सोमवार, 19 दिसंबर 2011

जनकवि रामनाथसिंग 'अदम गौँडवी' को क्रांतिकारी श्रद्धांजलि....

यह एक क्रमिक एवं स्वाभाविक युति है कि  जिन कवियों की मातृभाषा हिंदी या कोई अन्य आंचलिक भाषा होती है,और यदि वे जनवाद या क्रांति जैसे विचारों से प्रेरित है तो  वे प्रगतिशीलता के तत्वों को उर्दू शब्दों के सहारे ही थामने में सफल हुए हैं.इस विधा में गैर उर्दू भाषियों में जब भी कविता या शायरी की चर्चा होगी गजानन माधव मुक्तिबोध और दुष्यंत  के बाद 'अदम गौंडवी'उर्फ़ रामनाथसिंह सदैव याद किये जाते रहेंगे.
    राम नाथसिंह ने शायरी लिखने के शुरुआती दौर  में ही न केवल अपना नाम बदल डाला बल्कि परम्परागत उत्तर आधुनिक कविता को शायरी का नया लिबास भी पहनाया.दुष्यंत ने जिस हिन्दी शायरी में आम आदमी का दर्द उकेरा था ,अदम गौंडवी ने   जनता की आवाज बनाकर उसे  अमरत्व प्रदान किया है.उनकी कई गजलों में व्यवस्था कि लानत-मलानत की गई है. जन- गीतों के तो मानो वे सरताज थे.पूंजीवादी,साम्प्रदायिक और निहित स्वार्थियों की जकड़न में कसमसाती आवाम को 'अदम 'के शेर संबल प्रदान करते है-
                
         हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेडिये!
          अपनी कुर्सी के लिए ज़ज्वात को मत छेडिये!!
            हैं कहाँ  हिटलर हलाकू जार या चंगेज खाँ!
           मिट गए सब कौम की औकात को मत छेडिये!!
          छेडिये इक जंग मिल जुलकर गरीबी के खिलाफ!
          दोस्त !मेरे मजहबी नगमात को मत छेडिये!!
  एक और वानगी पेश है-
          काजू भुने प्लेट में,व्हस्की गिलास में,
          उतरा है रामराज ,विधायक  निवास में!
          पक्के समाजवादी है,तस्कर हों या डकैत,
          इतना असर है खादी के लिबास में!
           आजादी का जश्न वो मनाएं किस तरह,
            जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में!
......................................
    ........एक ही चारा है वगावत ....
         यह बात कह रहा हूँ में होशो-हवाश में!
  २२ अक्तूबर १९४७ को जन्में अदम गौंडवी के दुखद निधन से भारतीय उपमहादीप के प्रगतिशील साहित्य जगत में भले ही शोक का तमस छा गया हो किन्तु उनकी सृजनशीलता के धूमकेतु निरंतर उन सभी श्रेष्ठतम मानवों का पथ प्रशस्त करते रहेंगे ,जो मानवीय मूल्यों की हिफाज़त करते हुए  , शोषण के अन्धकार को समूल नष्ट करते हुए मानव मात्र को शान्ति-मैत्री-बंधुत्व और समता  से  परिपूर्ण  देखने की तमन्ना रखते हैं....
         जनकवि रामनाथसिंह अर्थात 'अदम गौंडवी'ने आजीवन दलित,शोषित,पिछड़ों और गरीबों के संघर्षों में न केवल परोक्ष सहयोग किया बल्कि अपनी सशक्त लेखनी से इन वंचित वर्गों को उपकृत भी किया है.वे दुष्यंत पुरस्कार से सम्मानित किये जा चुके थे.भले ही उन्होंने मात्र दो काव्य संग्रह 'धरती की सतह पर'और 'समय से मुठभेड़'सृजित किये हों किन्तु 'संछिप्त्ता सौन्दर्य की जननी है' अतः अदम गौंडवी का सृजन,उनका व्यक्तित्व और संघर्षों में अवदान अप्रतिम है,पर्याप्त है,जीवन है...
                            श्रीराम तिवारी
     

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

'द सीक्रेट'में भारतीयों के लिए कुछ भी 'रहस्य'नहीं.

    प्रख्यात लेखिका 'रोन्दा वार्न'ने अपनी पुस्तक ' द सीक्रेट' में  बहुत उपयोगी और मानवोचित सिद्धांतों की नए सिरे से मीमांसा  की है.उच्च शक्ति की विचार तरंगों,उद्दाम आकांक्षाओं,पृकृति प्रदत्त अवदानों की सहज प्राप्ति इत्यादि विषयक वैज्ञानिक विश्लेषणों के साथ इस पुस्तक में वह सब कुछ है जो एक खुशहाल और जिंदादिल व्यक्ति,समाज और राष्ट्र के लिए अनुकरणीय है.'रोन्दा वार्न' ने इस पुस्तक के समानांतर  एक लघु फिल्म भी इसी विषय को लेकर बनाई है.डा जान ग्रे ,डा जान डेमार्तिनी ,डा जेम्स रे इत्यादी दर्जनों उद्भट विद्वान् दार्शनिकों ,मनोवैज्ञानिकों ,लेखकों और समाजशास्त्रियों को इस पुस्तक में उल्लेखित किया गया है.
      पुस्तक में लेखिका ने अप्राप्त की प्राप्ति,इच्छा  शक्ति की असीम प्रबलता,प्रकृति-पदार्थ और मनोभावों के आपस में अवगुंठित ताने -वाने को सप्रमाण और जीवंत रेखांकित किया है.चेतन-अचेतन,व्यक्ति-समूह,ब्रम्हांड-पिंड और उर्जा-पदार्थ के आपसी रिश्तों में मानवीय जीवन को आनंदमय ,निरापद और सफलतम बनाने के जो सूत्र इस पुस्तक में उपलब्ध हैं वे सभी कभी न कभी कहीं-न-कहीं यत्र-तत्र-सर्वत्र इस धरती पर या तो आजमाए जा चुके हैं या आजमाए जा रहे है.
       न केवल    इस पुस्तक की लेखिका अपितु इस पुस्तक में उल्लेखित  अन्यान्न विद्वत जनों में अधिकांश या तो बाइबिल प्रेरित है याआधुनिक पाश्चात्य दर्शन से प्रभावित है. भारतीय प्राच्य वांग्मय से वे नितांत  अनभिग्य से लगते है.
 .मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं की इस पुस्तक का सार  गीता के किसी एक श्लोक के चतुर्थांश के बराबर भी नहीं है.यह पुस्तक निसंदेह किसी निराश इंसान को "सकल पदार्थ हैं जग माहीं!कर्महीन नर पावत नाहीं!!से आगे नहीं ले जा सकती ;किन्तु गीता तो व्यक्तिगत  लौकिक या  पारलौकिक उपलब्धियों  से भी आगे न केवल जीवन संग्राम में अपितु मानसिक संवेदनाओं के हाहाकार में भी जीवन को उजास प्रदान करने में समर्थ है.,
   प्रस्तुत पुस्तक में 'कृतज्ञता'का महत्व  कुछ इस तरह प्रतिपादित किया गया है कि भारतीय परम्पराओं और लोकाचार को यदि लिपिबद्ध कर उसे किसी खास  पुस्तक की शक्ल में प्रकाशित किया जाए तो अमेरिकी बौद्धिक संपदा के रहनुमा उसे रातों रात अपने नाम से पेटेंट कराने से नहीं चूकेंगे!

