शनिवार, 6 मई 2023

लगातार आलोचना करने अविश्वसनीय होते हैं! !:

 अपराधियों के अवैध अतिक्रमण पर जब बुल्डोजर चलता है तो बदमाश संविधान की दुहाई देने लग जाते हैं,किंतु जब हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट किसी धर्मस्थल में जांच पड़ताल का आदेश पारित करे तो संविधान की दुहाई देने वाले संविधान को ही भूल जाते हैं!

हमारे कुछ मित्र आतंकियों,षड्यंत्रकारियों, पत्थरबाजों के कुकर्मों पर अक्सर कुछ नहीं कहते,वे रात दिन केवल योगी मोदी राग बजाए जा रहे हैं! उनकी आलोचना के केंद्र में, राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल तत्व बेगुनाह हैं और जो भारत विरोधी बदमाश हैं, उन्हें वे प्रगतिशील और बुद्धिजीवी दिखाई दे रहे हैं! *विनाश काले विपरीत बुद्धि*
जिस तरह लगातार एंटीबायोटिक्स लेते रहने से समय आने पर उस दवा का असर खत्म हो जाता है,लगातार दवा लेने वाले की रोग प्रतिरोधक क्षमता खत्म होती जाती है! उसी तरह किसी व्यक्ति विशेष या विचारधारा के अंध विरोधियों द्वारा लगातार विरोध करते रहने से एक दिन विरोध का का असर शून्य हो सकता है!
अत: आलोचना करते समय बहुत सावधानी की जरूरत है,अन्यथा वक्त आने पर आम जन- साधारण बुद्धि के लोग भी आलोचकों से ऊबकर निरंकुश शासन का विरोध करने के बजाय आपसे ही नफरत करने लग जाएंगे! इस तरह जिसकी आलोचना की जाती रही, उसका बाल भी बांका नही होगा बल्किजाएं आलोचना करनेवाले ही अविश्वसनीय होते चले गे!:-

त्रिया चरित्र

 एक प्यासा आदमी एक कुएं के पास गया, जहां एक जवान #औरत पानी भर रही थी। उस आदमी ने औरत से थोड़ा पानी पिलाने के लिए कहा। खुशी से उस औरत ने उसे पानी पिलाया। पानी पीने के बाद उस आदमी ने औरत से पूछा कि आप मुझे औरतों की त्रिया चरित्र के बारे में कुछ बता सकती है?

इतना कहने पर वह औरत जोर जोर से चिल्लाने लगी बचाओ, बचाओ। उसकी आवाज सुनकर गांव के लोग कुए की तरफ दौड़ने लगे तो उस आदमी ने कहा कि आप ऐसा क्यों कर रही है तो उस औरत ने कहा ताकि गांव वाले आए और आपको खूब पीटें और इतना पीटे की आपके होश ठिकाने लग जाए।
यह बात सुनकर उस आदमी ने कहा मुझे माफ करें, मैं तो आपको एक भली और इज्ज़तदार औरत समझ रहा था। तभी उस औरत ने कुएं के पास रखा मटके का सारा पानी अपने शरीर पर डाल लिया और अपने शरीर को पूरी तरह भींगा डाला। इतने देर में गांव वाले भी कुएं के पास पहुंच गए। गांव वालों ने उस औरत से पूछा कि क्या हुआ?
औरत ने कहा मैं कुएं में गिर गई थी इस भले आदमी ने मुझको बचा लिया। यदि यह आदमी यहां नही रहता तो आज मेरी जान चली जाती।
गांव वालों ने उस आदमी की बहुत तारीफ की और उसको कंधों पर उठा लिया। उसका खूब आदर सत्कार किया और उसको इनाम भी दिया। जब गांव वाले चले गए तो औरत ने उस आदमी से कहा कि अब समझ में आया औरतों का #त्रिया #चरित्र?
अगर आप औरत को दुःख देंगे और उसे परेशान करेंगे तो वह आपका सब सुख-चैन छीन लेगी और अगर आप उसे खुश रखेंगे तो वह आपको मौत के मुंह से भी निकाल लेगी।।।।

