शनिवार, 23 जुलाई 2011

गाँव का भूस्वामी ओर शहर का पूंजीपति आपस में मौसेरे भाई हैं.

 यह सर्वज्ञात है कि मरण धरमा  एवं नित्य परिवर्तनीय सृष्टि में मनुष्य सबसे अधिक सचेतन प्राणी है.इसके वावजूद कि सभ्यता के आरम्भ से ही वह एक ओर तो पृकृति के अवदानों से प्रमुदित था ही किन्तु दूसरी तरफ दुर्दमनीय प्राकृतिक अबूझ आपदाओं से पराजित होकर चुपचाप हाथ पै हाथ धरे नहीं बैठा रहा.नदी घाटी सभ्यताओं और दोआब की सभ्यताओं के उत्थान -पतन के साथ-साथ जहां जहां भी उसकी जीवन्तता सुनिश्चित संभव थी मानव समुदाय के रूप में गाँव एवं नगरों में ;उसने अपनी जेविक श्रेष्ठता के झंडे गाड़े.यूरोप ,अमेरिका ,चीन और दक्षिण अमेरिकी राष्ट्रोंमें गाँव और शहर का अंतर मिटता जा रहा है.किन्तु इस  से इतर  भारतमें  गाँवों की स्थिति बद से बदतरहोती जा रही  है.भारत में भी यदि पंजाब हरियाणा और यु पी केकुछ  गाँव समृद्ध हैं भी तो वहां खापवाद ,जातिवाद ,सामंतवाद जैसी सामाजिक विषमताएं और कन्या भ्रूण हत्या केअमानवीय कृत्यों के  चर्चे आम हैं.यदि बिहार,मध्यप्रदेश ,छतीसगढ़ और राजस्थान के गाँवों पर नज़र डालें तो सर्वत्र न्यूनतम मानवीय सुविधाओं वंचित हैं.गाँव सिर्फ शहरों के उदर भरण के निमित्त बनकर रह गए हैं.
                        सभ्यता के अधुनातन दौर में गाँव हासिये पर चला गया.है वैज्ञानिक तरक्की और संचार सूचना प्रौद्दौगिकि के अति उन्नत युग में भी आज का गाँव अपने समसामयिक नगरों से कोसों नहीं तो मीलों दूर जरुर हो गया है.  वे गाँव जो बड़े शहरों के इर्द-गिर्द  बसे हैं या किसी राष्ट्र्यीय राजमार्ग के विस्तारीकरण की जद में आये हैं उनके तो बाजारीकरण   के वरदान स्वरूप मानो  भाग्य ही खुल गए हैं.खास तौर से  इन गाँवों के चंद दवंग और जमींदार वर्ग की तो पौ बारह हो रही है. कहीं इनके लिए ममता बेनर्जी ,कहीं राहुल गाँधी ,कहीं अग्निवेश्जी,कहीं मेघा पाटकर जी और कहीं स्वयम माननीय अदालतें अपनी कृपा दृष्टी से मालामाल कर रहीं हैं. किन्तु यह सौभाग्य देश के उन आठ लाख गाँवों को प्राप्त नहीं है जो सड़क बिजली और पेयजल जैसी मूलभूत न्यूनतम सुविधाओं से आज भी महरूम हैं.शिक्षा और स्वास्थ्य में तोइन दिनों  शहरों की भी हालत चिंताजनक है तब इन उपेक्षित गाँवों की क्या बखत होगी?जबसेबाज़ार  ने भूमि अधिगृहण को पूँजी के सर्वोत्तम उत्पाद में रूपांतरित करने का फार्मूला
ईजाद किया है,बड़े किसानों और भूतपूर्व जमीनदारों की बल्ले-बल्ले हो रही है.यह तबका भले ही गाँव की कुल आवादी का १०% ही क्यों न हो किन्तु वह ग्रामीण क्षेत्र की सकल संपदा के ८०%पर काबिज है.शेष ९० % ग्रामीण आबादी के हिस्से में मात्र २०%जमीन और अन्य सम्पत्ति आती है. पहले वाले हिस्से को शहरी पूंजीपतियों,अफसरों,नेताओं,समाजसेविओं,बिचोलियों और वित्तीय संस्थानों का अन्योंन आश्रित सहयोग प्राप्त है.इन्ही के हितों को साधने में सिंगूर,नंदीग्राम,भट्टापारसौल,अलीगढ,आगरा और तमाम उन जगहों पर जमीन को लेकर मारामारी चल रही है.सभी जगह जब सत्ता से समीकरण नहीं बैठ पता तो प्रतिरोध दरसाने के लिए गाँव के उन गरीव -मजदूर किसानो और वेरोजगारों को पुलिस और क़ानून के आगे ढाल बनाकर खड़ा करने में उक्त एलीट क्लासअर्थात बड़ी जोत के मालिकों  की चालाकी का कोई सानी नहीं .यह आधुनिक सामंती प्रभु वर्ग अपने पुरातन दंड विधान से ग्रामीण क्षेत्र की निरक्षर ,निरीह और लाचार जनता का श्रम शोषण तो करता ही है साथ में आधुनिक प्रजातांत्रिक अधिकारों को,न्याय व्यवस्था को और राजनीती को अपने पद प्रक्षालन के लिए तैनात कर सकने में भी सिद्धहस्त है.दिल्ली में चाहे एन ड़ी ऐ हो ,यु पिए हो,या कोई भी सरकार राज्यों में हो यदि कोई जन्कल्यान्कारी या ग्रामीण जनता के हित की योजना सरकार द्वारा  लागू होती है तो यह गाँव के तथाकथित दवंगों और भू स्वमियों का स्वल्पाहार बनकर रह जाती  है.