    "कृतज्ञता का अभ्यास मेरे  लिए  बहुत ज़बरदस्त सावित हुआ है.हर सुबह में जल्दी उठकर सबसे पहले जब फर्श पर पैर रखता हूँ तो 'धन्यवाद'[धरती को ]कहता हूँ/................................उन चीजों को याद करता हूँ ,जिनके लिए में कृतज्ञ हूँ......................में इसे ब्रह्मांड की ओर भेज रहा हूँ.........कृतज्ञता की भावनाएं महसूस कर रहा हूँ....."
               डा जेम्स रे ' को इसी पुस्तक के पृष्ठ ७५ [हिंदी अनुवाद] पर उक्त कोटेशन के साथ उद्धृत किया गया है.
    भारत में ५ हज़ार वर्ष पूर्व रचित आर्ष ग्रुन्थों और गुरुकुल परम्पराओं में सहस्रों उदहारण मौजूद हैं.जहां गुरु शिष्य ,के उदाहरण में आरुणि-विरोचन,रघु-वशिष्ठ,चन्द्रगुप्त-चाणक्य,शिवाजी-समर्थ रामदास और गाँधी-गोखले के उदाहरन मौजूद हैं. माता-पिता के प्रति राम और श्रवणकुमार के  बलिदान जग जाहिर हैं.
  सुन जननी सोई सूत बडभागी !जो पितु -मात चरण अनुरागी!!
  तनय मातु-पितु तोषनिहारा! दुर्लभ जननिं सकल संसार!!
         इस तरह के असंख्य उदहारण भारतीय वांग्मय में उपलब्ध हैं,किन्तु बिडम्बना यह है कि जहां प्रस्तुत पुस्तक द सीक्रेट'सीधे -सीधे सरल लफ्जों में बिना किसी विराट महाकाव्यात्मक आख्यान के ही मानवीय ज्ञानामृत का रसास्वादन करती है ;वहीं भारतीय और प्राच्य ज्ञान रूपी मणि-माणिक्यों को कुछ इस तरह पेश करने की परम्परा सी रही है कि जब तक एक ट्रक भूसा नहीं छानोगे तब तक सुई नहीं मिलेगी. इतना ही नहीं आगम -निगम ,पुराणों में तो जिस तरह की अलिफ़ लेलाई किस्म की कथात्मकता में ज्ञानामृत छिपाया गया हैउसके नकारात्मक पहलु न केवल दीर्घसूत्रता में आये हैं अपितु समाज के श्रमिक,सर्वहारा और कामगार  नर-नारियों को उससे महरूम रखने के क्षेपक  भी घुसेड़े गए हैं.भाषाई जटिलता और आम जनता की निरक्षरता से न केवल भारतीय उप्म्हद्वीप अपितु दुनिया के तथकथित सभ्य और शुशिक्षित समाजों तक वो ज्ञान नहीं पहुँच पाया जो 'रोन्दा वार्न 'के लिए रहस्य है और जिसको उन्होंने कुछ इस अंदाज़ में पेश किया है कि उन्हें दुनिया में किसी खास नए रहस्य का पता चला है सो उन्होंने 'द सीक्रेट ' में दुनिया के सामने ओपन किया है?
        श्रीराम तिवारी

रविवार, 4 दिसंबर 2011

जनसंख्या नियंत्रण के बिना भारत ओर चीन का उद्धार नहीं....