*कभी ख़ामोशियों को खामोशी से सुनो*

 प्रेम की धारा बहती है जिस दिल में,*

*चर्चा उसकी होती है हर महफ़िल में.*
*कुछ ख्वाहिशों का,*
*अधूरा रहना ही ठीक है*
*जिन्दगी जीने की चाहत तो बनी रहती है*
*ज़िंदगी ऐसी पाठशाला है जहाँ,,,,*
*क्लास बदलती रहती है*
*परन्तु विषय नही बदलते*
*कौन कहता है,,,*
*ख़ामोशियाँ' ख़ामोश होती हैं*
*कभी ख़ामोशियों को खामोशी से सुनो*
*ख़ामोशियाँ वो कह देती हैं,*
*जिनकी लफ़्जों को तलाश होती है*
*हम जहाँ प्रार्थना करते है,*
*केवल वहीं ईश्वर नही होता...!*
*ईश्वर वहाँ भी होता है,*
*जहाँ हम गुनाह करते है...!!*

पादरी मौलवी और पंडित

 मुझे मेरी रात की नींद के दौरान मेरे 8 घंटे के दैनिक स्वभाविक स्वतंत्र उपवास को साझा करने की अनुमति दें। यह फास्ट नाश्ते Breakfast से रोज टूट जाता है।

ऐसा क्यों है कि तमाम विकसित देशों में फास्ट रखने वाले अपने शरीर के कर्मकांड की आवाज पहले सुनते हैं,ना कि 1% पादरी मौलवी और पंडित के हिसाब,समय और खान-पान का फतवा मानते हैं ?
भोजन और पानी ही एकमात्र ऊर्जा पैकेट सेवन है जिसे एक सामान्य वयस्क Adult की रक्त शिराओं में 60,000 किमी तक पहुंचाना होता है।
अपने शरीर की आवाज या एक्सपर्ट डाइटिशियन की सलाह न सुन कर बाहरी आवाज पर "भूख हड़ताल" करना या उपवास करना कौन सी बहादुरी बुद्धिमानी है ? क्या यही मॉर्डन ट्रेन्ड है ? 👏

हे भगवन! मेरा पुत्र आपसे जो भी माँगे, उसे दे देना

 एक बार एक पिता और उसका पुत्र जलमार्ग से कहीं यात्रा कर रहे थे और तभी अचानक दोनों रास्ता भटक गये। फिर उनकी नौका भी उन्हें ऐसी जगह ले गई, जहाँ दो टापू आस-पास थे और फिर वहाँ पहुंच कर उनकी नौका टूट गई।

पिता ने पुत्र से कहा, "अब लगता है, हम दोनों का अंतिम समय आ गया है, दूर-दूर तक कोई सहारा नहीं दिख रहा है।"
अचानक पिता को एक उपाय सूझा, अपने पुत्र से कहा कि "वैसे भी हमारा अंतिम समय नज़दीक है, तो क्यों न हम ईश्वर की प्रार्थना करें।"
उन्होने दोनों टापू आपस में बाँट लिए।
एक पर पिता और एक पर पुत्र, और दोनों अलग-अलग टापू पर ईश्वर की प्रार्थना करने लगे।
पुत्र ने ईश्वर से कहा, 'हे भगवन, इस टापू पर पेड़-पौधे उग जाए जिसके फल-फूल से हम अपनी भूख मिटा सकें।'
ईश्वर ने प्रार्थना सुनी गयी, तत्काल पेड़-पौधे उग गये और उसमें फल-फूल भी आ गये। उसने कहा ये तो चमत्कार हो गया।
फिर उसने प्रार्थना की, एक सुंदर स्त्री आ जाए जिससे हम यहाँ उसके साथ रहकर अपना परिवार बसाएँ।
तत्काल एक सुंदर स्त्री प्रकट हो गयी।
अब उसने सोचा कि मेरी हर प्रार्थना सुनी जा रही है, तो क्यों न मैं ईश्वर से यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता माँगे लूँ ?
उसने ऐसा ही किया।
उसने प्रार्थना की, एक नई नाव आ जाए जिसमें सवार होकर मैं यहाँ से बाहर निकल सकूँ।
तत्काल नाव प्रकट हुई और पुत्र उसमें सवार होकर बाहर निकलने लगा।
तभी एक आकाशवाणी हुई, बेटा तुम अकेले जा रहे हो? अपने पिता को साथ नहीं लोगे ?
पुत्र ने कहा, उनको छोड़ो, प्रार्थना तो उन्होंने भी की, लेकिन आपने उनकी एक भी नहीं सुनी। शायद उनका मन पवित्र नहीं है, तो उन्हें इसका फल भोगने दो ना ?
आकाशवाणी ने कहा, 'क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे पिता ने क्या प्रार्थना की ?
पुत्र बोला, नहीं।
आकाशवाणी बोली तो सुनो, 'तुम्हारे पिता ने एक ही प्रार्थना की..." हे भगवन! मेरा पुत्र आपसे जो भी माँगे, उसे दे देना क्योंकि मैं उसे दुःख में हरगिज़ नहीं देख सकता औऱ अगर मरने की बारी आए तो मेरी मौत पहले हो " और जो कुछ तुम्हें मिल रहा है उन्हीं की प्रार्थना का परिणाम है।'
पुत्र बहुत शर्मिंदा हो गया।
हमें जो भी सुख, प्रसिद्धि, मान, यश, धन, संपत्ति और सुविधाएं मिल रही है उसके पीछे किसी अपने की प्रार्थना और शक्ति जरूर होती है लेकिन हम नादान रहकर अपने अभिमान वश इस सबको अपनी उपलब्धि मानने की भूल करते रहते हैं और जब ज्ञान होता है तो असलियत का पता लगने पर सिर्फ़ पछताना पड़ता है।हम चाह कर भी अपने माता पिता का ऋण नहीं चुका सकते......
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क्या इस धरती पर आपसे भी अमीर कोई है ?