      विगत दिनों एक ऐसे ही गाँव में मेरा जाना हुआ जो एक प्रख्यात राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे बसा हुआ है.उस गाँव के किनारे से होकर गुजरने बाले राष्ट्रीय राजमार्ग को ४-६ लेन में बदला जा रहा है.कहीं-कहीं काम अधूरा था.गाँव के भूतपूर्व जमींदार और वर्तमान सरपंच पति ने बड़े गर्व से बताया कि ५-६ साल पहले जब उसे इस राष्ट्रीय राजमार्ग के चौडीकरण कि खबर लगी ;तो उसने उन किसानों कि जमीन को ,;सस्ते दामों पर खरीद ली , जो कि सड़क के निमित्त अधिगृहीत किया जाना संभावित थी इन महाशय ने बड़े गर्व से अपनी और शाशन  व्यवस्था कि काली करतूतकुछ इस तरह  बताई मानों उनने सिंहगढ़ विजय किया हो.उनका कहना था कि गरीव किसानो को पहले तो उन्होंने डर दिखाया कि तुम लोग सरकार से मुआवजा हासिल नहीं कर पाओगे,मुआवजा तुम्हें जितना मिलना है वो पटवारी ,रेवेनु इन्स्पेक्टरया तहसीलदार से पता कर लो.गरीब सीमान्त किसानों ने जब इन भृष्ट अधिकारीयों से पता किया तो उन्होंने वही बताया जो सरपंच पति उर्फ़ जमीन्खोर ने उन अधिकारीयों को पहले से बता रखा था.वे सब आपस में मिले हुए थे और नाते रिश्ते लेन-देन के सहभागी थे.इस तरह प्रस्तावित सडक चौडीकरण कि प्रारंभिक प्रक्रिया से बहुत पहले ही रास्ता साफ़ कर लिया गया.जब शाशन ने राष्ट्रीय राजमार्ग के चौडीकरण हेतु जमीनों के अधिग्रहण बाबत सर्वे प्रकाशित किया तो उन गरीब किसानों को भरी अफसोश हुआ.जब मुआवजे कि
दरें घोषित हुईं तो गरीब किसानो के होश उड़ गए जो जमीन उन्होंने जमींदारों को ५० हजार रुपया एकड़ में बेचीं उसकी कीमत २ लाख रुपया एकड़ हो गई.इन स्वनामधन्य जमीन दार महोदय ने एक ओर चमत्कार किया कि उनकी अत्यंत उपजाऊ और सिंचित जमीन को बचाने के लिए सर्वेयरों तक को खरीद डाला.राष्ट्रीय राजमार्ग कि दिशा और दशा ही बदल डाली.उनका गर्वोक्ति पूर्ण यह कथन भी था कि हमने" ऊपर तक सबको साध रखा है".प्रमाण स्वरूप प्रदेश कि राजधानी में भव्य बंगले से लेकर ठेठ गाँव तक दारू कि कलाली का ठेका उन्ही के पास है.उनकी एक खूबी और है वे समय के साथ चलते हैं जबराज्य कि  सत्ता में कांग्रेस होती थी  तो उसके झंडावरदार हुआ करते थे ,अब जबकि मध्यप्रदेश में भाजपा का शाशन है तो ये श्रीमानजी पक्के "भाईजी"बन बैठे हैं.उनके बारे में आम धरना है कि वे अपने निहित स्वर्थों के लिए किसी का भी गला काट सकते हैं.ये भारतीय ग्रामीण दुर्दशा के जीवंत प्रमाण हैं.गाँवों के वोटों का और विकाश के सरकारी नोटों का स्थाई ठेका इन जैसे लुच्चों लफंगों के हाथ में रहेगा तब तक अन्नाजी हों,रामदेवजी हों,लोकपालजी हों या माननीय उच्चतम न्यायालायजी हों ;कोई भी इस देश के गाँव के गरीबों का तब तक उद्धार नहीं कर सकता जब तक गाँव और शहरों में आ बसे जमीन्खोरों को हदबंदी क़ानून के तहत बेल कि तरह नाथ नहीं दिया जायेगा..चाहे मुग़ल हों अंग्रेज हों ,चाहे नेहरु युगीन कांग्रेस हो,चाहे इंदिरा युगीन कांग्रेस हो,चाहे अटल युगीन एन डी ऐ हो या वर्तमान मनमोहन सोनिया युगीन कांग्रेस सभी को साधने में माहिर यह पूरातन सामंती अवशेष अब पूंजीपती वर्ग से समन्वय स्थापित कर बाज़ार की ताकतों में शुमार हो चूका है.इस तरह गाँव से लेकर शहर और शहर से लेकर महानगरों तक और देश कि राजधानी के सत्ता केंद्र से लेकर विश्व बैंक और आई एम् ऍफ़ तक में अब भारत के बड़े भू स्वामियों के एजेंट मौजूद हैं.इसीलिये भारत के गरीब और छोटी जोत के किसानों ,खेतिहर मजदूरों,और वेरोजगार युवाओं को को वर्ग चेतना से लेस करने के प्रयासों कि महती जरुरत है. ,फ्रुस्टेशन,क़र्ज़ यातना,आत्म हत्या  और शहरों कि ओर दिग्भ्रमित पलायन से भारतीय ग्रामीण क्षेत्र पंगु होता जा रहा है.शहरों कि चकाचोंध और अधुनातन जीवन शेली कि चाह में और अपनी अल्प खेती में गुजारा न हो सकने कि सूरत में गाँव के गरीबों ने शहरों में झुग्गियों में शरण ले रखी है.चूँकि शहरों में पहले से ही महंगाई ,गरीबी भुखमरी के विकराल टापुओं का डेरा है अतेव कोई आश्चर्य नहीं कि अपराधों में बृद्धि हो रही है.ह्त्या बलात्कार ,चोरियां और सेंधमारी आम बात हो चुकी अब तो ये हालत है कि सुदूर बिहार के गाँव से आने वाला एक वेरोजगार नौजवान विगत दिनों इंदौर केदेवी अहिल्या विश्वविद्यालय का ATM  ही उखाड़ कर ले गया..शायद यह इस बात कि चेतावनी है कि गाँव हमारा और शहर तुम्हारा ...नहीं चलेगा...नहीं चलेगा... श्रीराम तिवारी
                               

