शुक्रवार, 9 मार्च 2012

SMS recived on holi.

    अबीर हो,गुलाब हो,आसमान लाल हो,
   इस रंगीन मौसम में रंगीन गाल हो 11
   भंग की गोली हो मस्ती की टोली हो,
     आपके जीवन [मेरे] में हर इक दिन होली हो 11
                         -  दिलीप मीणा लेखाधिकारी 

रविवार, 4 मार्च 2012

भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्टून्स- India for Sale....


करप्शन के खिलाफ आंदोलनों और उस पर सरकार के बचाव के तरीकों के बीच, देश के जाने माने कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग के भ्रष्टाचार पर बनाए गए कार्टून्स पर उनकी किताब India for Sale का विमोचन किया गया। इस कार्यक्रम का दिलचस्प पहलू ये रहा कि जिस सरकार पर और खास तौर पर सरकार के जिस मंत्री पर इस किताब में बहुत तीखे प्रहार किए गए उन्हीं मंत्री जी ने किताब का विमोचन किया।


India for sale, किसी भी किताब का ये टाइटल चौंकाने वाला हो सकता है। खासकर तब जब इसका विमोचन करने के लिए खुद एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री आए हो। खुद मंत्री जी के खिलाफ इस किताब में बहुत कुछ है लेकिन हंसते मुस्कुराते हुए उन्होने किताब का विमोचन किया। ये भी एक विरला ही मौका होता है जब तीन धुर विरोधी पार्टी के दिग्गज नेता एक साथ एक मंच पर बिना किसी के खिलाफ कुछ बोले हंसते मुस्कुराते दिखे। इन सबको एक मंच पर लाने का श्रेय जाता है देश के जाने माने कार्टूनिस्ट पद्मश्री सुधीर तैलंग को। India for sale तैलंग के corruption पर बनाए गए कार्टून्स की किताब है। तैलंग ने इस किताब के कवर पेज पर अन्ना और बाबा रामदेव को छापने का कारण 62 सालों की छटपटाहट के बाद एक उम्मीद की किरण दिखना बताया।

केंन्द्रीय दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल, बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव रविशंकर प्रसाद और सीपीएम पोलिट ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी एक मंच पर दिखाइ दिए और वो भी बेहद दोस्ताना अंदाज में। संसद में और संसद के बाहर सरकार पर जमकर प्रहार करने वाले रविशंकर प्रसाद ने भी यहां सरकार पर कोई टिप्पणी करने के बजाय कपिल सिब्बल की eye brows को निशाना बनाया। उन्होंने कहा की कार्टूनिस्टों को सिबल साहब की भौंहे बहुत पसंद हैं। इस किताब में सिबल साहब और उनकी सरकार पर भी कई बेहतरीन कार्टून्स बनाए गए हैं, यहां पहुंचते हैं रविशंकर प्रसाद ने फटाफट किताब के पन्नों को पलटा और सिबल और उनकी सरकार पर कुछ कार्टून्स को नोट कर अपने भाषण में सबके सामने भी रखा।

अमूमन विपक्ष के किसी भी हमले पर तुरंत reaction देने वाले कपिल सिब्बल इस मंच पर रविशंकर प्रसाद की इस टिप्पणी पर मुस्कुराते रहे। हालांकि सिब्बल की इस मुस्कुराहट के पीछे का दर्द समझा जा सकता है क्योंकि वो सरकार में हैं और जो भी सरकार में होता है वो कार्टूनिस्टों के ज्यादा निशाने पर होता हैं। इस हंसी के माहौल में गंभीर लहजे में सिब्बल ने इसे लोकतंत्र की खूबसूरती बताया और कहा की यही तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सही मायने हैं। उन्होने ये भी साफ कहा की ये कार्टूनिस्ट के अपने विचार हैं और वो इस किताब के टाइटल से इत्तेफाक नहीं रखते। उन्होंने कड़े लहजे में कहा कि न तो भारत बिकाऊ है और न बिकाऊ होगा।

कार्टून्स के बारे में ये भी कहा जाता है की ये politicians के लिए एक certificate की तरह होते हैं। जिसके जितने ज्यादा कार्टून्स बनते हैं समझिए वो उतना ही बड़ा politician होता है। इस बात को मज़ाकिया अंदाज़ में रखते हुए सीताराम येचूरी ने उन पर बहुत ज्यादा कार्टून्स नहीं छपने पर दुख जताया।  दरअसल इस किताब में 150 कार्टून्स हैं और इनमें कहीं भी सीताराम येचुरी नहीं दिखाई देते हैं। लेकिन ये भी सही है की जो सत्ता में होते हैं या जिनके पास अधिकार होते हैं उन पर कार्टून ज्यादा बनते हैं।