   अपने दुसरे कार्यकाल के अंतिम दिनों में तत्कालीन अमेरिकन  प्रेसिडेंट मिस्टर जार्ज बुश [जूनियर]ने फ़रमाया था"भारत और चीन के लोग चूँकि अब ज्यादा खाने लगे हैं [अर्थात पहले तो भुखमरे ही थे?]इसलिए अमेरिका और शेष विकसित देशों पर आर्थिक मंदी की मार पडी है"अभी कुछ दिनों पहले वर्तमान प्रेसिडेंट ओबामा ने फ़रमाया "अमेरिकी युवाओं को शंघाई और बंगलुरु से टक्कर लेने का माद्दा रखना होगा"वास्तव में इन वक्तव्यों के पीछे की मंसा भले ही कुंठित हो किन्तु सचाई यही है किभारत और चीन में एक नव -धनाड्य वर्ग  तो जरुर समृद्ध हुआ है ,भले ही गरीव और अमीर के बीच की खाई बेतहासा बड़ी हो.चूँकि भारत और चीन की जनसंख्या वाकई दुनिया की एक तिहाई के करीब पहुँचने वाली है जबकि जमीनी हिस्सा १/२० भी नहीं है.इस सूरते हाल में विराट श्रम शक्ति के काल्पनिक आधार और गैर जिम्मेदार वित्त नियोजन  को अर्थ व्यवस्था का उन्नायक कैसे कहा जा सकता है ?
   नव उदारवाद के रास्ते पर कुलांचे भरते हुए भारतीय अर्थ-व्यवस्था ने आर्थिक वृद्धि दर की जो कल्पना की थी
   वह आज अपने अंतिम अंजाम से मीलों दूर पहले भारतीय पूंजीवादी राजनीतिज्ञों को आगाह कर रही है कि  मात्र व्याज दरों में कमी वेशी करने ,विदेशी निवेश बढाने,जन-कल्याणकारी मदों से सरकारी इमदाद में कमी करने और वित्तीय पूंजीगत लाभों को राष्ट्र विकाश का माडल भर मान लेने से  अर्थ व्यवस्था को सुरखाव के पंख  नहीं लगने वाले हैं.जनसँख्या को नियंत्रित किये बिना क्या होगा? खेती के लिए और उद्द्योगों के लिए जमीने क्या आसमान से आयेंगीं?पीने का पानी और उसी अनुपात में शुद्ध आक्सीजन के लिए शुद्ध वायुमंडल भी होना चाहिए कि नहीं?केवल व्यापारिक ताने-बाने से ये सब हासिल नहीं होगा.
             खुदरा व्यापार के मल्टी ब्रांड में १००%और एकल जिंसों में ५१%ऍफ़  डी  आई को आर्थिक सुधारों की संजीविनी निरुपित करते हुए ,एम् एन सी और उनके वैश्विक  नियामक नियंताओं ने  वर्तमान नव उदारवादी भारतीय  देशी शासक वर्ग को भीवेहद उहापोह की स्थिति में ला खड़ा कर दिया है.ऊपर से भले ही यह दिखाने की कोशिश की जाती रही है  कि  भारतीय और चीनी अर्थ व्यवस्थाएंवैश्विक आर्थिक संकट की  काली डरावनी -विनाशकारी घटाओं से   कमोवेश  सुरक्षित हैं ;किन्तु जानकारों की आशंकाओं को यत्र-तत्र-सर्वत्र साकार देखा जाने लगा है.यदि चीन और भारत को एक बाज़ार समझकर विकसित देश, अपने आर्थिक संकट से निजात पाने के लिए, अपने अति शेष उत्पादों को इन विकाशशील राष्ट्रों में खपा कर ;अपना उद्धार करना चाहते हैं तो इसमें किसी को तब तक कोई आपत्ति नहीं जब तक उसके हितों पर आंच नहीं आती.अब यदि भारत और चीन की जनता को लगता है कि उनके हितों को खतरा है तो वे ऍफ़ डी आई समेत उन तमाम पश्चिमी पूंजीवादी हथकंडों का विरोध क्यों नहीं करेंगे?विकीलीक्स के ताजे खुलासों में भारत और चीन पर अमेरिकी नीति निर्माताओं के तत विषयक उद्देश्य स्पष्ट होने लगे हैं.
                चीन की अर्थव्यवस्था  विशुद्ध साम्यवादी व्यवस्था के दौर में नितांत सफल,निरापद और निष्कंटक हुआ करती थी;किन्तु सोवियत पराभव से आक्रांत होकर देंग शियाओ पिंगके अनुयाइयों  ने जिस तरह से अर्ध पूंजीवादी अर्ध साम्यवादी खिचडी  पकाई उससे  निसंदेह चीन को आधारभूत संरचनाओंमें आशातीत  सफलता  और तीव्र औद्यौगीकरन  की मृग मरीचिका का दिग्दर्शन भले ही हुआ हो किन्तु अब उसके लिए आगे कुआँ और पीछे खाई है  चीन की अर्थव्यवस्था का संकट प्रारंभ हो चला है.विगत तीन सालों में लगातार आर्थिक रफ़्तार घटने और विनिर्माण क्षेत्र सिकुड़ने के संकेत मिलने लगे हैं.यही वजह है कि चीन को मजबूरन अपनी मौद्रिक नीति को नरम करने की आवश्यकता आन पडी है'.चाइना फेड्रेसन आफ लाजिस्टिक्स एंड perchesing के अनुसार नवम्बर में  पी एम् आई घटकर ४९ पर आ गिरा है  जबकि अक्तूबर में ५०.४ था.उसके निर्यात में अप्रत्याशित गिरावट और अन्दुरुनी प्राकृतिक झंझावातों ने राजकोषीय घाटे को वैश्विक देनदारियों के समकक्ष ला खड़ा कर दिया है.मजदूर,कर्मचारी ,किसान और वेरोजगार युवाओं में वर्तमान चीनी शासकों के प्रति अवज्ञा का भाव पैदा हो चला है .हड़ताल,प्रदर्शन और सत्ता प्रतिष्ठान विरोधी गतिविधियाँ अब चीन में आम हो चली है .चीन का मीडिया सिर्फ वही बतलाता है जो वर्तमान शासकों और पूंजीवादी संसार को लुभाता हो.चीन की कोम्मुनिस्ट पार्टी अब मार्क्स,लेनिन और माओ के जनवादी सिद्धांतों-वास्तविक साम्यवादी व्यवस्था  से पदच्युत होकर केवल पेंशन भोगियों और सत्ता के दलालों की एकांगी दिग्भ्रमित नाम मात्र की साम्यवादी होकर रह गई है.यही वजह है कि जनसंख्या नियंत्रण ,कृषि उत्पादन में आनुपातिक वृद्धि और समतामूलक समाज व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों से भटकती हुई चीन की वर्तमान हु जिन्ताओ सरकार वैश्विक बाजारीकरण की राह पर  चलते हुए हाराकिरी  की ओर अग्रसर है.जनसँख्या  नियंत्रण के कठोर और वैज्ञानिक उपायों के बिना  चीन का भविष्य तो खतरे में है ही किन्तु भारत को प्रकारांतर से इससे  बेजा खतरा हो सकता है.