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

चेत  गावें चेतुए वैशाख गावें  वानियाँ ,
जेठ गावें रोहिणी  अग्नि बरसावे  है!
भवन सुलभ जिन्हें शीतल वातानुकूल,
वृषको तरणि तेज उन्हें ना सतावे है!!
नंगे पैर धरती   पे भूंखा प्यासा मज़दूर,
पसीना बहाए थोरी   छाँव को ललावे है!
अंधड़  चलत इत झोपड़ी उड़त जात,
बंगले से धुन उत डिस्को की आवे है!!

बुआई की वेरियाँ में देर करे मानसून,
निर्धन किसान मन भय उपजावे है!
बंगाल की खाड़ी से ना आगें बढे इंद्रदेव,
वानियाँ बक्काल दाम दुगने बढ़ावे है!!
वक्त पर बरस जाएँ  आषाढ़ के बद्ररा,
तो दादुरों की धुन पे  धरणीहरषावे है!!
                              Shriram Tiwari

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

तथाकथित अपवित्र राजनीतिज्ञों के आगे अब क्यों गिड़गिड़ा रही है अन्ना एंड कंपनी...

 भारत के मध्यम वित्त वर्ग में इन दिनों एक बृहद बैचेनी स्पष्ट परिलक्षित हो रही है.वर्तमान पूंजीवादी प्रजातंत्र ने देश के तीनों राजनैतिक समूहों {यूपीए,एनडीए और तीसरा मोर्चा} को उसी तरह हेय दृष्टि से देखना शुरू कर दिया है;जिस तरह अतीत में उसने बर्बर सामंती या विदेशी आक्रान्ताओं के शाशन तंत्र को देखा था. राजनैतिक नेताओं को अविश्वाश से देखने के लिए राजनैतिक लोग जितने गुनाहगार हैं,उससे ज्यादा देश की वह जनता भी जिम्मेदार है जो तमाम शोषण-दमन और भय-भूंख-भृष्टाचार से पीड़ित होने के वावजूद उन्हीं नेताओं और दलों को ६५ साल से चुनती आ रही है जो उसके इस मौजूदा दयनीय हश्र के लिए परोक्ष रूप से जिम्मेदार है. आइन्दा जब भी कोई चुनाव होंगे तब पुनः वे ही दल और नेता फिर से जीत कर संसद में पहुंचेंगे जिन पर यह अराज्नैतिकता की आकांक्षी जनता,बाबा-लोग, ,अन्ना एंड कम्पनी और मीडिया के लोग नाना प्रकार से सच्चे -झूंठे आरोपलगाने में एक दुसरे से बढ़-चढ़कर हैं.  अपनी बैचेनी को अभिव्यक्ति देकर ये  समझते  है की इस तरह कोई  गैरराजनैतिक अवतारी पुरुष,कोई बाबा कोई योगी ,कोई गांधीवादी या कोई चमत्कार उनके दुःख दारिद्र दूर कर देगा?जहां तक निम्न आय वर्ग-,रोजनदारी मजदूरों,भूमिहीन-किसानों,आदिवासियों,दलितों,कामगार-महिलाओं,निजी क्षेत्र में कार्यरत कम वेतन और ज्यादा मेहनत करने वाले मजबूर नौजवानों की आम और सनातन चिंता का सवाल है तो उसको वाणी देने के लिए गोस्वामी तुलसीदास बाबा  ने शानदार शब्द रचना की है..

      कोऊ नृप होय हमें का हानी ! चेरि छोड़ होहिं का रानी !!

 इन दिनों दो तरह के लोग अपने-अपने ढंग और अपने-अपने मिजाज़ के अनुरूप भृष्टाचार,कालेधन ,महंगाई,और कुशाशन के खिलाफ लड़ रहे हैं. एक तरफ उन लोगों की विशाल कौरवी सेना है जो  या तो राज्यों की सत्ता में है या केंद्र में काबिज़ है.ये लोग वर्तमान व्यवस्था पर घडियाली आंसू बहाकर अपने पापों को छिपाने  की सफल कोशिश कर रहे हैं.धनबल-बाहुबल-राजबल और मीडिया का इन बदमाशों को भरपूर समर्थन प्राप्त है.राजनीती की पतित पावनी गंगा को मैला करने में इसी वर्ग का हाथ है.इस वर्ग को रोटी-कपडा -मकान की फ़िक्र नहीं बस उनकी चिंता है कि लूट की वर्तमान भृष्ट व्यवस्था कहीं नंगी न हो जाए अतेव उसे आड़ में छिपाने के लिए कभी -कभी इन तथाकथित गैरराजनैतिक पाखंडियों, शिखंडियों का उपयोग करते रहते हैं. जब अन्ना एंड कम्पनी ने जंतर-मंतर पर ६-७ अप्रैल कोअनशन का  स्वांग रचाया था तो सुश्री उमा भारती और अन्य उन राजनीतिज्ञों को मंच के पास नहीं फटकने दिया गया था;जो अन्ना के समर्थन{भले ही अपने मतलब के लिए }में वहाँ आये थे.अब -जबकि अन्ना एंड कम्पनी को  मालूम पड़ा की   देश की संसद में पारित किये बिना उनकी सारी मशक्कत बेमतलब है, चाहे जन-लोकपाल बिल हो या कोई भी क़ानून के समापन या संधारण का काम हो उसका रास्ता रायसीना हिल से जाता है. ये लोग कभी-कभी वर्गीय अंतर्विरोध के चलते आपस में भी टकरा जाते हैं.लोकपाल के दायरे में कौन-कौन होगा?कौन नहीं होगा?इन तमाम नकली सवालों में देश की आवाम को उलझाए रखकर अपने वर्गीय हितों को बड़ी चालाकी से सुरक्षित रखा जाता है.
   जब तक अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे स्वतः स्फूर्त जन-नायक खुले आम राजनीति में नहीं कूंदते तब तक वे वर्गीय अंतर्विरोध में महज फूटवाल की तरह कभी कांग्रेस,कभी भाजपा,कभी माकपा,कभी सपा  जैसे राष्ट्रीय दलों और कभी क्षेत्रीय दलों की चौखट पर समर्थन की भीख मांगते नज़र आयेंगे.राजनीती को कल तक बुरा बताने वाले आज राजनीतिज्ञों के सामने सिर्फ इसलिए नहीं गिडगिडा रहे की लोकपाल पास हो जाए,बल्कि इसलिए शरणम गच्छामि हो रहे हैं कि राजसत्ता की  वर्तमान भृष्ट और शैतानी व्यवस्था  के अजगर ने इन स्वतः स्फूर्त जनांदोलनो में शामिल कतिपय बाबाओं,वकीलों,सामाजिक कार्यकर्ताओं  की वैयक्तिक कमजोरियों का कच्चा-चिठ्ठा तैयार कर रखा है.यदि ये आन्दोलन वर्तमान व्यवस्था से समझौता नहीं करेंगे तो धूमकेतु की तरह दोपहर में अस्त हो जायेंगे. उनके प्रणेता भी -जयप्रकाश नारायण,लोहिया,दीनदयाल और वी टी रणदिवे की तरह इतिहास में असफल विभूति के रूप में याद किये जायेंगे.जनता भी इन्हें भूलकर रोटी-कपडा-मकान की सनातन आकांक्षा लेकर फिर से नागनाथ्जी या सांपनाथ जी को वोट देकर  उसी भृष्ट, अपवित्र ,राजनैतिक  सिस्टम को दुलारने लगती है जिसे अन्ना या रामदेव के सामने बड़े जोश -खरोश से गरियाती हुई खीसें निपोरती रहती है.
   भृष्टाचार मुक्त देश की कामना हर देश भक्त और सभ्य समाज को है  मैं भी उसका अभिलाषी हूँ किन्तु  कालाधन देश में  वापिस आये, यह तो वैसे ही है कि मेरे घर में गंदगी आये... श्रीराम तिवारी

सोमवार, 27 जून 2011

इंसानियत की राह में धर्म के गतिरोधक.