पुरानी कहावत है एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होती है और नई कहावत ये है कि अगर वो तस्वीर कार्टून हो तो उसकी कीमत लाख शब्दों के बराबर हो जाती है। क्योंकि हंसी हंसी में कार्टून सत्ता और सत्तधारियों पर तीखे प्रहार करता है और कोई उसका बुरा भी नहीं मानता। कार्टून की यही ताकत है जो कार्टूनिस्ट को और पत्रकारों के मुकाबले और कड़े तरीके से अपनी बात कहने का मौका देती है। मूर्तियों से लेकर नेताओं के एक एक बयान को बारीकी से सुनने वाले चुनाव आयोग के लिए ये कार्टून क्या मायने रखते हैं और क्या कार्टून के जरिए कही जा रही बात पर भी उनकी नजर रहती है जैसे मसलों पर मुख्य चुनाव आयुक्त का कहना था कि एस. वाय कुरैशी साहब का कहना था कि कई बार उन पर भी कार्टून बनते हैं और वो इन्हें बहुत पंसद भी करते हैं। जहां तक नजर रखने की बात है तो कार्टून्स इस दायरे में नहीं आते। अलबत्ता तैलंग कभी चुनाव लड़ेंगे तो उन पर नजर रखी जाएगी। चुनाव में गंभीर दिखने वाले मुख्य चुनाव आयुक्त भी हंसी मजाक के इस माहौल में अलग अंदाज में ही दिखे।



सुधीर तैलंग की लिए तीन politician किसी वरदान से कम नहीं रहे जिन पर उन्होंने सबसे ज्यादा कार्टून्स बनाए। पहले पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहराव दूसरे लालू प्रसाद यादव और तीसरे लालकृष्ण आडवाणी। तैलंग ने अपनी किताब India for Sale के लांच पर ये बात में यहां मौजूद लोगों से साझा की कि इन सभीको उनके कार्टून्स बहुत पसंद आते हैं और आडवाणी ये तो अपने published कार्टून्स की original copy भी उनसे मांगते हैं। इस कार्यक्रम में उनकी बेटी प्रतिभा आडवाणी भी मौजूद थी वो इन कार्टून्स के बारे में क्या सोचती है और क्या कभी कोई कार्टून उन्हे ठेस भी पहुंचाता है जैसे मसलों पर उनसे बात हुई। प्रतिभा का कहना है की उनके पिता इन कार्टून्स को बहुत पसंद करते हैं और कार्टून्स बेहद असरदार भी होते है लेकिन कभी इनका बुरा नहीं लगता। अगर कार्टूनिस्ट करारा कार्टून नहीं बनाएगा तो फिर मजा कैसे आएगा।

बेशक कुछेक ही कार्टूनिस्ट लोगों के जेहन में अपनी छाप छोड़ पाते हैं लेकिन कार्टून्स के जबरदस्त असर को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। आर के लक्ष्मण बिना किसी पर सीधी टिप्पणी किए भी अपनी बात को बहुत असरदार तरीके से कह जाते थे। सुधीर तैलंग का अपना अंदाज है और वो तीखे प्रहार भी इस तरीके से करते हैं कि उनके शिकार politicians भी हंस कर अपने दर्द को छिपाते हैं। फिर भी पत्रकारिता का ये बेहतरीन औजार धीरे धीरे अपनी धार खो रहा है क्योंकि न तो अब वो कार्टूनिस्ट हैं जो इस कला का सही इस्तेमाल कर पाए और न ही उनकी कदर करने वाले अखबार ही बचे हैं। अपने इस दर्द को भी सुधीर तैलंग ने यहां मौजूद लोगों के साथ बांटा।

उम्मीद अभी जिंदा है की -नया जमाना आएगा.....