          भारत में कृषि उत्पादन,जनसँख्या बृद्धि तथा  सार्वजनिक वितरण व्यवस्था इत्यादि महत्वपूर्ण विषयों को वर्तमान यु पी ऐ सरकार के अजेंडे में कोई खास महत्व नहीं है.उत्तम गुणवत्ता के बीज,उर्वरक,सिचाई,बिजली,की किल्लत का आलम यह है कि हजारों क़र्ज़ ग्रस्त  सीमान्त किसानों ने विगत ५-६ सालों में आत्म हत्या कर ली .महंगाई,भृष्टाचार और आधुनिकीकरण पर तो फिर भीजनता और मीडिया कि  निरंतर सक्रियिता बनी हुई है किन्तु जनसँख्या नियंत्रण,पर्यावरण,प्रदूषण,अनुत्पादक श्रम नियोजन तथा सार्वजनिक वितरण व्यवस्था पर न तो जन मानसगंभीर है  और न ही राज्यसत्ता के हितग्राहियों को उतनी उत्कंठा या व्यग्रता है जितनी की सांसदों के भत्ते बढवा लेने,विदेशी निवेशकों को लाल कालीन बिछाने या कारपोरट लाबी के सरोकारों को उनके हितों  के परिप्रेक्ष्य में परिपूर्ण करने की व्यग्रता रहती है.राजनीतिक भृष्टाचार और अफसरों की लूटखोरी ने देश को अन्दर ही अन्दर खोखला कर डाला है.  यही वजह है कि विगत जून २०११ में भारत का विदेशी ऋण  ३१६.९ अरब डालर तक जा पहुंचा जो मार्च २०११ में ३०६.५ डालर था.विदेशी वाण्जिक उधारियों  को विनियमित करने ,अनिवासी भारतीयों के द्वारा जमा राशियों पर इंटरेस्ट रेट  को युक्ति संगत बनाए जाने की चर्चा भी पक्ष -विपक्ष नहीं करता.इन सभी मशक्कतों का परिणाम यह कि' ऊँट के मुंह में जीरा'.वाली कहावत ही चरितार्थ हो सकती है.
     भारतीय मीडिया का एक खास हिस्सा हैजो बाबाओं,समाज सेवकों ,धर्म गुरुओं और गैर राजनैतिक आवरण में छिपकर विशुद्ध राजनीती करने में निरंतर जुटे निहित स्वोर्थियों को राजनीती का समस्थानिक सिद्ध करने में  व्यस्त है.  देशी-विदेशी इजारेदारों की गिरफ्त वाला मीडिया भी अपने नव उदारवादी अजेंडे पर काम करते हुए कभी १-२-३,एटमी करार,कभी रिटेल में ऍफ़ डी आई  और कभी राष्ट्र्रीय सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथो में सौंपने का वातावरण तैयार करता रहता है.यह पूंजीवादी दुमछल्ला  वैश्विक  नव  उदारवादीआर्थिक उद्घोष  इतने यकीन से करता है कि इसका असर न केवल भारत और चीन बल्कि तीसरी दुनिया के अन्य  देश भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहते.राष्ट्रीय मुख्य धारा के मीडिया को स्वनियंत्रण सीखना होगा और जन संख्या नियंत्रण,साम्प्रदायिक पाखंड और एन जी ओ रुपी परजीवी अमर्वेलों पर प्रतिघाती कदम उठाना चाहिए.
    विगत दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ ने च्र्तावनी दी है कि दुनिया एक और आर्थिक मंदी की चपेट में आ सकती है.वर्ष २०१२ में दुनिया की आर्थिक विकाश दर धीमी होती चली जायेगी और भारत तथा चीन जैसे तथाकथित उभरती अर्थव्यवस्था वाले देश भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे.चीन और भारत के बारे में मिस्टर ओबामा का काल्पनिक भयादोहन भी अब असरकारक नहीं होगा.संयुक राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार यूरोप ,अमेरिका और तथाकथित एशियन  चीतों की जान सांसत में होगी.नयी नौकरियों का आभाव ,बढ़ता क़र्ज़ संकट और वित्तीय क्षेत्रों में आ रही दुश्वारियों  के बरक्स नवउदारवादी   अर्थव्यवस्थाओं की नाकामी सारी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगी.भारत और चीन भी इस भयावह सुनामी  से  अछूते नहीं रह पायेंगे. जनसँख्या नियंत्रण के बिना 'किसी का गुजारा  नहीं.आवश्यकताओं की आपूर्ति ,जिंसों का उत्पादन और जनसँख्या में वैज्ञानिक आनुपातिक सामंजस्य होना चाहिए.केवल राजनीतिज्ञों या व्यवस्थाओं पर काबिज शक्तियों को कोसने से काम नहीं चलने वाला.भावी पीढीयाँ नारकीय यंत्रणा भोगने को अभिशप्त होंगी ;यदि वर्तमान पीढी ने अपने हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वहन ठीक से नहीं किया,अर्थात जनसंख्या नियंत्रण के ठोस और वैज्ञानिक उपायों का क्रियान्वन.
 अभी तक     आम धारणा रही है कि भारत और चीन में चूँकि श्रम सस्ता और कच्चा माल इफरात में मौजूद है  भारत और चीन दोनों हीपड़ोसी  देशों के विकसित देशों से व्यापार और वित्तीय रिश्ते गहरे हैं और विश्व अर्थ व्यवस्था को सहारा देने की क्षमता रखते हैं ,सहारा दिया भी है किन्तु वर्ष २०१२ में भारत की विकाश दर लुढ़कती हुई ७-७ से नीचे जाती दिख रही है .डालर के मुकाबले रुपया और युयान दोनों ही अब पस्त होते दिख रहे हैं ९% से ऊपर की आर्थिक विकाश दर और आशातीत आर्थिक अवलंबन में भारत और चीन अब विश्व के संकट ग्रस्त पूंजीवादी देशों को कुछ खास नहीं दे सकेंगे.भारत और चीन को अपने घरेलू रक्षात्मक संसाधनों में कटौती करते हुए दुनिया के अस्त्र उत्पादकों से पीछा छुड़ा लेना चाहिए.भारत चीन  को अपने यहाँ  ज्यादा नौकरियां पैदा करनी होंगी,सड़क-बिजली -बंदरगाह  जैसे अधोसंरचना क्षेत्र में निवेश बढ़ाना होगा.न केवल उर्जा खपत  नियंत्रण के उपाय करने होंगे बल्कि टिकाऊ उर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी.भारत के लिए स्थिति चीन से भी दुष्कर है .आंतरिक वाह्य  खतरों को केवल आतंकवादी या अलगाववादी ही नहीं बल्कि भारतीय अस्मिता को जमींदोज किये जाने के खतरे भी विद्यमान हैं . आर्थिक मंदी दुनिया को फिर से दस्तक देने लगी है ,भारत और चीन भी उससे से अछूते नहीं रह पायेंगे.दोनों सनातन पड़ोसियों को अपने सीमा विवादों को ठन्डे वसते में रख   देना चाहिए.खास तोर से चीन  के वुद्धिजीवियों,साहित्यकारों,छात्रों,युवाओं ,मजदूरों और किसानो की यह एतिहासिक जिम्मेदारी है की वे अपने शासक  वर्गों पर दवाव बनाएं ताकि वे     भारत के खिलाफ पाकिस्तान रुपी बिगडेल  निजाम का इस्तेमाल न करे.जहां तक भारतीय विदेश नीति का सवाल है ,वह पूरी तरह पारदर्शी ,विश्व बंधुत्व आधारित,अहिंसा,स्वतंत्रता और समानता के नीति निर्देशक सिद्धांतों पर अवलंबित है.आज़ाद भारत में विगत ६५ सालों में भारत की विदेश नीति को पूरे राष्ट्र ने उसे ही  तस्दीक किया जिसे  पंडित नेहरु के नेत्रत्व में उदीयमान भारत ने अपने शैशव काल में अनुप्रमाणित किया था. अब जो कुछ भी बदलना है या सकारात्मक कदम उठाना है वो चीन को  ही करना है.भारत तो अपने हिस्से के तमाम जिम्मेदारियां पहले ही पूर्ण कर चूका है.अब यदि पाकिस्तान के कंधे पर बन्दूक रखकर चीन अपने सनातन पड़ोसी और पंचशील प्रणेता   भारत को शत्रु मानकर चलता है तो उसमें चीन का ही नुक्सान ज्यादा है..