 दुनिया के सबसे धनवान व्यक्ति बिल गेट्स से किसी ने पूछा - 'क्या इस धरती पर आपसे भी अमीर कोई है ? बिल गेट्स ने जवाब दिया - हां, एक व्यक्ति इस दुनिया में मुझसे भी अमीर है। कौन -!!!!! बिल गेट्स ने बताया: एक समय मे जब मेरी प्रसिद्धि और अमीरी के दिन नहीं थे

मैं न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर था.. वहां सुबह सुबह अखबार देख कर, मैंने एक अखबार खरीदना चाहा,पर मेरे पास खुदरा पैसे नहीं थे.. सो, मैंने अखबार लेने का विचार त्याग कर उसे वापस रख दिया.. अखबार बेचने वाले लड़के ने मुझे देखा, तो मैंने खुदरा पैसे/सिक्के न होने की बात कही.. लड़के ने अखबार देते हुए कहा - यह मैं आपको मुफ्त में देता हूँ
बात आई-गई हो गई.. कोई तीन माह बाद संयोगवश उसी एयरपोर्ट पर मैं फिर उतरा और अखबार के लिए फिर मेरे पास सिक्के नहीं थे।उस लड़के ने मुझे फिर से अखबार दिया, तो मैंने मना कर दिया। मैं ये नहीं ले सकता.. उस लड़के ने कहा, आप इसे ले सकते हैं, मैं इसे अपने प्रॉफिट के हिस्से से दे रहा हूँ
मुझे नुकसान नहीं होगा। मैंने अखबार ले लिया...... 19 साल बाद अपने प्रसिद्ध हो जाने के बाद एक दिन मुझे उस लड़के की याद आयी और कोई डेढ़ महीने खोजने के बाद आखिरकार वह मिल गया।
मैंने पूछा - क्या तुम मुझे पहचानते हो ? लड़का - हां, आप मि. बिल गेट्स हैं. गेट्स - तुम्हे याद है, कभी तुमने मुझे फ्री में अखबार दिए थे ? लड़का - जी हां, बिल्कुल.. ऐसा दो बार हुआ था.. गेट्स- मैं तुम्हारे उस किये हुए की कीमत अदा करना चाहता हूँ
तुम अपनी जिंदगी में जो कुछ चाहते हो, बताओ, मैं तुम्हारी हर जरूरत पूरी करूंगा.. लड़का - सर, लेकिन क्या आप को नहीं लगता कि, ऐसा कर के आप मेरे काम की कीमत अदा नहीं कर पाएंगे
गेट्स - क्यूं ..!!! लड़का - मैंने जब आपकी मदद की थी, मैं एक गरीब लड़का था, जो अखबार बेचता था.. आप मेरी मदद तब कर रहे हैं, जब आप इस दुनिया के सबसे अमीर और सामर्थ्य वाले व्यक्ति हैं
फिर, आप मेरी मदद की बराबरी कैसे करेंगे...!!! बिल गेट्स की नजर में, वह व्यक्ति दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति से भी अमीर था, क्योंकि--- "किसी की मदद करने के लिए, उसने अमीर होने का इंतजार नहीं किया था "
अमीरी पैसे से नहीं दिल से होती है दोस्तों किसी की मदद करने के लिए अमीर दिल का होना भी बहुत जरूरी है