 इंसान  ने अपनी पृकृति प्रदत्त नैसर्गिक वौद्धिक बढ़त से जब पृथ्वी पर थलचरों ,जलचरों और नभचरों पर विजय हासिल की  होगी तो उसके सामने नित नई-नई प्राकृतिक ,कबीलाई और पाशविक वृत्तियों की  चुनौतियां भी आयीं  होगी.पहिये और आग के आविष्कार से लेकर परिवार,कुटुंब,समाज,राष्ट्र और 'वसुधेव कुटुम्बकम' तक आते -आते इंसान जागतिक स्तर पर भौतिकवादी,ईश्वरवादी,अनीश्वरवादी,भोगवादी,अपरिग्राहवादी,करुनावादी और प्रुकृतिवादी बन बैठा होगा.
पुरातन पाषाण कालीन बर्बर आदिम कबीलाई समाजों ने भोगौलिक और अन्यान्य कारणों से जब आग,पानी,हवा,समुद्र,नदियाँ ,पर्वतों से हार मानी होगी तभी वह किसी अदृश्य अबूझ अलौकिक परा शक्ति के चक्कर में पड़ा होगा. इस पृष्ठभूमि पर आधारित धर्मों-दर्शनों के पास अपनी प्रकृति निष्ठता का अवदान मौजूद है.इन प्राचीन धर्म-दर्शनों में मानवीय उदात्त आदर्शों ,त्याग,बलिदान और समस्त संसार को सुखमय -निर्भय करने का अतुलनीय आह्वान किया गया है.इन प्राचीन धर्मों में 'सनातन-भारतीय-वैदिक धर्म' पारसी धर्म,और यहूदी धर्म प्रमुख है.
    कहने को भारत समेत अखिल विश्व में  दर्जनों धर्म -मजहब हैं किन्तु वे सभी अपनी -अपनी परिधि में किसी खास गुरु,पैगम्बर,या उसके संस्थापक की शिक्षाओं पर केन्द्रित रहते हुए ,निरंतर आक्रामक रहते हैं.क्योकि उन्हें  अपने धर्म मज़हब की जीवन्तता के अलावा उससे जुड़े अन्य सरोकारों की निरंतर फ़िक्र रहती है. कुछ धर्म मजहब तो पूर्ण रूपेण शस्त्र आधारित रहे हैं.कुछ ही हैं जिन्होंने अपने पूर्ववर्ती प्राचीन धर्मों की शास्त्र परम्परा की नक़ल की है.
 जो मध्य युगीन सामंती दौर के धर्म मज़हब हैं उनमें अपने  कुटुंब और समाज की रक्षा हेतु किया गए सांसारिक प्रयासों का अवदान निहित है.पहले वाले पुरातन धर्म-दर्शन खास तौर से भारतीय सनातन धर्म का ऐलान थ कि;-

    
  अयं निजः परोवेति  गणना  लघु चेतसाम !
 उदार चरितानाम तू वसुधैव कुटुम्बकम !!

प्राचीन वैदिक ऋषि कहता है:-

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया !
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु ,माँ कश्चिददुख्भागवेत !!

 भारतीय 'सनातन धर्म'जिसे कतिपय विदेशी आक्रान्ताओं और विधर्मियों ने  हिन्दू धर्म' बना दिया है
आज न केवल स्वयम अपने ही नादान अनुशरण कर्ताओं से बल्कि अपने अनुषंगी उप्धर्मों से परेशान है.दुनिया में कुछ धर्म केवल आतंक और उन्माद की शक्ल अख्त्यार कर चुके हैं वे भी भारत में आने के बाद तो और ज्यादा ही आक्रामक और कंजर्वेटिव हो गए हैं.इन सभी मध्ययुगीन व्यक्ति आधारित धर्म-मज्हवों के निरंतर प्रहारों से  दुनिया के प्राचीन धमों{हिन्दू,यहूदीइत्यादि}ने भी अतीत के आदर्शवाद,पुन्य्वाद,मानवतावाद और करुना-प्रेम के सिद्धांतों को परे धकेल दिया हैजो धर्म अपने अनुयाइयों को सुबह -सुबह प्रार्थना में सिखाता था कि "सभी सुखी हों -सभी निरोगी हों'  वह अब  तिजारत,सियासत और प्रतिहिंसा का कीर्तीमान गढ़ रहा है.

    आज धरम मजहब के नाम पर सरकारी जमीन और भोली भाली जनता को सरे आमलुटते  देखा जा सकता है. आजादी के बाद पाकिस्तान से भागकर आने वालों में धार्मिक कट्टरता का असर होना लाजिमी  था किन्तु ततकालीन नेहरु सरकार ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया कि जो लोग पाकिस्तान से विस्थापित होकर आ रहे हैं वे सरकारी जमीनों पर कब्ज़ा कर कालोनियां काट कर अरब पति बनजायेंगे.साथ ही जहां सड़क बनने की योजना थी   वहाँ मंदिर,मस्जिद,चर्च,और गुरुद्वरा बना कर जनता और देश के विकाश में निरंतर बाधाएँ खडी करेंगे.
  आज देश के हर शहर में जबकि  जमीनों के भाव आसमान पर हैं और विकाश के लिए सड़कों का चौडीकरण नितांत आवश्यक है ,ऐंसे में कुछ धर्मांध और स्वार्थी लोगों कि पूरी कोशिश रहती है कि भले सड़क का काम सालों -साल रुका रहे,लेकिन उनके पूजा स्थल[मंदिर,मस्जिद,गुरुद्वारा,चर्च}को आंच नहीं आना चाहए.आज कोई भी आकर देख ले मेरे शहर इंदौर में ये बीभत्स नज़र आज भी मौजूद है.
               इंदौर के किनारे से होकर एक राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरा है जिसे आगरा-बाम्बे रोड कहते हैं.
राज्य सरकार ,केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशाशन के संयुक्त प्रयाशों से [सभी राजनैतिक पार्टियों के सहयोग से}यह रोड बी आर टी एस योजनान्तर्गत सिक्स लेन किया जा रहा है.यह काम लगभग चार सालों से चल रहा है इस रोड के चोड़ीकरण  में अरबों रूपये खर्च हो चुके हैं.यह देवास से महू तक कुछ इस प्रकार बंना है कि शहर की दुर्दशा हो रही है.इस रीड पर जहां कहीं मंदिर थे {जैन और हिन्दू} वे तो हटा दिए गए किन्तु जहां कहीं मस्जिद और गुरुद्वारा हैं उन्हें बीच सड़क पर ज्यों
का त्यों छोड़कर सड़क कहीं बहुत चौड़ी तो कहीं इतनी सकरी बनाई गई   है कि अतिक्रमण स्पष्ट नज़र आता है. हजार मिन्नत खुशामद के बावजूद ये धर्म स्थल हट नहीं प् रहे हैं.
    क्या मंदिर ,मस्जिद,गुरुद्वारा  बीच सड़क पर होना जरुरी है?तरक्की और आम आदमी की सुविधा के लिए यदि सड़क चौड़ी हो जायेगी तो कोनसा धर्म कहता है कि नहीं हमें तो सड़क नहीं बीच सड़क पर अपने धर्म की दूकान चलाना है.
    हम तो धरम के ठेकेदार हैं,हमें बड़ा मज़ा आता है जब कलेक्टर-एसपी हमारी चिरोरी करते हैं.और हम उन्हें दुत्कार कर दंगा भड़काने की धमकी देते हैं. यही पर अमन पसंद नागरिक ,धर्मनिरपेक्ष नागरिक को नरेंद्र मोदी भाने लगता है.गुजरात में साम्प्रदायिक उन्माद को किसी ने सही नहीं नहीं माना किन्तु पूरे गुजरात में सभी धर्मस्थलों को सड़कों से हटाने में नरेंद्र मोदी जी ने जिस धर्मनिरपेक्षता का शिद्दत से पालन किया क्या शिवराजसिंह चौहान को मध्य प्रदेश और खास तौर से इंदौर में लागू करने के लिए किसी के हुक्म की दरकार है ?
           क्या धर्मस्थलों को सड़क किनारेया बीच सड़क पर  ही होना जरुरी है?धर्म मज़हब क्या हठधर्मिता का ही दूसरा नाम है?
          बच्चा बोला देखकर मस्जिद [मंदिर,गुरुद्वरा,चर्च] आलीशान!
         एक अकेले खुदा का ,इतना बड़ा  मकान!!!



