गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

स्म्रति शेष महापंडित राहुल सांकृत्यायन:

जन्म : 9 अप्रैल, 1893/ निधन : 14 अप्रैल, 1963.

हजारों मील दूर पहाड़ों और नदियों के बीच दुर्लभ ग्रंथों की खोज में भटकने के बाद, उन ग्रंथों को खच्चरों पर लाद कर अपने देश में लाने वाले महापंडित राहुल सांकृत्यायन ही थे। घुमक्कड़ी को ही वे धर्म मानते थे। घुमक्कड़ी उनके जीवन का मूल मंत्र रही। आज दुनिया उन्हें एक यायावर, इतिहासविद, तत्त्वान्वेषी, युगपरिवर्तनकार साहित्यकार के रूप में जानती है। बौद्ध धर्म पर उनका शोध हिंदी साहित्य में सराहनीय है।
उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पंदहा गांव में 9 अप्रैल, 1893 को जन्मे राहुल सांकृत्यायन के बचपन का नाम केदारनाथ पांडेय था। उनके पिता गोवर्धन पांडेय किसान थे। उनके बचपन में ही माता कुलवंती का देहांत गया। उनका पालन-पोषण उनके नाना-नानी ने किया था। प्राथमिक शिक्षा के लिए उन्हें गांव के ही एक मदरसे में भेजा गया। उनका विवाह बचपन में ही कर दिया गया था, पर राहुल ने गृहस्थी बसाने के बजाय कुछ और ही सोच रखा था। वे किशोरावस्था में घर छोड़ कर चले गए और एक मठ में साधु बन गए। बाद में कलकत्ता चले गए। सन 1937 में उन्होंने रूस के लेनिनग्राद में एक स्कूल में संस्कृत अध्यापक की नौकरी की और उसी दौरान ऐलेना नामक महिला से दूसरी शादी कर ली।
’सन 1930 में श्रीलंका जाकर उन्होंने बौद्ध धर्म पर शोध किया और तभी से वे ‘रामोदर साधु’ से ‘राहुल’ हो गए। सांकृत्य गोत्र के कारण सांकृत्यायन कहलाए। उनके ज्ञान भंडार के कारण काशी के पंडितों ने उन्हें ‘महापंडित’ की उपाधि दी और इस तरह वे केदारनाथ पांडे से महापंडित राहुल सांकृत्यायन हो गए।
राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी साहित्य ही नहीं, भारत के कई अन्य क्षेत्रों के लिए भी शोध कार्य किया। उन्होंने धर्म, दर्शन, लोकसाहित्य, यात्रा साहित्य, इतिहास, राजनीति, जीवनी, कोष, प्राचीन ग्रंथों का संपादन कर विविध क्षेत्रों में अहम काम किया।
राहुल सांकृत्यायन ने कई सामाजिक कुरीतियों को भी तोड़ा। एक बार उन्होंने बलि प्रथा के विरुद्ध व्याख्यान दिया तो अयोध्या के पुरोहित की हिंसा का शिकार होना पड़ा। जब वे तत्कालीन सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी में गए तो सत्ता के लोभी सुविधापरस्तों की तीखी आलोचना की। वे सत्य का साथ देते थे और इसी का उदाहरण सन 1947 में अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रूप में दिया उनका भाषण है। उस समय उन्होंने जो भाषण दिया, वह अल्पसंख्यक संस्कृति और भाषाई सवाल पर कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के विपरीत था। नतीजतन उन्हें पार्टी की सदस्यता से हाथ धोना पड़ा। अपनी पुस्तक ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ और ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ में मार्क्सवाद पर प्रकाश डाला है।
’अलग-अलग देशों की यात्रा के कारण वे बहुभाषी बने। उन्होंने हिंदी, संस्कृत, पालि, भोजपुरी, उर्दू, पर्शियन, अरबी, तमिल, कन्नड़, तिब्बती, फ्रेंच और रूसी आदि भाषाओं में कई किताबें लिखीं। उनकी प्रमुख कृतियां हैं-
कहानी संग्रह : सतमी के बच्चे, वोल्गा से गंगा, बहुरंगी मधुपुरी, कनैला की कथा। उपन्यास : जीने के लिए, बाईसवीं सदी, जय यौधेय, भागो नहीं दुनिया को बदलो, मधुर स्वप्न, विस्मृत यात्री, दिवोदास।
आत्मकथा : मेरी जीवन यात्रा।
जीवनी : बचपन की स्मृतियां, सरदार पृथ्वीसिंह, नए भारत के नए नेता, अतीत से वर्तमान, लेनिन, स्तालिन, कार्ल मार्क्स, माओ-त्से-तुंग, घुमक्कड़ स्वामी, मेरे असहयोग के साथी, जिनका मैं कृतज्ञ, वीर चंद्रसिंह गढ़वाली, सिंहल घुमक्कड़ जयवर्धन, कप्तान लाल, महामानव बुद्ध और सिंहल के वीर पुरुष।
यात्रा साहित्य : मेरी तिब्बत यात्रा, मेरी लद्दाख यात्रा, किन्नर देश की ओर, चीन में क्या देखा, तिब्बत में सवा वर्ष, रूस में पच्चीस मास, घुमक्कड़-शास्त्र
सम्मान
साहित्य अकादेमी पुरस्कार, पद्म भूषण, त्रिपिटिकाचार्य
निधन : दार्जिलिंग में 14 अप्रैल 1963 को उनका निधन हुआ.