   अपने  जीवन को संवारने और निखारने में कुछ शख्स पूरा जीवन   गुजार देते हैं ,वक्त आने पर ये अभागे  अपने पूर्ववर्ती आजमाए हुए नुख्से या तो विस्मृति के गर्त में खो दिया  करते हैं या उन मूल्यों और सिद्धांतों को वक्त आने पर  इस्तेमाल करने पर  अप्रसांगिक   पाते हैं.  कुछ लोग इतने खुशनसीब होते हैं की उन्हें बिना मरे स्वर्ग और बिना एडियाँ रगड़े जीवन संग्राम में सब कुछ सहज ही   प्राप्त  हो जाया करता है. अनुभवजन्य अन्वेषणों का  समाजीकरण   होना मानवीय समग्र चेतना का विशिष्ठ चरित्र और स्वभाव हुआ करता है किन्तु  मार्क्सवादी  दर्शन परम्परा की अनेक सकारात्मक और कल्याणकारी स्थापनाओं के बरक्स 'ज्ञान'का अधिनायकीकरण  एक बड़ा गति-अवरोधक  सावित हुआ है.आम जनता के सहज बोधगम्य संदेशों का बौद्धिक ज़टलीकरन होते जाना भी प्रतिक्रांतियों का उत्प्रेरक रहा है.आशा है की इस दौर में चल रहे विमर्शों में इस मुद्द्ये पर गौर फ़रमाया जाएगा.खास तौर से सी पी आई एम् की २० वीं कांग्रेस जो की ४-९ अप्रैल -२०१२ में सम्पन्न होने जा रहीहै  उससे अपेक्षा है कि.इन जमीनी सच्चाइयों पर विज्ञान और दूरसंचार क्रांति के बरक्स गौर फरमाया जाये.
                                                आज के नव्य-उदारवादी बाजारीकरण के दौर में भी भारतीय या विश्व के  विखंडित समाज   की परम्परागत सामंतीय नकारात्मकता  सर चढ़कर बोल रही है.सामंत युग में जमींदार,रजवाड़े,अमीर-उमराव और राजा- महाराजा  जिस अमानवीय और निरंकुश आचरण से तत्कालीन आम-जनता -मेहनतकशों-मजदूरों ,किसानो और व्यापारियों का शोषण किया करते थे ;वो  हत्या,बलात्कार,लूट,रिश्वतखोरी,जमाखोरी शोषण और भयानक दरिंदगी का  सिलसिला इस दौर में भी वद्स्तूर जारी है. इस अमानवीय शोषण -उत्पीडन का कारण इंसानी फितरत है इस सोच के मद्देनज़र  छुटकारा पाने  के अतीत में जो प्रयास किये गए उन्हें भले ही  'क्रांति'जन-क्रांति या 'महान क्रांति ' कहा गया है.किन्तु क्या वे वास्तविक क्रांतियाँ कहीं जा सकती हैं?
        इतिहास गवाह है कि प्रत्येक दौर  के निरंकुश शाशकों को मेहनतकश आवाम के क्रांतिकारी संघर्षों ने
" मानवता,स्वतंत्रता,बंधुता और समानता "के सबक सिखाये हैंकिन्तु वोअन्याय और शोषण का  सिलसिला तो आज भी निरंतर जारी है. ,वर्तमान नव्य-उदारवादी- पूंजीवादी -वैश्विक बाजारीकरण की आर्थिक-राजनैतिक व्यवस्था के परिणाम न केवल वर्तमान मनुष्य के लिए अपितु भावी पीढ़ियों के लिए भी घातक होंगे इस सम्भावना के बरक्स इस निजाम को बदलने की कार्यवाहियां कामोवेश हर मुल्क में,हर समाज में ,हर महाद्वीप में और हर उद्योग में सतत जारी हैं.भारत में वाम पंथ[खास तौर से सी पी आई एम्] के नेत्रत्व में मेहनतकश  मजदूर,किसान,ठेका मजदूर,सरकारी-गैरसरकारी कर्मचारी/अधिकारी  धीरे -धीरे संगठित हो रहे हैं .  बढ़ती हुई महंगाई,श्रम कानूनों को उद्द्योगपतियों  के पक्ष में पलटना,आर्थिक संकट या आर्थिक मंदी का भार मेहनतकश आम जनता पर धकेलना,गरीबों का और ज्यादा gareeb  होना और अमीरों की ameeri में गुणात्मक बृद्धि ने संयुक्त संघर्ष के साथ-साथ देश और  ,समाज के भीतर वर्गों के आपसी द्वन्द की परिणिति को शाशक वर्गों के पक्ष में  ले जाने वाले दक्षिणपंथी अवयवों के सामाजिक -सांस्कृतिक आतंक  की मार झेलने  से इनकार करना शुरू कर दिया है.सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्रों में भले ही कोई बहुत बड़ा उलटफेर नजर नहीं आता हो किन्तु विगत २८ फरवरी-२०१२ की शानदार 'अखिल भारतीय ओउद्योगिक हड़ताल 'में देश के १० करोड़ मेहनतकशों की शिरकत ने शाशक वर्ग को चेतावनी दे दी है की .....केन्द्रीय श्रम संगठनों की व्यापक एकता से इस देश की आम जनता में संघर्षों के लिए साह्स का संचार हुआ है और उम्मीद है की यह संघर्षों के इतिहास में चमकदार मील का पत्थर सावित होगा. और एक दिन वो सुबह होगी जब श्रम के सम्मान में आकाशवाणी का उद्घोष होगा .....हम मेहनतकश जग बालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे .....इक खेत नहीं ...इक देश नहीं ...हम सारी दुनिया मांगेंगे.....
       कमाने वाला खायेगा....लूटने वाला जाएगा....
        नया जमाना आयेगा....आयेगा भई आयेगा....
         लाल लाल लहराएगा...इन्कलाब आएगा.....