विश्व का सर्वश्रेष्ठ दर्शन सदा प्रासंगिक:-

तमाम अनर्गल और अतार्किक आलोचनाओं के बावजूद यह मार्क्सवाद की प्रामाणिकता साबित होने का-अब तक का-सर्वश्रेष्ठ कालखण्ड है । प्रासंगिकता नाम की कोई चीज होती है तो इससे अधिक प्रासंगिक मार्क्स कभी नहीं रहे : न अपने जीवन काल में, न दूसरे विश्वयुध्द के बाद के समाजवादी व्यवस्था की मजबूती के समय में ।

इसी संदर्भ में,पहले सुनाई जा चुकी एक कहानी एक बार फिर;
अर्थशास्त्र के नोबल पुरुस्कार विजेता स्टिग्लिट्ज़ अमरीका के दो-दो राष्ट्रपतियों के आर्थिक सलाहकार रहे और नवउदार आर्थिक दर्शन के ब्रह्मा माने जाते हैं । जबकि तब 90 पार कर चुके एरिक होब्सवाम दुनिया के उस वक़्त जीवित इतिहासकारों में सबसे बड़े नाम और इतने पक्के मार्क्सवादी थे कि नियम से अपनी पार्टी सदस्यता का नवीनीकरण कराया करते थे।
●एक समारोह में बुद्धिजीवी जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ अपने हाथ में जाम लिए अचानक से दूसरे महान विद्वान एरिक होब्सवाम के सामने आ खड़े हुये ।
इन दोनों को आमने सामने देखकर उस समारोह में आये सभी का ध्यान इन दोनों पर केंद्रित हो गया ।
● स्टिग्लिट्ज़ बोले: यार ये तुम्हारा बड़बब्बा (ग्रैंड ओल्ड मैन) कितना दूरदर्शी था । उसने सवा सौ साल से भी पहले ही बता दिया था कि हम लोग क्या क्या पाप करेंगे !! कैसी कैसी बीमारियां फैलाएंगे ।
होब्सवाम ने पूछा : कौन ? मार्क्स ।
स्टिग्लिट्ज़ : हाँ, अभी फिर से पूंजी (दास कैपिटल) पढ़ी । क्या सचित्र नक्शा खींचा है मार्क्स ने, लगता है जैसे हमारी कारगुजारियां देख कर लिख रहा है ।
होब्सवाम : क्या बात है जोसेफ़, आज मार्क्स की तारीफ़ कर रहे हो !! ज्यादा चढ़ गयी है क्या !!
स्टिग्लिट्ज़ : अरे अभी तो चखी तक नहीं है । देखो वैसे का वैसा ही है जाम । मार्क्स ने सचमुच में अभिभूत कर दिया । यहाँ, तुम सबसे बड़े दिखे तो लगा कि कह दूं ।
● दुआ सलाम और खैरियते पूछने की रस्म के बाद जोसेफ स्टिगलिट्ज़ अपनी प्रशंसक और सजातीय बिरादरी की तरफ बढे ।
● थोड़ा चले थे कि जाते जाते अचानक फिर लौटे और बोले : सुनो एरिक, अगर बीमारी वही हैं जो कार्ल मार्क्स ने बताई थीं तो दवा भी वही लगेगी जो वो बता कर गया ।
● हाल के दौर में हूबहू वही घटा है, घट रहा है जिसे 169 साल पहले *कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो* में और 150 साल पहले *पूँजी* में लिख गए हैं कार्ल मार्क्स।

प्रभु बिनती सुनह हमारी!!

 कान्हा गोबर्धन गिरधारी।

प्रभु बिनती सुनो हमारी।।
साले मुठ्ठी भर आतंकियों ने,
मानवताकी ऐंसी तैंसी कर डारी।।
भगत राम कृष्ण के ज्यादा मरते
धर्मनिरपेक्षता की लीला न्यारी।
हे यदुनंदन आ जाओ धरा पर,
देखलो हो रही किरकिरी तुम्हारी।।
तेरे ही वंशज गाली देते तुझको,
चुनावी राजनीति की बलिहारी।
कान्हा गोबर्धन गिरधारी,
प्रभु बिनती सुनह हमारी!!
सबके स्वार्थ लोभ लालच पर,
होवे मानवता ही भारी
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मंदिर मस्जिद वोट दिलाते,