    क्या बंनाने आये थे ?क्या बना बैठे? कहीं मंदिर बना बैठे ,कहीं मस्जिद बना बैठे!
    हमसे तो परिंदे अच्छे ,जो कभी मंदिर पै जा बैठे,कभी मस्जिद पै जा बैठे!!
  
          श्रीराम तिवारी

शनिवार, 25 जून 2011

प्रधानमंत्री जी को अखिल भारतीय संयुक्त अभियान समिति का पत्र.

 देश की मौजूदा आर्थिक और सामाजिक बदहाली के लिए जिम्मेदार प्रतिगामी आर्थिक नीतियों के खिलाफविगत कई महीनों से एटकऔर सीटू यूनियन  लगातार देश भर में संयुक संघर्ष  चला रहीं थी.इन संगठनो पर  दक्षिण पंथी श्रम संगठनो और मीडिया का आरोप था कि ये तो कम्युनिस्ट पार्टियों और वामपंथी विचारधारा के  अनुषंगी श्रम संगठनो का संघर्ष है. जब विगत २३ फरवरी को इन श्रम संगठनों ने सारे देश के मेहनतकशों का दिल्ली में घेरा डालने का आह्वान कियाथा, तो कांग्रेस समर्थित "इंटक" ने अपनी पार्टी और अपनी  यु पी ये सरकार की जन-विरोधी ,मजदूर विरोधी महंगाई-भृष्टाचार बढाने वाली आर्थिक नीतियों के खिलाफ इन संघर्ष शील श्रम संगठनो से एका कर पार्लियामेंट मार्च में हिस्सेदारी की थी.इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजीव जी को केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी की ओर से धमकी दी गई थी कि वामपंथ समर्थित श्रम संगठनो का साथ दिया तो इंटक अध्यक्ष पद और राज्य सभा सीट छें ली जायेगी.संजीव जी ने निर्भयता से देश के करोड़ों कामगारों का साथ दिया और ज्यादा शिद्दत से नकारात्मक आर्थित्क नीतियों से लड़ने में 'संयुक्त अभियान समिति'का साथ दे रहे हैं.
       विगत अप्रैल -मई में संगठित श्रम संगठनो को तब और बल मिला जब आर एस एस समर्थित 'भारतीय मजदूर संघ 'ने इस संयुक्त अभियान समिति में शामिल होकर देश के मजदूरों-किसानो और
हैरान -परेशान आवाम की संगठित लामबंदी में अपने सहयोग का ऐलान किया.अब भाजपा ,कांग्रेस और वामपंथ भले ही वर्तमान दौर की  जर-जर व्यवस्था पर एकजुट कार्यवाही के लिए एक जाजम पर न आ सकें किन्तु समस्त केन्द्रीय श्रम संगठन तो अपने 'कामन मिनिमम प्रोग्राम 'पर एकजुट कार्यवाही का संकल्प ले ही चुके हैं.
          विगत २३ जून-२०११ को बी एम् एस ,इंटक,एटक,सीटू,एच एम् एस ,बैंक,बीमा,बी एस एन एल ,केन्द्रीय कर्मचारी,राज्य सरकारों के कर्मचारी,सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों समेत देश भर के किसान मजदूर संगठनो की ओर से "अखिल भारतीय संयुक्त अभियान समिति"ने माननीय मनमोहनसिंह जी ,प्रधान मंत्री ,भारत सरकर ,७ रेसकोर्स रोड ,नई दिल्ली को ज्ञापन प्रस्तुत कर दिया है. ज्ञापन का मज़मून निम्नानुसार है:-
     
    माननीय प्रधान मंत्री जी ,
                                               जैसा कि आपको सुविदित है कि केन्द्रीय श्रम संगठनो द्वारा २००९ से निम्नांकित मुद्दों को लेकर  निरंतर जन-अभियान चलाया जा रहा है.इस अभियान के तहत आज २३ जून -२०११ को हम राष्ट्र व्यापी विरोध प्रदर्शन करते हुए केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों से अनुरोध करते हैं कि विश्यान्तार्गत उचित कार्यवाही करें.इन मुद्दों में विशेष कर  महंगाई के मुद्दे पर गंभीरता पूर्वक कार्यवाही कर उस पर तत्काल अंकुश लगाए जाने की जरुरत है.कोई ठोस कार्यवाही नहीं होने  की दशा में 'संयुक्त अभियान समिति' उग्र आन्दोलन करने को बाध्य होगी.जिसकी समस्त जिम्मेदारी स्थानीय प्रशाशन,प्रांतीय प्रशाशन और भारत सरकर की होगी.

१-देश में महंगाई  निरंतर बढ्ती जा रही है ,पेट्रोलियम उत्पादों में तेजी से वृद्धि की जा रही है.बढ़ती हुई महंगाई के कारण आम आदमी का जीवन यापन दुश्वार हो गया है.अतः महंगाई पर रोक लगाने के लिए अपने अधिकारों का उचित उपयोग करें.

२-देश में श्रम कानूनों का पालन ठीक से नहीं हो रहा है ,मजदूर-कर्मचारियों का बदतर शोषण हो रहा है,असंगठित क्षेत्र में न्यनतम मजदूरी का भुगतान नहीं किया जा रहा है,निवेदन है कि श्रम कानूनों का पालन सुनिश्चित करने के कदम उठायें.