          श्रीराम तिवारी

रविवार, 27 नवंबर 2011

चल अन्ना घर अपने रेन भई यह देश...

 चाहे तथाकथित     अन्ना  हजारे   टीम  हो  ,बाबा रामदेव की  नाटक मण्डली हो या  उनके कन्धों पर चढ़कर राजनीति की उद्दाम आकांक्षा के तथाकथित गैर राजनैतिक  असंवैधानिक सत्ता केंद्र हों ,इन को गंभीरता से देश की जनता ने कभी नहीं लिया.एक सौ बीस करोड़ जनता में से भूले -भटके दस-बीस हजार भावुक भारतीयों और सत्ता विरोध का बाजारी उत्पाद बेचकर अपनी आजीविका चलाने वाले दक्षिण पंथी मीडिया और अधुनातन तकनीकी प्रौद्दोगिकी के संचालकों ने भले ही बहती गंगा में हाथ धो लिए हों किन्तु आम भारतीय जन-मानस ने अपनी राष्ट्रीय चेतना के नीति निर्देशक सिद्धांतों  पर कोई समझोता नहीं किया.
       अन्ना हजारे की बौद्धिक चेतना-राजनैतिक-आर्थिक-सामाजिक-वैदेशिक और जन -क्रांति विषयक समझ बूझ पर मुझे कभी कोई शक नहीं रहा.अपने ब्लॉग -इन्कलाब जिंदाबाद पर, प्रवक्ता.कॉम पर ,हस्तक्षेप.कॉम पर मेने जितने लेख प्रस्तुत किये वे इन तथ्यों  की स्व्यम्सिद्ध पुष्टि करते हैं.मुझे प्रारंभिक दौर में पूरा यकीन हो गया था कि राष्ट्रीय चेतना और मूलगामी बदलाव समेत भृष्टाचार इत्यादि बिन्दुओं पर अन्ना और रामदेव अपरिपक्व ही हैं.सोच समझ और मौलिक जनवादी चेतना या क्रन्तिकारी दर्शन कि अज्ञानता के वावजूद मेने कई मर्तवा अन्ना और रामदेव समेत  अन्य सत्ता विरोधी आवाजों को मुखरित होने  में सहयोग  किया.क्यों?
        जो लोग यह सोच रखते हैं कि सबकी बेहतरी में ही मेरा भी बेहतरी है,देश और दुनिया की भलाई में ही मेरी भी भलाई है ,सबकी बर्बादी में ही मेरी भी बर्बादी है और देश कि बर्बादी में मेरी बर्बादी असंदिग्ध है और  यदि देश को भृष्टाचार रुपी कठफुरवा अन्दर से खोखला कर रहा है तब में भी तो अन्दर से खोखला ही होता जा रहा हूँ!इत्यादी ...इत्यादि...स्वाभाविक है कि में भी इस कतार में खड़े होकर अपने हिस्से की आहुति के लिए तैयार रहूँगा.मैं जनता हूँ,मैं आम आदमी हूँ,मुझे जमाने भर के राजनैतिक -सामाजिक-आर्थिक और वैज्ञानिक परिवर्तनों  और उनके परिणामस्वरूप पृकृति प्रदुत्त अवदानो का कोई ज्ञान भले न हो किन्तु ' हित अनहित पशु पक्षिंह जाना 'तदनुसार यह भी स्वभाविक है की चाहे कोई राजनैतिक पार्टी हो ,व्यक्ति हो ,गैर राजनैतिक {?}बाबा या गांधीवादी समाज सुधारक होयदि वह इस तरह के सैधांतिक सुधारों की अपेक्षा प्रकट करता है तो  उसके स्वर में स्वर मिलाकर अपने सामूहिक हितों की रक्षा करना मेराभी  कर्तव्य है.भले ही वैचारिक और दार्शनिक स्तर पर अन्ना और रामदेव जैसे व्यक्तियों का सरोकार शून्य है किन्तु वे बिजुका  ही सही ,कागभागोड़े  ही सही देश की जनता के एक हिस्से -खास तौर से उत्तर भारत के मध्यम वर्ग को उद्देलित करने  का काम तो कर ही रहे थे.भले ही चेनई ,त्रिवेंदृम या हैदरावाद में इनकी पूंछ परख न हो किन्तु दिल्ली के राम लीला मैदान से लेकर हरिद्वार और रालेगन सिद्धि तक तो बोलबाला था ,इसमें किसी को कोई शक नहीं.ये विजूके कुछ हद कारगर हो रहे थे कि "बस एक ही थप्पड़"ने किये कराये पर पानी फेर दिया.
     बाबा रामदेव तो तभी खाली कारतूस सावित हो चुके थे जब दिल्ली पुलिस के डर से सन्यासी पीत वस्त्र त्याग कर महिला वस्त्रों में छिप -छिपाकर जान बचाने की जुगत में जग हँसाई के पात्र बन गए थे.किन्तु अन्ना रुपी बिजुका फिर भी कारगर लग रहा था.दिल्ली में उनके अनशन के ५ वें रोज तो भारत के भड़काऊ-डरावु-उडाऊ-खाऊ मीडिया ने कभी थ्येन आन मन चौक कभी तहरीर चौक तो कभी क्रेमलिन स्कुँयर की उपमा से अन्ना एंड कम्पनी के उपक्रम को महिमा मंडित किया ही था.किन्तु जिस तरह शेर की खाल ओडने से सियार सिंह नहीं जाता या मात्र काला होने से कौआ कोयल नहीं हो जाता उसी तरह गाँधी टोपी लगाने और नैतिकता की हांक लगाने या सत्याग्रह का स्वांग रचाने से कोई गांधीवादी नहीं हो जाता .चलो मान भी लेते हैं की आप सच्चे गांधीवादी ही हैं तो?इससे क्या फर्क पड़ता है स्वयम गाँधी जी ने और उनके वाद उनके महानतम पत्तशिष्यों
-जे.पी.नेहरु,कृपलानी,विनोवा,मोरारजी,इंदिराजी,राजाजी,सीतारामैयाजी जी,से लेकर देश के तमाम वामपंथी और दक्षिणपंथी गांधीवादियों ने आजादी के ६४ साल में  उस तथाकथित 'गांधीवाद'से क्या हासिल किया है?
 पूरा देश एकमत से मानता है कि व्यवस्था परिवर्तन के बिना भृष्टाचार से देश और देश की जनता की मुक्ति संभव नहीं!गांधीवाद तो यथास्थ्तिवाद का पर्याय है.शरद पवार भी पुराने गांधीवादी हैं  किसी ने यदि उन्हें एक थप्पड़ जड़ दिया तो दूसरा गाल उस हमलावर के सामने करने में चूक क्यों?शरद पंवार की पार्टी राकपा भी तो गांधीवादी ही है ,फिरइस क्षेत्रीय पार्टी के वफादारों {गांधीवादियों?}के मार्फ़त  पूरे महाराष्ट्र में हिंसा का तांडव क्यों?क्या अन्ना ,क्या शरद पंवार सब एक ही बांस भिरे  के झंडा वरदार हैं.तभी तो शरद पवार को लगे थप्पड़ पर अन्ना ने जो आप्त बचन उच्चरित किये'बस एक ही थप्पड़' वे खुद अन्ना के दोनों गालों पर और न केवल अन्ना एंड कम्पनी बल्कि पूरी की पूरी तथाकथित गांधीवादी बिरादरी के गालोँ पर दोगलेपन की कालिमा का कलंक बनकर ;सत्याग्रह'अनशन और अहिंसा के सिद्धांतों  की छाती पर अठ्ठास कर रहे हैं.
     अन्ना हजारे की सोच ,समझ और प्र्ग्याशक्ति के सन्दर्भ में देश के प्रबुद्ध वर्ग ने  भी गच्चा खाया हैयह तो होना ही था.अलबतता .जो उन्हें बिजुका मानकर भृष्टाचार रुपी हिंसक जंतुओं से भारत रूपी खेत की रक्षा के  लिए  उपयुक्त मानकर चल रहे थे उनकी सदाशयता को जरुर धक्का लगा होगा.एक मजबूत लोकपाल बिल बने ,देश में आनैतिक लूट खसोट बंद हो,समानता,बंधुत्व,शांति,और समृद्धि में सभी को बराबर अबसर मिले और इस महान उदेश्य के लिए जो कदम उठाये जा रहे हैं वे किसी विक्षिप्त युवा के एक थप्पड़ से धुल धूसरित न हों इसके लिए जरुरी है कि अन्ना को अपने संगी साथियों समेत संयमित होना होगा.कभी शराबियों को पेड़ से बाँधने और कोड़े मारने के तालिवानी वयां ,कभी किसी पार्टी या उसके नेता को चुनाव में हराने का बयान ,कभी कहना कि 'बस एक थप्पड़'ये किसी उच्च विचारधारा के प्रमाण नहीं.धीरोदात्त उज्जवल धवल चरित्र के स्वामी ,मनसा बाचा -कर्मणा और सामूहिक नेत्र्त्वाकारी व्यक्तित्व के धनि व्यक्ति ही    जनता जनार्दन का विश्वाश हासिल कर सकते हैं चापलूसों  दुवारा लिखी पटकथाओं के संवाद बोलकर लोक प्रसिद्धि भले ही मिल जाये किन्तु धैर्य और बुद्धि चातुर्य की परीक्षा तो संघर्षों के दरम्यान बार-बार हुआ करती  है तब मौन वृत से काम नहीं चलेगा और अनर्गल बाचालता तो नितांत वर्जनीय है.अच्छे -खासे जन आन्दोलन को पंचर करने में लगी अन्ना टीम अपनी असफलता का ठीकरा सरकार या राजनीतिज्ञों पर ढोलने लग जाए ये भी संभव है.शरद पवार को थप्पड़ मारे जाने पर अन्ना की प्रतिक्रिया ने खुद अन्ना टीम को 'विश्वाश के संकट'में धकेल दिया है .खुदा खेर करे!!!
     श्रीराम तिवारी
 