                  श्रीराम तिवारी

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

२८ फ़रवरी २०१२ को राष्ट्रीय श्रम शक्ति का प्रदर्शन.

               हमारे देश के  ११    केन्द्रीय श्रमिक संगठनों एवं स्वतंत्र फेडरेशनों के संयुक आह्वान पर दिनांक २८ फरवरी-२०१२ को राष्ट्र्वापी जंगी औद्दोय्गिक हड़ताल होने जा रही है.अखिल भारतीय संयुक अभियान समिति  का ऐलान -ऐ-जुंग होगा:-
  'जब दरिया झूम के उठ्ठेंगे ....तिनकों से न टेल जायेंगे.....
२८ फरवरी को विश्व व्यापी कार्पोरेट पूँजी की अमानवीय विभीषिका के खिलाफ भारत के १०  करोड़ मेहनतकशों का मोर्चा खुल चूका होगा.सर्व विदित है कि यु पी ऐ द्वतीय सरकार न केवल राष्ट्र की सुरक्षा करनेमें विफल रही , बल्कि देश कि ४६ करोड़  मेहनतकश  जनता के हितों की रक्षा करने में असफल रही है. निम्नांकित मुद्दों पर देश की सत्तासीन सभी राजनैतिक पार्टियों और केंद्र तथा राज्य सरकारों का रुख पूंजीपतियों के पक्ष में तथा आम जनता के खिलाफ रहा है.
१-भविष्य निधि पेंशन की न्यूनतम राशि गुजारे लायक[कम से कम-३००० रूपये] हो तथा भुगतान  की गारंटी हो.
२-ठेका मजदूरी प्रथा समाप्त हो ,सभी अस्थायी मजदूरों को स्थाई किया जावे.
३-बढ़ती हुई महंगाई पर रोक लगाओ,सार्वजनिक वितरण व्यवस्था विश्वसनीय और सुध्रुण करो.
४-न्यूनतम मजदूरी कानून में संशोधन  करो,न्यूनतम मजदूरी कम से कम १००००/ रुपया महिना  हो.
५-बोनस,प्रोवीडेंट फंडतथा ग्रेचुटी की न्यूनतम पावंदी हटाई जाए,ग्रेचुटी बढाई जाए.
६-ट्रेड यूनियन अधिकारों पर मालिकों और सरकार के हमले  नहीं चलेंगे.
७-श्रम कानूनों का पालन कराया जाये,उद्द्योगपतियों और प्रशाशनिक मशीनरी के दोहरे शोषण   को समाप्त करो.
८-देश के सार्वजनिक उपक्रमों-बैंक,बीमा ,बी एस एन एल और लाभ के अन्य सरकारी उद्द्य्मों को देशी -विदेशी पूंजीपतियों के हाथों न बेचा जाये.
९-आउट सोर्सिंग बंद करो ,स्थायी प्रुव्र्त्ति के कार्यों को स्थायी श्रमिक से कराया जाए.
१०-पूंजीपतियों के दवाव में आमआदमी  -किसान ,मजदूर के खिलाफ बेजा क़ानून बनाने  का दुस्साहस मत करो.