३-विद्द्य्मान स्थायी किस्म के रोजगार को  तेजी से समाप्त  किया जा रहा है स्थाई किस्म के कामों को ठेका पद्धति से निष्पादित किया जा रहा है .असंगठित क्षेत्र के लिए जो भी सामाजिक सुरक्षा सम्बन्धी कानूनी प्रावधान सन २००८ में किये गए थे उनका पालन नहीं हो रहा है.मुआवजे की राशी प्राप्त करना अब कामगारों के लिए टेडी खीर बन गया है.नाममात्र का मुआवजा भी बड़े लें-देन का शिकार हो चूका है.संगठित क्षेत्र की तरह असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है.

४-सार्वजनिक उपक्रम भिलाई स्टील तथा अन्य दूसरे उपक्रम जो लाभ में चल रहे हैं उनका विनिवेश करना उचित नहीं.उनके शेयर भी निजी हाथों में बेचे जा रहे हैं ,तत्काल रोक लगाईं जाए.

५-पेंशन राशी में वृद्धि एवं कर्मचारी भविष्यनिधि की धनराशी को शेयर बाज़ार में लगाने की योजना पर अमल न किया जाए.

६-बैंकों में निजीकरण आउट सोर्सिंग की खंडेलवाल समिति की सिफारिशें रद्द करनेकी मांग को लेकर   बैंक कर्मचारी ०७-जुलाई को हड़ताल पर जा रहे हैं ,सभी केन्द्रीय श्रम संगठन और संयुक्त अभियान समिति उनका समर्थन करती है.बीमा क्षेत्र और बी एस एन एल  में तथाकर्थित सुधारों के  नाम पर की जा रहीं प्रतिगामी सिफारसों का 'संयुक्त अभ्याँ समिति 'विरोध करती है

     उपरोक्त ज्ञापन में सन्निहित मांगों और सुझावों पर अविलम्ब कार्यवाही हेतु 'अखिल भारतीय संयुक्त अभियान समिति' आपसे विनम्र अनुरोध करती है.यथाशीघ्र  सकारात्मक परिणाम नहीं मिलने की स्थिति में संयुक्त संघर्ष तेज होगा.

              अभिवादन  सहित ..........भवदीय ...................{संयुक्त अभियान समिति के सदस्य संघ}

    बी एम् एस          एटक        इंटक        सीटू         एच एम् एस

          {नोट ;-यह ज्ञापन विगत २३ जून को सारे देश में प्रदर्शनों और जुलूसों के साथ अपने -अपने जिलों में कमिश्नरों के माध्यम से प्रधानमंत्री जी  की ओर अग्रेषित किया गया}
              श्रीराम तिवारी

शुक्रवार, 24 जून 2011

.भृष्टाचार विरोध के बहाने जनतंत्र पर हमला ..बहुत नाइंसाफी है.

नवउदारवादी,बाजारीकरण की आधुनिकतम व्यवस्था में मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों का प्रवाह अवरुद्ध सा होता जा रहा है.
एक ओर आमरण अनशन की धमकियों का कोलाज़ व्यक्ति विशेष की मर्जी को पोषित नहीं किये जाने पर बदनुमा दाग बनता जा रहाहै,दूसरी ओर सम्पदा के विन्ध्याचल मेहनतकश जनता के सूर्य का रास्ता रोकने पर अडिग हैं.गरीब बच्चों के एडमीशन नहीं हो रहे 
,कालेजोंस्कूलों में या तो जगह नहींया पहुँच वालों ,पैसे वालों  ने  अपनीअपनी जुगाड़ जमा ली है.महंगी किताबें,आसमान छूती फीस और कोचिंग की मारामारी में अब प्रतिस्पर्धा सिर्फ उच्च मद्ध्य्म वर्ग 
तक सिमिट गई है.पेट्रोल,डीजल,केरोसिन और रसोई गैस में हो रही मूल्यवृद्धि  हर महीने  अपने कीर्तिमान पर पहुँच रही है.अब विदेशी काले धन ,भृष्टाचार और लोकपाल के लिए अनशन की नौटंकी करने वाले चुप हैं.
                      वेशक भृष्टाचार ने पूरे देश को निगल लिया है किन्तु उसके खिलाफ संघर्ष करने का माद्दा किसी व्यक्ति विशेष या संविधानेतर सत्ता केंद्र में नहीं हो सकता.हजारे और रामदेव के दिखावटी दांतों में दम नहीं कि उसकी चूल भी हिला सकें.वेशक एक जनतांत्रिक समाज में सभी को ये हक़ है किदेशकेहितअनहितकोअपनेअपने ढंग से अभिव्यक्त करे.अन्ना,रामदेवया अन्य समकालिक स्वयम भू अवतारी{नेता नहीं?}पुरुषों कोभी अपनी राय रखने का अधिकारहै.किन्तुकिसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह संभव नहीं कि एकव्यक्तिया समूह कीरायको सवा अरब लोगों पर जबरन थोप दी जाए.किसी गैर राजनीतिक वफादारी या किसी खास राजनीतिक पार्टी के अजेंडे को आगे बढ़ानेके लिए जन-लामबंदी गैर बाजिब है.यदि कोई व्यक्ति 
जिसे धार्मिक ,आध्यत्मिक या योग विद्द्या से लाखों लोगों की वफादारी हासिल है तो वह इस वफादारी का इस्तेमाल निहित स्वार्थियों की राजनैतिक आकांक्षा पूर्ती का साधन नहीं बना सकता.
यदि अपने अराजनैतिक कृत्य से आकर्षित जन-समूह को वह किसी अन्य खास और गुप्त राजनैतिक अजेंडे के प्र्योनार्थ  इस्तेमाल करने की चेष्टा करेगा तो सिवाय पूंजीवादी अमानवीय भृष्ट व्यवस्था के साक्षात्कार के उसकी नज़रों में बाकी सब शून्य होता चला जायेगा.
     एक धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक व्यवस्था के भीतर शासक वर्ग को भी यह अख्तियार नहीं की किसी खास बाबा या स्वयम्भू नेता की जिद पूर्ती करे.यदि कोई दल या सरकार किसी खास धरम मज़हब या गुट की धमकियों के आगे झुकती है या राजनैतिक छुद्र लाभ के लिए नकारात्मक नीतिगत समझौता करती है तो  यह भी निखालिस तुष्टीकरण नहीं तो और क्या है?
     हमारा निरंतर ये प्रयास रहना चाहिए कि भृष्टाचार,कालेधन और अन्य किसी भी मूवमेंट के नाम पर ठगी न हो.वास्तविक संघर्ष की पहचान तो तभी सम्भव है जब पूंजीवादी मूल्योंकि ,महंगाई की,वेरोजगारी की ,धार्मिक संस्थानों में अवैध धन की और परलोक सुधरने के नाम पर खुद का यह लोक सुधारने वालों की भी इन अनशनों ,धरनों और धमकियों में जिक्र हो.
        