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

विश्व पूंजीवाद के स्वर्णिम दिन लदने को हैं

एक  ध्रुवीय   गतिज उर्जा के नकारात्मक परिणाम उसके सृजनहार द्वारा छुपाये नहीं छुप रहे हैं.सोवियत समाजवादी व्यवस्था की जड़ों में मठ्ठा डालने वालों को अब दुनिया भर में अपनी फजीहत कराने में भी शर्म नहीं आ रही है.पेंटागन आधारित और बहुराष्ट्रीय एकाधिकारवादी कम्पनियों द्वारा निर्धारित वैश्वीकरण की पूंजीवादी आर्थिक नीतियों के दुष्परिणाम अब अमेरिका तक  सीमित नहीं रहे.श्री ओबामा जी लाख चाहें  कि अमेरिका अपने संकट कोशेष विश्व के कन्धों पर लादकर अपने परंपरागत पूंजीवादी-साम्राज्यवादी निजाम को बरकरार रख ने में बार -बार कामयाब होता रहे,किन्तु नियति को या यों कहें कि आधुनिक विश्व चेतना को ये मंजूर नहीं.अमेरिकी प्रशासन को ज्ञात हो कि 'रहिमन हांडी काठ कि ,चढ़े न  बारम्बार..'या   'ये इश्क नहीं आशां इतना समझ लीजे,इक आग का दरिया है;डूब के जाना है.' उधर आर्थिक संकट से जूझ रहे ग्रीस {यूनान}को राहत देने के लिए' यूरोप संघ 'ने प्रस्ताव का प्रारूप  तैयार ही किया , कि  इधर इटली ,फ़्रांस की आर्थिक बदहाली के अफ़साने भी  मीडिया की जुबान पर आ ही गए.यूरोपीय यूनियन अर्थात यूरोजों के  वित्त मंत्रियों की  जनरल बॉडी मीटिंग के बाद सभी सम्बंधित देशों और उनके बैंकों को चेतावनी दी गई की वे अपने-अपने घाटे कम करें.ग्रीस के आर्थिक संकट ने न केवल यूरोपीय संघ ,न केवल उसके हमराहएवं  घोर पूंजीवाद परस्त -सरपरस्त अमेरिका,बल्कि सारी  वैश्विक वित्त मण्डली को बैचेन कर डाला है.पूरी दुनिया के पूंजीवादी अलमबरदार बड़ी -बड़ी बैंकों और पूँजी संचलन केन्द्रों पर दवाव बना रहे हैं कि इस अधोगति और बदनामी से बचाने के पूंजीवादी उपचारों को खंगालिए. ,हमारी ठेठ हिंदी में इसे यों कहा जाता है कि 'मस्के पाद महा पापी-उत्तम्पाद धड़कानाम' अर्थात अपान वायु को  विसर्जित करने का अधम तरीका तो हुआ 'मसकैं-पाद' और उत्तम तरीका हुआ धड़कानाम !!!
       चूँकि वर्तमान दौर के यूनानी आर्थिक संकट की धुरी विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के मार्फ़त सम्पूर्ण यूरोप और उसके सहयात्री अमेरिका के मर्मस्थल में धसी हुई है,अतएव यूरोपीय यूनियन पर दुनिया भर के सभ्रांत लुटेरों का बेजा दवाव है की इस मौजूदा  आग की लपटों को फ़ौरन शांत किया जाए.यही वजह है कि लगभग दिवालिया हो चुकी इटली की अर्थ व्यवस्था और अधःपतन को प्राप्त हो चुकी फ़्रांस की अर्थ व्यवस्था के वावजूद यूरोपीय संघ द्वारा  विगत सितम्बर में रोकी गई सहायता लगभग आठ अरब यूरो के रूप में ग्रीस को तत्काल दिए जाने का ऐलान किया जा रहा है.५.८ अरब यूरो की रुकी हुई मदद राशी भी शीघ्र जारी किये जाने की  सम्भावना है.
       यूनान की आंतरिक राजनीती का ज्वार भी उफान पर है.उपरोक्त ऋण राहत पैकेज पर जनमत संग्रह के ऐलान से बाज़ार हक्के-बक्के हैं.इससे यूरोप के नेता बेहद नाराज हैं.हलाकि फ़्रांस ने राहत पैकेज को अंतिम विकल्प बताया किन्तु स्वयम फ़्रांस की स्थिति ये है की निकोलस सरकोजी को स्वयम  वेतन नहीं लेने की घोषणा करनी पड़ रही है.इटली की जर्जर आर्थिक दुरावस्था को स्थिरता प्रदान करने केलिए  बर्लुस्कोनी शीर्षासनलगा रहे है.चौतरफा संकट की स्थिति में इटालियन बांड्स भारी दवाव में आ चुके हैं.यूरो क्षेत्र का संकट लगातार फैलता जा रहा है.डालर के मुकाबले यूरो की विनिमय दर घटकर १.३६०९ यूरो रह गई है.इस ताज़ा उठापटक से यूरोपीय बाज़ारों में ५%से ज्यादा गिरावट रेखांकित की गई है.इटली के लिए स्थिति असहज हो चुकी है.आम जनता सड़कों पर निकल चुकी है,फ़्रांस में हड़तालों का दौर जारी है.
     उधर अमेरिका में २००८ की आर्थिक मंदी की मार के घाव भरे भी न थे किअचानक चार-चार विशालकाय बैंक धराशाई होते चले गए.इनके सहित मौजूदा आर्थिक सत्र में भूलुंठित बेंकों कि संख्या ८४ हो चुकी है .अमेरिका में आभासी वित्त पूँजी की अनुपलब्धता की वजह से बेंकों का कारोबारी संकट आम हो चला है.इससे पहले २०१० में १५७ अमेरिकी बैंकें अपना बोरिया बिस्तर बाँध चुकी हैं.अपने असीमित अंतर्राष्ट्रीय हितों के बहाने ,आतंकवाद से लड़ाई के बहाने ,दुनिया भर में थानेदारी का रौब बरकरार रखने के फेर में अमेरिका पूंजीवादी साम्राज्यवाद का सूर्यास्त निकट है.वाल स्ट्रीट कब्ज़ा करो 'आन्दोलन इस दिशा में क्रांति की भोर का तारासावित हो सकता  है.
       
  श्रीराम तिवारी
     

रविवार, 30 अक्टूबर 2011

भाववाद बनाम विज्ञानवाद

  वे जो दुनिया को बताते हैं कि चेतना ,आत्मा या परमसत्ता ही इस धरती के होने,ब्रह्मांड के होने का मूल कारक है ;अध्यात्मवादी या भाववादी कहे जाते हैं.वे जो पदार्थ या उर्जा को  ब्रह्मांड का मूल कारक मानते हैं;भौतिकवादी या अनीश्वरवादी कहे जाते हैं.आदिमकाल से ही मानव सभ्यताओं के विभिन्न कालों और विभिन्न स्थानों में प्राय:उक्त दोनों ही दर्शनों या विचारधाराओं का बोलबाला रहा है.भाववादी या अध्यात्मवादी द्रष्टिकोण ने आगम-निगम-पुराण -वेद,बाइबिल,कुरआन,जिन्दवेस्ता,मठ,मंदिर,मस्जिद,गुरूद्वारे,गिरजे,पीर,पैगंबर,अवतार,धर्म-अधर्म का सृजन किया है.जबकि पदार्थवादी भौतिकवादी विचारधारा ने  मनुष्य को वन्य पशुओं से उत्कृष्ट{अथवा चालाक}और ब्रहमांड को परिभाषित कर सकने लायक बनाया.यह पदार्थवादी चिंतन भारत में लोक-मान्यता नहीं पा  सका और  किलिष्ट संस्कृत भाषा में प्रस्तुत  होने के कारण कणाद,कपिल,अश्वघोष,नागार्जुन,चार्वाक और चाणक्य जैसे भौतिकवादी आज भले ही पढ़े-लिखे अध्येताओं की नज़र में महान हों किन्तु भारत की ७५%जनता को  तो वैज्ञानिक परम्परा के मूल अधिष्ठाताओं के व्यक्तित्व क्रतित्व से कोई सरोकार नहों,वे भौतिकवादी विचार से उत्पन्न तमाम आविष्कारों -बिजली,टेलिफोन,दूरदर्शन,  कंप्यूटर,रेल,कार,एरो प्लेन का हर संभव दोहन तो  धडल्ले  से करते हैं किन्तु भाववादी मरी हुई बंदरिया को छाती से चिपकाए हुए हैं....      श्रीराम तिवारी  

शनिवार, 29 अक्टूबर 2011

असभ्य कौन ?

