सनातन धर्म की रक्षा हेतु, बंगाल की जनता ने जिन्हें चुना, उन महान हिंदू वीर शुभेंदु अधिकारी को संत समाज का भरपूर आशीर्वाद
गुरुवार, 6 अगस्त 2026
डकैती जो आस्तीन के सांप वाली होती है!
संसद के समक्ष संत समाज का मजाक बनाने वाले बरसों पहले बिहार में एक बदनाम गुंडा मर्डरर हुआ करता था,पप्पू कहीं तू वही तो नहीं जिसने सीपीएम के कई बेकसूर कामरेडों की हत्या की है? अबे हत्यारे पप्पू यादव! तू यदुनंदन नहीं हो सकता ! अवश्य ही गर्दभनंदन होगा। तेरे जैसे गुंडे को मंदिर और संत समाज से क्या वास्ता? जो लोग मंदिर में चोरी के लिए छाती पीट रहे हैं, वे दरसल कुंठित या मनोरोगी हैं, जिन्हें अभी तक मंदिर प्रवेश नसीब नहीं हुआ।
*तस्लीमा नसरीन*
*तस्लीमा नसरीन*
यदि स्वामी विवेकानंद देख पाते तो.....
यह स्वामी विवेकानंद का हिंदू-मुस्लिम एकता और भारत के भविष्य के लिए दृष्टिकोण है।
मोदीजी ने गाली बाज बेशर्म तिलचट्टों को माफ कर दिया
खबर है कि मोदीजी ने गाली बाज बेशर्म तिलचट्टों को माफ कर दिया है! लेकिन हम तो समझे थे कि मोदी ही भारत है! मोदी की तारीफ याने भारत की तारीफ! भारत की तारीफ याने मोदी की तारीफ! मोदी जी को गाली याने भारत को गाली! भारत को गाली याने हर देशभक्त भारतीय को गाली। मोदी को गाली याने हर भारत माँ के लाल- याने हर वतन परस्त को गाली! गालीबाज गद्दारों को माफ करने का अधिकार अकेले मोदी को कतई नहीं है।देश की एक अरब सभ्य जनता को तय करना है कि जंतरमंतर के गालीबाज गद्दारों के साथ क्या सलूक किया जाए? जय श्री राम
अमेरिका -- भारत -- और -- तिलचट्टा ----
शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026
घूसखोर पंडत
यह जग जाहिर है कि भारत दुनियाका सबसे बड़ा लोकतंत्र है।जितनी राजनैतिक पार्टियां भारत में हैं,जितनी राजनैतिक विचारधाराएं भारत में हैं,जितने वोटर भारत में हैं और जितना धन भारतीय चुनावों में किया जाता है,उतना दुनियां के किसी अन्य राष्ट्र में नहीं। लेकिन भारतीय राजनीति और भारतीय लोकतंत्र की ये विशेषताएं संभवतः उतनी मह्त्वपूर्ण नहीं जितनी की 'जातीयता'! दरसल भारतीय राजनीति का सारतत्व लोकतंत्रात्मक व्यवस्था नहीं,अपितु दुर्भाग्य से यहां चुनावों में प्रयुक्त होता जातीयतावाद ही सर्वाधिक असरकारक है।
आजादी से पहले ही ब्रिटिश सरकार के मैकाले जैसे इंटेलेक्चुअल्स सलाहकारों ने गुलाम भारत में जातीयता के विभाजनकारी बीज बो दिये थे। आजादी के दस पंद्रह साल पहले ही अंग्रेजों ने हिन्दू- मुस्लिम सवर्ण-अवर्ण और एस सी/एसटी के भेद आधारित सामाजिक सुधारों के बहाने गुलाम भारत में सामाजिक एवं जातीय अलगाव के बीज वो दिये थे। इस विभाजनकारी नीति को अप्लाय करने का एकमात्र उद्देष्यथा -भारत में चल रहे स्वाधीनता आंदोलन को कुचलना। जाहिर है की संविधान सभा के अधिकांश सदस्य इंग्लैण्ड में पढ़ें लिखे बैरिस्टर ही थे,इन तमाम भारतीय बुद्धिजीवियों पर जातीयता का पुरजोर असर होना स्वाभाविक था ।संविधान सभा के अध्यक्ष बाबू राजेंद्रप्रसाद, सदसयगण - राजऋषि पुरषोत्तमदास टंडन,पंडित मदनमोहन मालवीय,पंडित गोविन्दवल्ल्भ पंत,के एम मुंशी , और सीनियर ड्राफटि श्री वी एन राव साहब के विरोध के बावजूद, संविधान सभा के अधिकांश सदस्य अंग्रेजों के प्रभाव के पक्षधर रहे.भारतीय संविधान सभा के प्रमुख संपादक डॉ बी आर आंबेडकर ने अंग्रजों के लिखे संविधान में कुछ मामूली फेरबदल करके जातीय आधारित संविधान सम्पादित कर,भारत में जातीय लोकतंत्र की नीव रखी।
आजादी के बाद ७० बरस तक भारत में जातीय आधारित चुनाव होते रहे और उसी जातीय आधार पर रेवड़ियां बटतीं रहीं। आजादी के बाद जिन आरक्षित जातीय समूहों ने सत्ता पर कब्जा किया वे गुणात्मक रूप से सम्पन्न होते चले गए। धनवान उच्च वर्ग ने वक्त की नजाकत को समझ और देश के आरक्षित समूहों से सैटिंग करली।
चंद अभिजात्य वर्ग की सम्पन्नता को संविधन निर्माताओं ने सम्पूर्ण सवर्ण समाज की सम्पन्नता समझकर गरीब,बेरोजगार भूमिहीन सवर्णों पर असहनीय अत्याचार किये। हालाँकि यह कटु सत्य है की जातीय आरक्षण के बावजूद, अधिकांश दलित/आदिवासी /,पिछड़े अभी भी गरीबी रेखा के नीचे हैं। यह बात जुदा है की आरक्षित वर्ग के कुछ घराने पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का आनंद लेरहे हैं। क्रमशः। .........
