रविवार, 22 सितंबर 2019

संघर्षों की सही दिशा है......

माल गपागप खाएं चोट्टे,
कसर नहीं हैवानी में।
मंद मंद मुस्काए हुक्मराँ,
गई भैंस जब पानी में।।
सुरा सुंदरी पाए सब कुछ,
सत्ता की गुड़ धानी में।
जनगणमन को मूर्ख बनाते,
शासकगण आसानी में।।
लोकतंत्र के चारों खम्बे,
पथ विचलित नादानी में।
लुटिया डूबी अर्थतंत्र की,
मुल्क हुआ हैरानी में।।
व्यथित किसान छीजते मरते,
क़र्ज़ की खींचातानी में।
कारपोरेट पूँजी की जय जय,
होती ऐंचकतानी में।।
निर्धन खूब लड़ें आपस में,
जाति धर्म की घानी में।
नेता अविरल जुटे हुए हैं,
काली कारस्तानी में।।
बलिदानों की गाथा भूले,
लिखकर भरी जवानी में।
संघर्षों की सही दिशा है ,
भगतसिंह की वाणी में।।

मोदी है तो मुमकिन है

मोदी है तो मुमकिन है' और निम्नांकित महागाथा के तमाम तथ्य भी मुमकिन हैं!
मोदीजी ने दो बार जन्म लिया - पहला 29 अगस्त 1949 को (उनकी डिग्री पर) और दूसरा 17 सितंबर 1950 को (सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध)।
1950 में पैदा हुए मोदीजी ने 6 साल की उम्र में वडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेची थी, लेकिन वडनगर में केवल ट्रैक ही गुजरते थे। वास्तविक रेलवे स्टेशन 1973 में बनाया गया था, जब मोदी 23 साल के थे।
मोदीजी आपातकाल के दौरान भूमिगत थे लेकिन उन्होंने 1978 में दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की!
मोदीजी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक प्रमाणपत्र के बिना ही1983 में गुजरात विश्वविद्यालय से संपूर्ण राजनीति विज्ञान में परास्नातक किया।
मोदी दुनिया के एकमात्र व्यक्ति हैं जिनके पास संपूर्ण राजनीति विज्ञान में मास्टर्स डिग्री है। यहां तक ​​कि गुजरात विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों को 2014 के बाद इस पाठ्यक्रम का पता चला।
मोदी ने संपूर्ण राजनीति विज्ञान की डिग्री में परास्नातक में प्रवेश लिया, अकेले परीक्षा दी, और अकेले डिग्री ली। अब तक, किसी भी छात्र या प्रोफेसर ने मोदी के साथ अध्ययन करने का दावा नहीं किया है।
भारत में कंप्यूटर की शुरुआत से पहले ही, मोदी की डिग्री एक कंप्यूटर द्वारा मुद्रित की गई थी।
1978 में मोदी की डिग्री से पहले और 10 साल बाद भी, डिग्री विश्वविद्यालय के कर्मचारियों द्वारा लिखी गई थी।
Microsoft द्वारा 1992 में पेटेंट किए गए फ़ॉन्ट का उपयोग 1978 में मोदी की डिग्री को प्रिंट करने के लिए किया गया था।
मोदी की डिग्री रविवार को छपी थी, जब कार्यालय बंद थे।
यदि आप लोग अभी भी विश्वास नहीं करते हैं कि मोदी जी अलौकिक हैं, तो आप राष्ट्र-विरोधी हैं!

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि


मुझे हर उस बात पर प्रतिक्रिया नहीं देना चाहिए जो मुझे चिंतित करती है।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
जिन्होंने मुझे चोट दी है मुझे उन्हें चोट नहीं देना है।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
शायद सबसे बड़ी समझदारी का लक्षण भिड़ जाने के बजाय अलग हट जाने में है।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
अपने साथ हुए प्रत्येक बुरे बर्ताव पर प्रतिक्रिया करने में आपकी जो ऊर्जा खर्च होती है वह आपको खाली कर देता है और आपको दूसरी अच्छी चीजों को देखने से रोक देता है।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
मैं हर आदमी से वैसा व्यवहार नहीं पा सकूंगा जिसकी मैं अपेक्षा करता हूँ।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
किसी का दिल जीतने के लिए बहुत कठोर प्रयास करना समय और ऊर्जा की बर्बादी है और यह आपको कुछ नहीं देता, केवल खालीपन से भर देता है।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
जवाब नहीं देने का अर्थ यह कदापि नहीं कि यह सब मुझे स्वीकार्य है, बल्कि यह कि मैं इससे ऊपर उठ जाना बेहतर समझता हूँ।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
कभी-कभी कुछ नहीं कहना सब कुछ बोल देता है।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
किसी परेशान करने वाली बात पर प्रतिक्रिया देकर आप अपनी भावनाओं पर नियंत्रण की शक्ति किसी दूसरे को दे बैठते हैं।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
मैं कोई प्रतिक्रिया दे दूँ तो भी कुछ बदलने वाला नहीं है। इससे लोग अचानक मुझे प्यार और सम्मान नहीं देने लगेंगे। यह उनकी सोच में कोई जादुई बदलाव नहीं ला पायेगा।
*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...*
जिंदगी तब बेहतर हो जाती है जब आप इसे अपने आसपास की घटनाओं पर केंद्रित करने के बजाय उसपर केंद्रित कर देते हैं जो आपके अंतर्मन में घटित हो रहा है।
आप स्वयं के लिए और अपनी आंतरिक शांति के लिए कार्य करिए और आपको बोध होगा कि चिंतित करने वाली हर छोटी-छोटी बात पर प्रतिक्रिया 'नहीं' देना एक स्वस्थ और प्रसन्न जीवन का 'प्रथम अवयव' है।।
जीवन मूल्यवान है ,अवांछित घटनाओं को नज़रअंदाज करना भी एक खूबी है!