जो शब्द रचना मानवीय संवेदनाओं का उन्नयन करे,जिस शब्द संयोजन से सरस निर्झरनी अनवरत सदानीरा सरिता की मानिंद बहती रहे,जो शब्द समुच्चय लोकानुषित्वा हो,जिस वाक् शक्ति से मन-प्राण-शरीर झंकृत हुआ करे,उसे ही छंद रचना अथवा कविता कहते हैं.जब इस प्रकार के शाब्दिक  रूप आकार में रस-अलंकार-गेयध्व्नी का अर्क घोला जाए और राज्यसत्ता,लोकसत्ता,जनसत्ता के त्रिफला चूर्ण की जन-आकांक्षा का सत समाहित किया जाए; तो  इस लोक-काव्यानुकृति से क्रांति गीतों  को अमरत्व प्रदान किया जा सकता है.क्रांति गीत जिस कौम के पास नहीं वो गुलाम और असभ्य है.
                               श्रीराम तिवारी


मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

Happy Deepawali

      May the Almighty illuminate your life with prosperity.Delights glorious successness and all pleasures in the life, on this festival of enlightment of  soul on deepavali.Wish you a very happay deepavali.
                          shriram tiwari  'appah,deepo bhav'

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

नये राजनैतिक ध्रुवीकरण की संभावनाएँ पुनर्जीवित.

अति-उन्नत वैज्ञानिक-सूचना एवं  संचार क्रांति की बदौलत धरती पर   यह बहुत तीव्रगामी परिवर्तनों की लालसा का दौर है. अपने बाह्यरूप -आकार में चीजें जितनी विद्रूप नजर आती हैं ; वस्तुतः वे अपने आप में अन्यान्य सुन्दर और सकारात्मक गुणों से सम्पृक्त भी हैं.वैश्विक परिदृश्य में भारत की तस्वीर यदि यूरोप, पूर्व-एशिया चीन, तथा समीचीन राष्ट्रों के सामने फीकी है तो उपद्रवग्रस्त,आतंकग्रस्त मुस्लिम राष्ट्रों और घोर दरिद्रता एवं भुखमरी से पीड़ित मध्य-अफ़्रीकी राष्ट्रों से उजली भी है.संचार माध्यमों पर शक्तिशाली वर्ग के आधिपत्य और भूमंडलीकरण की कोशिशों ने दुनिया भर के निर्धन,अकिंचन और अभावग्रस्त नर-नारियों को लगभग पंगु ही  बना डाला है. शोषण से मुक्ति की कामना की जगह अवसाद,कुंठा,हिंस्र प्रतिस्पर्धा और संवेदनहीनता स्थापित होती जा रही है.
      भारत के विद्वान् लेखक,इंटेलेक्चुअल,एनजीओ संचालक,अखवार नवीस और इन सबके प्रभामंडल से आक्रांत भारत का मजदूर-छोटी जोत का किसान-खुदरा व्यवसायी-खेतिहर मजदूर-दैनिक वेतनभोगी और
निम्न मध्यम वर्ग का शिक्षित-अशिक्षित आवाल वृद्ध-नर-नारी वेहद उदिग्नता के दौर से गुज़र रहा है.नितांत सर्वहारा-वर्ग को जो कि वर्गीय-चेतना से कोसों दूर है,इस जड़तामूलक अधोगति से कोई सरोकार नहीं . अपनी दयनीयता,निर्धनता,आवास-हीनता,सामाजिक-आर्थिक-शारीरिक सुरक्षा-विहीनता का कारण देव {इश्वर}को मानकर चलने वालों को वर्तमान दौर के इन झंझावातों में भी आशा कि जो एक किरण नज़र आ रही है ;वो है अपने मताधिकार की  ताकत. वोट की  ताकत का लोकतंत्र में उतना ही महत्व है जितना कि सूरज में धूप का और चंदा में चांदनी का.वैयक्तिक,पारिवारिक,सामाजिक,जातीय,क्षेत्रीय जैसे निक्रष्ट  स्वार्थों से लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्वार्थ भी वोट की ताकत से ही साधे जा सकते हैं. वर्तमान राजनैतिक  परिदृश्य  को भारत का सूचना एवं संचारतंत्र कुछ इस तरह पेश कर रहा है की मानों गठबंधन के एनडीए और यूपीए दो ध्रुव ही क्षितिज पर विद्यमान हैं;तीसरा कोई विकल्प मौजूद ही नहीं है.
       माना कि अधिकांश क्षेत्रीय दलों में राष्ट्रीय मूल्यों और अंतर्राष्ट्रीय नीतियों का अभाव  है ,किन्तु उनको संगठित और संयोजित करने वाले वामपंथ तथा यत्र-तत्र बिखरे हुए  पुराने लोहियावादियों-समाजवादियों के पास
किसी किस्म की आर्थिक,सामाजिक,वेदिशिक और राजनेतिक चिन्तनशीलता का अभाव  नहीं है नितीश बाबु,मायावती,जयललिता,नवीन पटनायक,देवेगौडा,मुलायम,पंवार,पासवान बादल ,उमर अब्दुल्ला और समूचा वाममोर्चा यदि एक हो जाएँ और भाजपा का बाहर से समर्थन मिले तो तीसरा मोर्चा सता में आ सकता है..कांग्रेस और यु पी ऐ यदि राहुल गाँधी को आगामी प्रधानमंत्री मानकर चल रहे हैं तो यह तभी संभव है जब राहुलजी उन नीतियों से नाता तोड़ें जिनके कारण आज़ादी के ६४ साल बाद भी उन्हें स्वयम गाँव के दलित गरीब कि झोपडी में एक ग्लास स्वच्छ पानी नहीं मिल सका. देश कि जनता यदि यूपीए गठबंधन को तीसरी बार बहुमत से जिताती है और यूपीए संसदीय बोर्ड अपना आगामी नेत्रत्व राहुल को सौंपता है तो इससे यह माना जाएगा कि गाँव में २६ रुपया रोज कमाने वाला और शहर में ३२ रुपया रोज कमाने वाला खुशहाल है. मानाकि राहुलजी नेकदिल इंसान हैं,हर दिल अज़ीज़ हैं,वतन परस्त हैं,भृष्टाचार और अन्याय के विरुद्ध हैं ,युवा हैं,सुन्दर हैं किन्तु क्या वे विश्व-बैंक ,अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और देश पर काबिज कार्पोरेट लाबी द्वारा प्रणीत प्रतिगामी आर्थिक नीतियों को पलटकर जन-कल्याणकारी,सामाजिक सरोकारों से युक्त वैकल्पिक नीतियों के बारे में रंचमात्र भी चल सकेंगे? नहीं !!
             १९६९ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिराजी ने नारा दिया था- गरीवी हटाओ- आज़ाद भारत कि सत्ता के ६५ सालों में से लगभग ५५ साल केवल और केवल कांग्रेस ने ही देश पर हुकूमत की है.गरीवी ज्यों की त्यों बरकरार है,महंगाई सुरसा के मुख की तरह बिकराल है,भृष्टाचार अपरम्पार है, हर तरफ सरकारी अफसरों द्वारा देश कि जनता की लूट वेशुमार है. सब जानते हैं कि कौन जिम्मेदार है?
       स्वर्गीय राजीव गाँधी ने प्रचंड बहुमत पाने के बाद,सत्ता में आने पर   १९८५ में कहा था कि 'हम १०० पैसे दिल्ली से भेजते हैं किन्तु ८५ बीच में गायब हो जाते हैं'कांग्रेस के लिए यह सूक्त-वाक्य अपने अधिकृत  लेटर पैड  पर छपवा लेना चाहिए.अन्ना एंड कम्पनी,बाबा रामदेव या कोई और अधिनायकवादी व्यक्ति या समूह देश में दिग्भ्रम फ़ैलाता है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी बहरहाल कांग्रेसी नेत्रत्व की  ही मानी जाएगी.
    देश कि प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा बड़े गर्व से दावा करती है कि वह अन्य दलों से अलग है.उसका चाल,चेहरा और चरित्र बहुत उन्नत किस्म का है.केंद्र की सत्ता में आने पर उसने देश को जो घाव दिए वो तो सदियों तक याद रखे जायेंगे किन्तु जो वादे किये उनके पूरे न होने से समूचा हिन्दू समाज उससे कट चूका है.अब भाजपा में यत्र तत्र सर्वत्र विकास -पुरुष {विकास  नारी नहीं!}पैदा किये जा रहे हैं.नरेंद्र मोदी को जब गडकरी ने विकास- पुरुष कहा तो आडवानी जी ने कहा शिवराज ही विकास  पुरुष है,उधर रमण सिंह भी सरकारी इश्तहारों में विकास  पुरुष कि छटाएं बिखेर रहे हैं.स्वयं गडकरी जी कि भी सेहत अच्छी खासी है ,उनका विकास  भी वैयक्तिक रूप से श्लान्घ्नीय है,कि संघ  ने फर्श से अर्श पर बिठा दिया.भाजपा में रेड्डी बंधुओं ने जितना विकास  किया उसका शतांश भी कोई कांग्रेसी क्या खाक करेगा?
   तत्कालीन अटल सरकार के चार मंत्रियों पर हवाला काण्ड कि तलवार लटकी थी.२००० में तत्कालीन केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त एन विट्ठल ने सीबीआई से कहा था कि वह उन चार केन्द्रीय मंत्रियों कि अंधाधुंध काली- कमाई की जांच करे, जिन पर हवाला के आरोप हैं.उसके बाद क्या हुआ ?एनडीए सरकार ने विट्ठल की नाक दबा  दी, उनके अधिकार छीनकर सतर्कता-आयोग को तीन सदस्यीय  बना दिया.ताकि आइन्दा कोई एन बित्थल  इस तरह कि हिमाकत न कर सके.यह काम उस भाजपा ने किया जो कांग्रेस पर भृष्टाचार के आरोप लगाने के लिए रथ-यात्रायें निकाल रही है.कभी अन्ना ,कभी रामदेव  कभी उपवास  और कभी रामधुन गाकर सत्ता-सुन्दरी का आह्वान कर रही है.ये इश्क नहीं आसान ...
    भाजपा आज भी क्वात्रोची-क्वात्रोची चिल्ला रही है जबकि अपने किये धरे को भूल रही है.सारा देश जानता है कि वह भाजपा का ही एक  चेहरा था जो शराब के नशे में बोल रहा था,पैसा  खुदा नहीं,पर खुदा कसम ,खुदा से कम भी नहीं'यह बिडम्बना ही है कि भाजपा अपनी कसौटी पर-चाल,चेहरा,चरित्र पर ढेर हो गई जिसका फायदा अनायास  ही उस कांग्रेस को २००४ में मिला जो देश को दुर्गति में ले जाने के लिए जिम्मेदार है.भाजपा अब जनता कि नहीं दौलत वालों कि ,राजनीति  के ठेकेदारों कि और बड़बोलों की अंक-शायनी  बन चुकी है ,अन्ना,रामदेव या नत्थू-खेरों के चक्कर में दिग्गजों के अहंकार का अड्डा बन चुकी है.
   सिर्फ उपवास ,अनशन, रथ-यात्राओं या जन्म दिन मनाने से राज्य-सत्ता की प्रप्ति,अभीष्ट का ध्येय समभाव नहीं. राज्य-क्रांति के लिए यदि जन-समर्थन या वोट चाहिए तो जनता के हित की नीतियां और कार्यक्रम पेश करो वरना हाथ कुछ नहीं आने वाला- वही-जीरो/सन्नाटा.