              श्रीराम तिवारी

गुरुवार, 23 जून 2011

ज़न-लोकपाल मसौदे पर जनता की राय भी ली जानी चाहिए..

अप्रैल के प्रथम सप्ताह में अन्ना और उनके साथियों द्वारा किये गए जन्तर-मंतर पर धरना और तत विषयक जन-लोकपाल विधेयक पर मेने 'मात्र-जन-लोकपाल विधेयक से भृष्टाचार ख़त्म नहीं हो सकता' शीर्षक से आलेख लिखा था जो प्रवक्ता. कॉम ,हस्तक्षेप.कॉम,जनवादी.ब्लागस्पाट.कॉम पर अभी भी उपलब्ध है.तब से लेकर अब तक विगत दो महीनो में जो कुछ भी भारत में तत विषयक घटनाक्रम घटित हुए उनका परिणाम कुल मिलकर देश के हित में और भृष्ट ताकतों के खिलाफ परिलक्षित होता हुआ लगता है.इस सम्बन्ध में यह नितांत जरुरी है कि जो लोग किसी खास व्यक्ति ,खास राजनैतिक दल और किसी खास खेमे से विलग केवल राष्ट्र के हितों को सर्वोपरि
मानते हैं उन्हें विना किसी भय-पक्षपात ,निंदा-स्तुति और प्रत्यक्ष व परोक्ष स्वार्थ के वगैर इस वर्तमान दौर के जनांदोलन  -जो देश के संगठित मजदूर वर्ग के द्वारा बहुत सालों से उठाया जाता
रहा है और अब अन्ना हजारे,बाबा रामदेव तथा कुछ-कुछ सत्तापक्ष-विपक्ष की कतारों में भी उसकी अनुगूंज सुनाई दे रही है -को अपनी मेधा शक्ति से परिष्कृत करना चाहिए.केवल नित नए हीरो गढ़ना या किसी खास व्यक्ति या दल की चापलूसी करना उनका काम है जो देश को दिशा देने का दावा नहीं करते किन्तु जिन्हें लोकतंत्रात्मक गणराज्य ,संविधान,कार्यपालिका,न्याय पालिका,व्यवस्थापिका और राष्ट्र की सांस्कृतिक,धार्मिक ,भाषिक,वेशज और क्षेत्रीय विविधता का ज्ञान है;वे और जिन्हें दुनिया के नक़्शे पर वास्तविक भारत की तस्वीर का भान है वे इस दौर में अपने गाम्भीर्य अन्वेषण से इतिहास के परिप्रेक्ष्य में 'जन-लोकपाल'या किसी वैयक्तिक धरना-अनशन को सुव्य्विस्थित रूप और आकार प्रदान कराने में अपनी एतिहासिक भूमिका अदा करें.