सोमवार, 26 अगस्त 2019

अभी है दूर सहर थोड़ी दूर साथ चलो।

कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो,
बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चलो।
⚘
तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है,
यह जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो।
⚘
यह एक शब की मुलाक़ात भी ग़नीमत है,
किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो।
⚘
नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं,
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो।
⚘
अभी तो जाग रहे हैं चिराग़ राहों के,
अभी है दूर सहर थोड़ी दूर साथ चलो।
⚘
तवाफ़-ए-मन्ज़िल-ए-जानाँ हमें भी करना है,
'फ़राज़' तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो।
(तवाफ़-ए-मन्ज़िल-ए-जानाँ = महबूब के घर की परिक्रमा)
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-अहमद फ़राज़

गुल अपने ही खिलाये हुए हैं।

लंबी लंबी उड़ानों के हंस,
पथ क्रांति का सजा्ये हुए हैं।
छोड़ यादों का दूर कारवां,
बादलों में समाये हुए हैं ।।
साथी मिलते गये नए नए ,
कुछ अपने पराये हुए हैं ।
फलसफा पेश है पुर नज़र ,
लक्ष्य उसपै टिकाये हुए हैं ।।
उमंग के रंग हों जिस गगन में,
मेघ उसमें ही छाये हुए हैं।
युग युग से जो प्यासे रहे हैं,
क्षीरसिंधु में नहाये हुए हैं।।
अपनी चाहत के रंग -बदरंग,
खुद अपने ही सजाये हुए हैं।
औरों की खता कुछ नहीं है,
गुल अपने ही खिलाये हुए हैं।।
चंद दिन की है ये जिंदगानी,
मुखड़ा नाहक फुलाये हुए हैं।
जख्म जितने भी हैं जिंदगी के,
सब अपने ही कमाए हुए हैं।।
कबसे भूले हैं अपने ठिकाने,
आस फिर भी जगाये हुए हैं।
वक्त ने ही है सब को मिटाया,
वक्त के ही सब बनाये हुए हैं।।
श्रीराम तिवारी

शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

कुछखास कहना चाहताहूँ!

मेहनतकश सर्वहारा किसान मजदूर हूँ मैं,
हर खासोआम से कुछ कहना चाहता हूँ !
सदियों से सबकी सुन रहा हूँ खामोश मैं ,
अब शिद्द्त के साथ कुछ कहना चाहता हूँ!!
वेद पुराण बाइबिल कुरआन जेंदावेस्ता गीता,
बरक्स इन सबके कुछखास कहना चाहताहूँ!
इतिहास भूगोल राजनीती साइंस तकनीक ,
कम्प्यूटर,मोबाइलसे जुदा कहना चाहता हुँ !!
ईश्वर अवतारों पीरों पैगंबरों संतों महात्माओं,
इनके इतर कुछ अधुनातन कहना चाहताहूँ!!
समाज सुधारक नहीं हुँ क्रांतिवीर भी नहींहूँ,
एक आम इंसान हूँ,पूँछो कि क्या चाहता हूँ!
न तख्तो ताज चाहिए न जन्नत-स्वर्गके हसीं-
सब्ज बाग,फ़कत सम्मानसे जीना चाहता हूँ।
युगो-ंयुगों से जो बात बिसारते आये हैं,पूर्वज,
वो बात मैं सर्मायेदारों से कहना चाहता हूँ।।
धरती,हवा,पानी,गगन,सूरज चाँद,तारों में,
सबका बराबर बाजिब हक देखना चाहता हूँ।
जो सम्पदा समष्टि चैतन्य ने रची सबके लिए,
उसे प्राणीमात्र में बराबर देखना चाहता हूँ।।
- श्रीराम तिवारी

विपरीत विचारधारा के लोगों को स्थान दिया जाए!