       श्रीराम तिवारी
  

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

शुक्रिया

सभी सुह्र्दय्जनों ,बंधुओं,मित्रों,प्रसंशकों का शुक्रिया.
      दोस्तों, मैं विगत दिनों इंदौर के राज्यश्री अस्पताल में  भर्ती था.मुझे अस्थमा ,उच्च-रक्तचाप,और चिकनगुनिया सब एक साथ हो गए थे.अत्यंत मर्मान्तक और असहनीय वेदना सहते हुए तीन महीने हो गए हैं.अभी शतांश ही स्वस्थ  हो पाया हूँ .इस बीमारी के दौरान जिन मित्रों,सपरिजनों,और शुभचिंतकों ने मेरा संबल बढाया,सहयोग दिया उनका तहेदिल से आभारी हूँ.
          सर्व श्री डॉ अशोक वाजपेई,श्री भदालेजी,दिनेश तिवारीजी,पुष्पेन्द्र सिंह जी,नरेन्द्रजी,किरणजी,उपाध्यायजी,कमल टटवडे जी,शेरुजी,पटोदिया जी,टोपोजी,लोदवालजी ,गंगमवार जी,चिदारजी अनिल जैन एसडीओ-खान साब,  एस डी ओ- श्रीमती दीप्तिमती शुक्लजी,प्रेम तिवारी जी,संतोष शर्माजी ,हाडा जी, कौशिक् जी,  सुधीर शर्मा जी,नेमीजी ,विपिनजी एवं अन्य उन सभी बंधुजनो,मित्रों का आभारी हूँ;जिन्होंने इस संकटकाल में प्रत्यक्ष व् परोक्ष सहयोग दिया.
            का. संपतराव, सर्कल सेक्रेटरी-आंध्र, का.नम्बूदिरी अध्यक्ष-बी एस एन एल इ यु तथा का.प्रकाश शर्मा का भी आभारी हूँ ; जिन्होंने होसला आफजाई की.
      चिरंजीव प्रवीन,पुत्रवधू अर्चना,पत्नी उर्मिला ,समधी  कीर्तिवल्लभ  जी, दोनों समधिन जी , छोटे समधी जी , सुधीर खर्कवाल जी, पुत्री अनामिका ,नाती अक्षत,और पौत्र चेतन्य के निरंतर स्नेह और प्यार ने मेरी जिजीविषा को साधा ,उन सभी को ढेर सारा प्यार.
        श्रीराम तिवारी शुक्रिया