न तख्तो ताज चाहिए ,न जन्नत-स्वर्ग के हसीं !

 मेहनतकश सर्वहारा किसान मजदूर हूँ मैं,

हर खासोआम से कुछ कहना चाहता हूँ !

सदियों से सबकी सुन रहा हूँ खामोश मैं ,
आपसे शिद्द्त के साथ कुछ कहना चाहता हूँ!!
वेद पुराण बाइबिल कुरआन जेंदावेस्ता गीता,
के बरक्स मैं कुछ खास कहना चाहता हूँ!
इतिहास भूगोल राजनीती साइंस तकनीक ,
कमप्यूटर,मोबाइल से जुदा कहना चाहता हुँ !!
ईश्वर अवतारों पीरों पैगंबरों संतों महात्माओं,
के इतर कुछ अधुनातन कहना चाहता हूँ!!
समाज सुधारक नहीं हुँ क्रांतिवीर भी नहीं,
केवल मनुष्य हूँ मैं !पूँछो कि क्या चाहता हूँ!
न तख्तो ताज चाहिए ,न जन्नत-स्वर्ग के हसीं ,
सब्ज बाग ,फ़कत सम्मान से जीना चाहता हूँ।
युगो-ं युगों से जो बात सभी बिसारते आये हैं,
वो बात मैं अब सर्मायेदारों से कहना चाहता हूँ।।
मैं धरती,हवा,पानी,आसमान,सूरज चाँद,तारोंमें
सबका बराबर बाजिब हक देखना चाहता हूँ।
जो सम्पदा समष्टी चैतन्य ने रची है सबके लिए,
उसे मैं प्राणीमात्र में बराबर देखना चाहता हूँ।।

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

निगेटिव रिपोर्ट का कमाल — 👇🏻

10 दिन की जद्दोजहद के _बाद एक आदमी अपनी

कोरोना_ ☝🏻
नेगटिव की रिपोर्ट हाथ में लेकर अस्पताल के रिसेप्शन पर खड़ा था।🕴🏽
आसपास कुछ लोग तालियां बजा रहे थे, उसका
अभिनंदन
कर रहे थे। 🤷🏼‍♂️
जंग जो जीत कर आया था वो।
लेकिन उस शख्स के चेहरे पर बेचैनी की गहरी छाया थी।
गाड़ी से घर के रास्ते भर उसे याद ,😌 आता रहा "आइसोलेशन" नामक खतरनाक ☝🏻
और असहनीय दौर का वो मंजर।
न्यूनतम सुविधाओं वाला छोटा सा कमरा, अपर्याप्त उजाला, मनोरंजन ☝🏻👤
के किसी साधन की अनुपलब्धता, कोई बात नही करता था और न ही कोई नजदीक आता था। खाना भी बस प्लेट में भरकर सरका दिया जाता था।
कैसे गुजारे उसने वे 10 दिन, वही जानता था।😓
घर पहुचते ही स्वागत में खड़े उत्साही पत्नी और बच्चों को छोड़ कर वह शख्स सीधे घर के एक उपेक्षित कोने के कमरे में गया, जहाँ माँ पिछले पाँच वर्षों से पड़ी थी ।😭
माँ के पावों में गिरकर वह खूब रोया और उन्हें लेकर बाहर आया।
पिता की मृत्यु के बाद पिछले 5 वर्षों से एकांतवास (आइसोलेशन )
भोग रही माँ से कहा कि माँ आज से आप हम सब एक साथ एक जगह पर ही रहेंगे। ,👨‍👩‍👧‍👦
माँ को भी बड़ा आश्चर्य लगा कि आख़िर बेटे ने उसकी पत्नी के सामने ऐसा कहने की हिम्मत कैसे कर ली ? ☝🏻
इतना बड़ा हृदय परिवर्तन एकाएक कैसे हो गया ? बेटे ने फिर अपने एकांतवास की सारी परिस्थितियाँ माँ को बताई और बोला अब मुझे अहसास हुआ कि एकांतवास कितना दुखदायी होता है ? 😰
बेटे की नेगटिव रिपोर्ट उसकी जिंदगी की पॉजिटिव रिपोर्ट बन गयी ।
इसी का नाम☝🏻
जिंदगी
जियो और जीने दो