पूरा का पूरा सोशल मीडिया छोटे-छोटे गुटों में विचारधारा के आधार पर तब्दील हो गया है!
हर एक्टिविस्ट अपने मित्र सूची में सिर्फ उसी को जगह देता है जो उसकी विचारधारा का समर्थक है ! ऐसे मे एक दूसरे की तारीफ होती रहती है!
आलोचना या समालोचना की कोई गुंजाइश नहीं होती, इसलिए इस प्लेटफार्म के उपयोग के लिए जरूरी है कि अपने मित्रों की सूची में अपने विपरीत विचारधारा के लोगों को स्थान दिया जाए!
और उनके कमैंट्स के बाद उसको काउंटर करने के लिए तार्किक बहस की जाए!
तभी दिमाग में लगी जंग समाप्त होगी पर लोग अपने -अपने प्रशंसा में लगे हुए हैं !
जिससे सोशल मीडिया के प्लेटफार्म का सही उपयोग नहीं हो पा रहा है!
लोकतंत्र की मजबूती वैचारिक विमर्श से ही सार्थक होती है

मंगलवार, 20 अगस्त 2019

इस दौर के सत्तापक्ष ने राजनीति को इस कदर पतनोन्मुखी बना दिया है !

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू का प्रयास रहता था कि उनके जमाने के कुछ दिग्गज विपक्षी नेता चुनाव जीतकर संसद में जरूर पहुंचें ! फिर चाहे वे ए .के गोपालन हों, राम मनोहर लोहिया हों,अटलबिहारी बाजपेयी हों,श्यामाप्रसाद मुखर्जी हों या बाबा साहिब भीमराव अंबेडकर हों! किंतु इस दौर के सत्तापक्ष ने राजनीति को इस कदर पतनोन्मुखी बना दिया है कि चाहे तालाबों में कमल खिले या न खिले किंतु भारतीय राजनीति में हर जगह केवल कमल ही खिलना चाहिए! 
अब जब कोई मतदाता बटन दबाये तो EVM ऐंसी सैट हो कि केवल कमल ही खिलना चाहिये ! यदि कोई नेता मरे तो उसकी मौत के मातम को इस कदर मनाओ कि वोटों का सैलाव आ जाये! यदि कोई आतंकी हमला हो और फौज उसका जबाब दे, तब भी भाजपा उसे भुनाने में अव्वल रही है! यदि विपक्ष या कोई व्यक्ति नीति गत विरोध करे तो उसे देशद्रोही घोषित कर दो! और यदि फिर भी कोई विरोधी चुनाव जीत जाए, तो गोवा,कर्नाटक शैली में उसे खरीद लो! 2014 के बाद भारत में लोकतंत्र का मतलब है 'एकचालुकानुवर्तित्व' याने एकमेवोद्वतीय नास्ति! विपक्ष भी दिग्भ्रमित है वह सिर्फ उन मुद्दों पर सत्तापक्ष का विरोध कर रहा है,जो राष्ट्रीय सुरक्षा और अस्मिता से जुड़े संवेदनशील विषय हैं! जबकि देश के बहुसंख्यक समाज को विपक्ष का यह रवैया बिल्कुल पसंद नही!

बालाकोट में सर्जिकल स्ट्राइक हुई थी!

पाकिस्तानी बजीरे आजम जनाब इमरान खान अपनी खिसियाहट में बार बार दुहरा रहे हैं कि"भारतीय फौज ने पहले बालाकोट में सर्जिकल स्ट्राइक की है यदि वह POK में भी वैसा ही कुछ करेंगे तो हम ईंट का जबाब पत्थर से दैंगे!"उनके इस वक्तव्य की मैं निंदा करता हूँ! किंतु एक बात की शर्म भी महसूस कर रहा हूँ कि मैंने उन मूर्खों पर यकीन कैसे कर लिया,जो लगातार कहते रहे कि कोई 'सर्जिकल स्ट्राइक नही हुई या स्ट्राइक हुई है तो सबूत दो! जो लोग कहते रहेे कि यह सब झूंठ है,कहते रहे कि चुनावी हथकंडा है!उन पर यकीन करना बेहद शर्मनाक है!चूँकि अब पाकिस्तान के बजीरे आजम खुद कह रहे हैं कि बालाकोट में सर्जिकल स्ट्राइक हुई थी, अत: इसका पूरा श्रेय भारतीय फौजियों को जाता है और अपनी फौज से और संपूर्ण राष्ट्र से उस ध्रष्टता के लिये हम क्षमा प्रार्थी हैं! इमरान खान की गलती है कि सचाई देर से कबूली ! विचित्र बिडम्बना है कि विदेशी मीडिया भी सचाई जानने में असफल रहा!

जिंदगी खुद मुस्कराएगी!

हरएक स्याह रात के बाद ,नई सुबह जरूर आयेगी!
तलाश है ज़िसकी तुुझे वो-मौसमे बहार फिर आएगी।।
निहित स्वार्थ से ऊपर उठकर थोड़ा सा व्यापक सोच,
ख्वाहिसों के पार छितिज में जिंदगी खुद मुस्कराएगी।
समष्टि चेतना को देगा नाम,जब तूं रूहानी इबादत का ,
संवेदनाओं की बगिया,खुद ब खुद खिल खिलाएगी।
जिंदगी की तान सुरीली हो,कदम ताल सधे हों तेरे,
जीवन व्योममें बजउठेंगे वाद्यवृन्द नईभोर गुन गनायेगी!
-श्रीराम तिवारी