग की लपटों को फ़ौरन शांत किया जाए.यही वजह है कि लगभग दिवालिया हो चुकी इटली की अर्थ व्यवस्था और अधःपतन को प्राप्त हो चुकी फ़्रांस की अर्थ व्यवस्था के वावजूद यूरोपीय संघ द्वारा  विगत सितम्बर में रोकी गई सहायता लगभग आठ अरब यूरो के रूप में ग्रीस को तत्काल दिए जाने का ऐलान किया जा रहा है.५.८ अरब यूरो की रुकी हुई मदद राशी भी शीघ्र जारी किये जाने की  सम्भावना है.
       यूनान की आंतरिक राजनीती का ज्वार भी उफान पर है.उपरोक्त ऋण राहत पैकेज पर जनमत संग्रह के ऐलान से बाज़ार हक्के-बक्के हैं.इससे यूरोप के नेता बेहद नाराज हैं.हलाकि फ़्रांस ने राहत पैकेज को अंतिम विकल्प बताया किन्तु स्वयम फ़्रांस की स्थिति ये है की निकोलस सरकोजी को स्वयम  वेतन नहीं लेने की घोषणा करनी पड़ रही है.इटली की जर्जर आर्थिक दुरावस्था को स्थिरता प्रदान करने केलिए  बर्लुस्कोनी शीर्षासनलगा रहे है.चौतरफा संकट की स्थिति में इटालियन बांड्स भारी दवाव में आ चुके हैं.यूरो क्षेत्र का संकट लगातार फैलता जा रहा है.डालर के मुकाबले यूरो की विनिमय दर घटकर १.३६०९ यूरो रह गई है.इस ताज़ा उठापटक से यूरोपीय बाज़ारों में ५%से ज्यादा गिरावट रेखांकित की गई है.इटली के लिए स्थिति असहज हो चुकी है.आम जनता सड़कों पर निकल चुकी है,फ़्रांस में हड़तालों का दौर जारी है.
     उधर अमेरिका में २००८ की आर्थिक मंदी की मार के घाव भरे भी न थे किअचानक चार-चार विशालकाय बैंक धराशाई होते चले गए.इनके सहित मौजूदा आर्थिक सत्र में भूलुंठित बेंकों कि संख्या ८४ हो चुकी है .अमेरिका में आभासी वित्त पूँजी की अनुपलब्धता की वजह से बेंकों का कारोबारी संकट आम हो चला है.इससे पहले २०१० में १५७ अमेरिकी बैंकें अपना बोरिया बिस्तर बाँध चुकी हैं.अपने असीमित अंतर्राष्ट्रीय हितों के बहाने ,आतंकवाद से लड़ाई के बहाने ,दुनिया भर में थानेदारी का रौब बरकरार रखने के फेर में अमेरिका पूंजीवादी साम्राज्यवाद का सूर्यास्त निकट है.वाल स्ट्रीट कब्ज़ा करो 'आन्दोलन इस दिशा में क्रांति की भोर का तारासावित हो सकता  है.
       
  श्रीराम तिवारी