   इस हड़ताल की घोषणा से पूर्व सभी प्रमुख श्रम संगठनों और स्वतंत्र फेडरेशनों ने देश की राजधानी दिल्ली में और उसके बाद सभी प्रादेशिक राजधानियों में संयुक कन्वेंशन आयोजित किये हैं.स्वतंत्र भारत के ६४ साल के इतिहास में पहली बार सभी केन्द्रीय श्रम संगठनों ने भारत सरकार और अन्य प्रादेशिक सरकारों की गलत आर्थिक एवं श्रमिक नीतियों के खिलाफ संघर्ष के लिए व्यापक एकता के लिए हाथ मिलाया है.जिन केन्द्रीय श्रम संगठनो ने २८ फरवरी २०१२ का आह्वान किया है उनमें -भारतीय मजदूर संघ,इन्टक,एटक,सीटू एवं एह एम् एस इत्यादी प्रमुख  हैं. माना जा रहा कि दुनिया के ट्रेड यूनियन आन्दोलन के इतिहास में यह सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन कार्यवाही होगी.
       हड़ताल का आह्वान करने वाले सभी प्रमुख संगठनों कि आम राय है कि वर्तमान आर्थिक नीतियाँ न तो देश के हित में हैं और न ही श्रमिक और किसानों कि हित-पोषक  हैं.सरकार के  नीति निर्धारकों को आये दिन न्यायलय  कि दुत्कार के वावजूद मेहनतकश जनता और समाज के कमजोर तबकों  कि कोई चिंता नहीं है.बेतहासा महंगाई  की वास्तविकता को नजर अंदाज कर थोक मूल्य सूचकांक  के आभाशी आंकड़ों में जनता को भरमाया जा रहा है.आर्थिक मंदी की आड़ में अय्याश  पूंजीपतियों को अरवों की मदद दी जा रही है.कार्पोरेट दिग्गजों को रियाय्य्तें दीं जा रहीं हैं. कामगार ,किसानों और श्रमिक सर्वहारा वर्ग पर संकट धकेला जा रहा है. देश की जनता की अमानत के जीवंत-प्रमाण केन्द्रीय सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में सौंप ने की भरसक  कोशिशें जारी हैं.देश की नई नौजवान पीढी का एक बहुत बड़ा और सुशिक्षित वर्ग, असंगठित  और अस्थायी किस्म  की जिन्दगी का हिस्सा बन चुका है.
                  प्रस्तुत हड़ताल केवल वेतन,भत्ते या पूँजी और श्रम के बीच की रस्साकसी मात्र नहीं है, बल्कि वित्तीय पूँजी को उसकी अमानवीयता के लिए कठघरे में खड़ा   करने का ऐलान करती  हुई मजदूर वर्ग के संघर्षों  में एक और  शानदार  मील  का पत्थर  तराशने में कामयाब होगी.
                           
         श्रीराम तिवारी   

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

वसंत; कल-आज-कल

किसी रीतिकालीन विरही कवि के सूफियाना अंदाज़ को स्मरण करते हुए            मैं अपने सभी प्रशंसकों,सुह्रुदयजनों,पाठकों,सपरिजनों एवं ब्लोगिंग की दुनिया के सहचरों को मोद्प्रिय,माधुर्य्मय
   ऋतुराज वसंत के  शुभागमन की शुभकामनायें निम्न चार पंक्तियों के माध्यम से  प्रेषित करता हूँ.
    नहीं पावस एहिं देसरा,ना हेमंत वसंत!
    ना कोयल ना पपीहरा ,जेहिं सुनी आवे कंत!!
          आज के भूमंडलीकरण के अति उन्नत सूचना प्रोद्दौगिकी  के दौर में  हमाराआधुनिकतम  मुक्तक पेश है;....
        याद करना और याद आने में बड़ा  फर्क होता है!
        याद हम  उसे  करते हैं जो हमारे मस्तिष्क में  होता है!!
       याद हम उन्हें आते हैं जो हमारे दिल में होते हैं!
        बड़ा खुशनसीब है वो जो किसी का कुछ तो होता है!
        आजकल एस एम् एस  ,फेस बुक के माध्यम से ,
       वे मोसम भी पावस-हेमंत और वसंत होता है!!
          जो    प्यार -प्रेम के बीज बो देता है!!!
              पद्माकर के शब्दों में ;-\

      कूलन में केलि में  कछारण में कुंजन में,
      क्यारण में कलित कलीन किल्कांत है!
     कहें पद्माकर, परागन में पौन में ,
    पाकन  में पिक में पलाशन  पगंत है!!
    द्वार में दिशान में दूनी देश -देशन में,
    देखों  दीप दीपन में दीपत दिगंत है!
      बेलि में बितान ब्रज  बेलन -नबेलन में ,
     बनन में बागन में बगरो वसंत है!!
       
                   मेरी सद्द स्वरचित पंक्तियाँ....
 
पुरवा  गाती रहे पछुआ गुन-गुन करे,
 बीती जाए शिशिर की जवानी हो!
   बीतें पतझड़ के दौर झूमें आमों में बौर,
   कूंके कुंजन में कोयलिया कारी हो!!
    यमुना कल-कल करे गंगा निर्मल बहे,
  कभी रीते न रेवा का पानी हो!
    फलें फूलें दिगंत गाता आये वसंत
  हर सवेरा नया और संध्या सुहानी हो!१



      श्रीराम तिवारी