 मंदिर-मस्जिद वोट दिलाते,

किंतु जीत दिलाती मधुशाला।
राज्य सरकार को खूब भा रही ,
धन बरसाती ये मधुशाला !!
उस जातिवाद की ऐसी तैसी,
जिसने लोकतंत्र को धो डाला !
किंतु वामन ठाकुर वैश्य शूद्र का
भेद मिटाती ये मधुशाला ।।
यदि नशा मुक्त हो जाए मुल्क,
तो चल न सकेगी मधुशाला।
न धंधा चलता बदमाशों का,
न नोट छापती मधुशाला।।
कंट्रोलों पर राशन गायब है,
किंतु खुली मिलेगी मधुशाला।
भाड़ में जाए जनता बेचारी,
केवल मस्त रहे पीने वाला।।
कोई आपत्ति न जतलाओ,
खुली रहने दो ये मधुशाला।
यदि होश में रहे लोग तो
चमकेंगे त्रिशूल और भाला।।
बड़े बड़ों का अनुभव कहता,
निर्धन न जा पाए मधुशाला।
यदि मजदूर शराबी हो जाए,
तो कैसे भरेगा उदर ज्वाला।।
दुनिया है बर्बाद तो क्या गम,
बस इन्हें चाहिए मधुशाला।
घर परिवार मिटा के छोडेंगे,
ना बचा पाएगा ऊपरवाला।।
मंदिर मस्जिद वोट दिलाते,
किंतु जीत दिलाती मधुशाला।
राज्य सरकार को खूब भा रही,
धन बरसाती ये मधुशाला।।

द स्टार फिश एंड स्पाइडर

 एक पुस्तक का नाम है - " द स्टार फिश एंड स्पाइडर " । यह पुस्तक ओरी ब्रेफमेन तथा रॉड बेकस्ट्राम द्वारा लिखी गई है । इसमें समाज की पावर - स्ट्रक्चर ( शक्ति - संरचना ) कैसी होती है ? यह बताया गया है।

इसमें तुलना की गई है स्पाइडर याने मकड़ी तथा स्टारफिश नामक मछली की । मकड़ी में उसकी सारी जीवनी - शक्ति उसके छोटे से सिर में केंद्रित रहती है । एक बार सिर नष्ट हुआ तो मकड़ी मर जाती है । स्टारफिश में जीवनी - शक्ति एक जगह केंद्रित न होकर सारे शरीर में अनेक केंद्रों में बिखरी रहती है । इसीलिए ऐसा कोई एक स्थान नहीं है , जिसे नष्ट करने से स्टारफिश तुरंत मर जाए ।
16 वीं सदी का दौर " सी एक्सपीडिशन " ( समुद्री अभियान ) के नाम से जाना जाता है । यूरोप व स्पेन से अनेक लोग सेना लेकर अन्य क्षेत्रों को लूटने के लिए जहाज से निकले थे । 1529 में स्पेनिश सेना की टुकड़ी ने 2 वर्ष में ही एजटेक नामक जनजाति के राज्य को जीत लिया । इसी प्रकार 1536 में स्पेनिश सैन्य टुकड़ी ने लैटिन अमेरिका के " इंका " जनजाति के राज्य को भी 2 वर्षों में ही हड़प लिया।
आश्चर्यजनक घटना " अपाचे " नामक जनजाति से संघर्ष करने पर हुई । 1618 में अपाचे नामक जनजाति के मुखिया को मार डालने के बाद भी स्पेनिश सेना उसे हथिया नहीं सकी । 200 वर्षों तक संघर्ष चला और अंत में स्पेनिश सैन्य टुकड़ी को वापस जाना पड़ा । अपाचे जनजाति के पास एजटेक और इंका जनजाति की तुलना में अधिक सशक्त सेना नहीं थी। तो भी उसे स्पेनिश सेना पराजित नहीं कर सकी और स्पेनिश सेना को वापस जाना पड़ा ।
इसका कारण यह था कि अपाचे समाज की संरचना राज्य - आधारित अर्थात सत्ता - आधारित नहीं थी । यहां पर समाज की सारी शक्ति मुखिया पर केंद्रित नहीं थी। राज्य से अलग समाज की अपनी स्वतंत्र व्यवस्थाएं थी । इसलिए राज्य पराजित होने पर भी समाज पराजित नहीं हुआ और लंबा संघर्ष कर सका ।