  यह सर्वविदित है कि 'लोकपाल विधेयक मसौदा संयुक्त समिति' की अभी तक सम्पन्न नौ अनौपचारिक मीटिंगों  के परिणाम स्वरूप सिविल सोसायटी और सरकार के बीच द्वंदात्मकता की स्थिति बनती जा रही है.एक ओर माननीय 'ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स' की अनुशंषाओं पर सत्तापक्ष का कहना है कि सिविल सोसायटी और केंद्र सरकार "असहमति के लिए सहमत" हो गई है.दूसरी ओर किसन वापट बाबूराव हजारे {अन्नाजी]  के नेत्रत्व में 'सिविल सोसायटी'के आरोप हैं कि सरकार हमारे तमाम सुंझावों से इतर अपना अलग एक सरकारी  मसौदा पेश कर भृष्टाचार के खिलाफ
    गाँधी दर्शन में  किसी शासक या अधिनायकवादी निजाम को झुकाने का अंतिम अस्त्र "अनशन"ही है.आप इस अस्त्र का इस्तेमाल रोज-रोज नहीं कर सकते.यदि अन्ना और उनकी टीम मानती है कि उनकी ८०%मांगेंमान ली गईं हैं. अर्थात लोकपाल विधेयक के अधिकांश हिस्से के  वांछित प्रारूप को सिविल सोसायटी के अनुरूप ड्राफ्टिंग किया जा रहा है तो प्रश्न क्यों नहीं उठेगा कि बार-बार अनशन की धौंस {खास तौर से १६ अगस्त से} क्यों दी जा रही है?क्या यह वैयक्तिक तानाशाही या ब्लेक मैलिंग नहीं है?माना कि अन्ना और उनके साथियों के सौभाग्य से केंद्र में एक निहायत ही अपराधबोध पीड़ित शाशन तंत्र है और सत्तापक्ष में अन्ना जैसों को सहज सम्मान प्राप्त है ,किन्तु जब सरकार ने उनके पहले वाले अनशन को सम्मान दिया ,उनकी बातें मानी और अब तो लोकपाल बिल भी लगभग अवतरित होने को ही है ,तो यदि अब अन्नाजी कहें कि  सरकर{पूरे देश की वैधानिक प्रतिनिधि}मेरी सब शर्तों को माने ;वर्ना में अनशन पर बैठ जाऊँगा ,क्या यह देश की जनता का अपमान नहीं?सरकार ने कहा है कि सभी दलों से राय लेकर आपकी असहमतियों पर उचित कार्यवाही करेंगे.मैं {श्रीराम तिवारी} कहता हूँ कि सिर्फ राजनैतिक दलों से ही क्यों?पूरे देश से पूंछा जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री ,चीफ जस्टिस आफ इंडिया और सांसदों को लोकपाल के दायरे में आना चाहिए कि नहीं?मैं नहीं कहता कि ये सब पवित्रतम हैं या पाप पंक से परे हैं ;किन्तु मैं इतना तो जानता हूँ कि देश के वर्तमान संविधान के अनुसार संसद ही सर्वोच्च है.क्या संसद से ऊँचा लोकपाल हो सकता है?संसद देश की जनता चुना करती है अतेव वह देश की जनता के प्रति जबाबदेह है .लोकपाल ,चुनाव कमीशन ,सुप्रीम कोर्ट और लेखा एवं महानियंत्रक समेत जितने भी स्वायत  शाशन प्रतिष्ठान हैं वे संसद के प्रति और प्रकारांतर से देश की जनता के प्रति उत्तरदायी है.
   भृष्टाचार मिटाने के लिए सबको मिलकर उपाय करना चाहिए ,देश भृष्टाचार में आकंठ डूबा है,हम अपने-अपने तई लड़ भी रहे हैं लेकिन "भारत में भृष्टाचार पाकिस्तान से भी बड़ा खतरा है"कहकर अन्नाजी न केवल भारत की प्रतिष्ठा धूमिल कर रहें हैं बल्कि पाकिस्तान की जनता को भी उकसाने का  काम कर रहे हैं.
       जब सिविल सोसायटी की ८०%शर्तें और सुझाव मान्य कर लिएगए हैं तो बाकी २०%के लिए देश की जनता को अपना पक्ष रखने का हक़ है या नहीं?अभी तक भारतीय संविधान में यही वर्णित है कि जनता का प्रतिनिधित्व लोक सभा करेगी .क्या अन्नाजी  या सिविल सोसायटी लोक सभा से भी बड़े हैं?यदि वर्तमान सरकार कि सदाशयता को जरुरत से ज्यादा परखोगे तो अन्नाजी १६ अगस्त को आप अनशन नहीं कर पायेंगे.सिर्फ सरकार ही क्यों जनता भी आपसे जानना चाहेगी कि आप एक ही मामले में इतनी जल्दी और बार-बार 'अनशन'नामक गांधीवादी ब्रह्मास्त्र का इस्तमाल क्यों कर रहे हैं?क्या भृष्टाचार सिर्फ २-५ साल में ही बढ़ा है?क्या भारतीय संविधान ने देश को आगे  नहीं बढाया?क्या यह भारतीय  संविधान की महानता नहीं है कि आप एक मामूली से एन जी ओ संचालक आज इस देश की  सम्प्र्भुत्व सरकार को आँखें दिखा रहे हैं ,न केवल आँखें दिखा रहे हैं बल्कि ऐसे शो कर रहे हैं की आप ही एकमात्र गांधीवादी हैं .एक ही मामले को लेकर बार-बार अनशन उसके प्रभाव को भी भोंथरा बना देता है.गाँधी जी ने अकेले अनशन या सत्याग्रह से ब्रिटिश साम्राज्यवाद का मुकबला नहीं किया था.उन्होंने बमुश्किल दो या तीन बार ही इसका प्रयोग किया था .तभी जब सारे वैधानिक और लोकतान्त्रिक रास्ते बंद मिले.सारी दुनिया जानती है कि लाखों मजदूरों-किसानो ने ,मुबई नेवी की हड़ताल ने,युवा क्रांतिकारियों की शहादत ने देश को आजादी दिलाई थी .फिर भी देशकी जनता ने अपने परप्रिय अहिंसावादी 'अनशन'सिध्धांत को सबसे ज्यादा सम्मान दिया.अन्नाजी गांधीवादी हैं तो इसका मतलब ये तो नहीं कि मनमोहनसिंह जी ब्रिटिश वायसराय है या सोनिया गाँधी कोई महारानी एलिजावेथ हैं जो अधिनायकवादी तौर तरीके से भारत पर काबिज थे.यह देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है क्योकि यहाँ दुनिया का अब तक का श्रेष्ठतम संविधान है यदि उसे बदलने की बात हो रही हो तो देश की जनता से भी पूंछा जाना चाहिए .यदि कपिल सिब्बल ,वीरप्पा मोइली ,सलमान खुर्शीद या प्रणव मुखर्जी यह जानते हैं तो ये तो उनकी काबिलियत में गिना जाना चाहिए और यदि अन्ना या उनके सलाहकार भले ही वे बड़े-बड़े वकील -वैरिस्टर हों यदि वे देश की जनता को इग्नोर करते हैं  तो भृष्टाचार का कोई भी बाल बांका नहीं कर सकेगा.
   देश जिन्दा है क्योंकि अभी भी अधिकांश लोग ईमानदार हैं.सभी राजनैतिक दलों में यदि बदमाश और भृष्ट भरे पड़े हैं किन्तु मुठ्ठी भर ईमानदार भी हैं जिन्हें अन्ना और रामदेव से ज्यादा फ़िक्र है.किस मंत्री ने इतना कमाया जितना रामदेव.आशाराम,या प्रशांति निलियम वाले चमत्कारी बाबा के गुप्त तहखानो से निकल रहा है?क्या लोकपाल में यह तथ्य शामिल किया गया है कि जितने भी धार्मिक स्थल हैं  {सभी धर्मों के }उनकी जांच लोकपाल करेगा.?संपदा के राष्ट्रीयकरण की कोई मांग सिविल सोसायटी ने उठाई है?
क्या जिन लोगों ने सरकारी नोकरियों की तिकड़मों से   देश की उपजाऊ जमीन के बड़े -बड़े कृषि फार्मों व्यापारिक प्रतिष्ठानों और शेयर बाज़ार में बेनामी संपदा जमा कर रखी है उन पर कोई अंकुश इस लोकपाल बिल ने तजबीज किया है?
       इन सभी तथ्यों को नज़र अंदाज़ क्यों किया जा रहा है?क्या अन्ना और सिविल सोसायटी के स्वनामधन्य साथी-केजरीवाल ,शशिभूषण और जस्टिस संतोष हेगड़े बता पायेगे कि वे जो -जो मांगें सरकार के समक्ष रख रहे हैं उनकी पात्रता इनको है?यदि मान भी लें की अन्ना और सिविल सोसायटी  को ये सब मांगें रखने और मनवाने के लिए अनशन का अधिकार है तब प्रश्न  ये उठता है कि सरकार और 'जी ओ एम् 'को उनकी हर बात -हर मांग मान कर पूरा करने या कराने का अधिकार है?मैं कहता हूँ कि सरकार को इस तरह का कोई जनादेश नहीं दिया गया कि आप संविधान में आमूल चूल परिवर्तन कर डालें.
   वेशक मजबूत लोकपाल विधेयक की दरकार इस देश को है.इस दिशा में जिन व्यक्तियों या संस्थाओं ने संघर्ष किये वे स्तुत्य हैं 'असहमति के लिए सहमत हो जाना 'भी देश में एक बड़ी उपलब्धी है.लोकपाल विधेयक मसौदा तैयार करने के लिए सिविल सोसायटी,सरकार दोनों ही अलग-अलग या एक साथ ड्राफ्टिंग करने के लिए आज़ाद हैं किन्तु न केवल संसद बल्कि देश की जनता
 के अनुमोदन बिना इसको संवैधानिक दर्जा दे पाना नामुमकिन है .सरकार ने अब तक जो भी फैसले लिए हैं उसमें न केवल उसका सहयोग अन्ना  जी को मिला है बल्कि भृष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में भी यूपीए सरकार की  सदिक्षा प्रतिध्वनित हो रही है संविधान की रक्षा करना भी सरकार का ही दायित्व है और वर्तमान सरकार काफी हद तक इस बाबत सजग है.सर्वदलीय बैठक और उसके उपरान्त संसद के मानसून सत्र में 'लोकपाल विधेयक' पेश किये जाने की सरकार की मन्सा
पर संदेह करना उचित नहीं.अनशन की धमकी तो बिलकुल भी उचित नहीं .यह तो प्रकारांतर से अनशन और लोकशाही कि अवमानना है.आशा है अन्नाजी सब्र से काम लेंगे और देश की जनता को भी साथ लेकर चलेंगे.
                          
               श्रीराम तिवारी