हम आत्मविनाश की ओर बड़ रहे हैं।

 आज हम आत्मनिर्भरता की और नहीं वरन् आत्मविनाश की ओर बड़ रहे हैं। टेक क्रांति ने कुछ पूंजीवादियों के हाथ में असीमित मुनाफाखोरी और शोषण का हथियार दे दिया हैं,जिसे वे राजनीतिक सत्ता को साथ लेकर अंजाम दे रहें हैं। बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी,महामारी, जीने के लिए जरूरी सभी साधन इन शक्तियों के हाथों में सीमिट कर रह गये हैं।

यही कारण है कि दलित,गरीब, पिछडा़ वर्ग, मिडिल क्लास, अपर मिडिल क्लास आदि के ज्वलंत सवाल परिदृश्य से गायब से होते जा रहे हैं! आज हम आत्मनिर्भर नहीं हो रहे हैं, अपितु हमारी संपूर्ण अर्थव्यवस्था ही मंदी की चपेट में है !

रविवार, 11 अप्रैल 2021

*सारी नकारात्मकताऐं मिटा दी जायें,*

 *एक दिन मेरा*

*मोबाइल चलते-चलते*
*धीरे चलने लगा*
*तो कभी हैंग होने लगा*
*एक जानकार ने बताया*
*इसे हल्का करना जरूरी है*
*फोन ओवरलोड हो गया है*
*इसलिए चलने में दिक्कत करता है*
*मैंने व्यर्थ की तस्वीरें, फाइलें, डाटा डिलीट कर दिये*
*चमत्कार सा हो गया*
*फोन चलने ही नही, दौड़ने लग गया*
*फोन क्या चलने लगा*
*मस्तिष्क का इंजन दौड़ने लगा*
*मन में आया*
*यदि अनपेक्षित सामग्री मिटाने से*
*एक निर्जीव फोन तीव्र गति से*
*चल सकता है*
*तो मन में भरी हुई, जमी हुई,*
*अनावश्यक यादें,*
*अप्रिय घटनाऐं, बैर, विरोध की*
*भावनाएें आदि-आदि*
*सारी नकारात्मकताऐं मिटा दी*
*जायें,*
*भुला दी जायें*
*तो आत्मा का पट सद्-विचारों,*
*सकारात्मकताओं के लिए*
*खाली हो जाऐ*
*जीवन बहुत छोटा है*
*क्यों न खुल कर आनन्द से जीया जाये*

मुकेश अंबानी की पूँजी बहुत बढ़ी,अडानी जीरो से हीरो होगये!

 विगत 7-8 साल में बहुत कुछ ऐंसा हुआ है कि भारत में कुछ अमीर लोगों का,खासकर गुजराती अमीर पहले से ज्यादा अमीर हो गये हैं!बेशक मुकेश अंबानी की पूँजी बहुत बढ़ी है,किंतु अडानी तो जीरो से हीरो बन गये!

इस दरम्यान गरीब मजदूर बेहाल हो गये हैं! कोढ़ में खाज की तरह एक तरफ किसान मजदूर विरोधी कानून और दूसरी तरफ कोरोना महामारी और लॉकडाऊन ने तमाम सार्वजनिक और सरकारी क्षेत्र को ध्वस्त कर दिया है!
भारत की आवाम ने सिर्फ मंदिर के लिये या हिंदूत्व के स्वाभिमान लिये ही दूसरी बार मोदीजी को बम्फर जनादेश नही दिया, बल्कि स्विश बैंक का कालाधन,*सबका साथ सबका विकास* के मुद्दों पर ज्यादा भरोसा किया था! किंतु अब तक कोई भी सकारात्मक कार्यवाही न होने से जन संघर्ष और किसान संघर्ष तेज हो चला है!
किंतु जनता के दुर्भाग्य से और हुकूमत के सौभाग्य से दुनिया में कोरोना वायरस की महामारी का संकट फिर से छा गया है! इसलिये अभी तमाम आंदोलन प्रतीकात्मक ही होने चाहिये
इस कोरोना महामारी ने आधुनिक मेडीकल साईंस को बहुत नाच नचाया है किंतु बहादुर मेडीकल वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने कोविड वैक्सीन बना लिया है! हालॉकि कोरोना ने विकसित राष्ट्रों,मंदिरों,मस्जिदों और धर्मांधों को धरती सुंघाकर बहुत कुछ तहस नहस कर दिया है!
इन दिनों दुनिया में लॉकडाऊन की वजह से गरीब-अमीर,काले -गोरे,सवर्ण-दलित,अगड़े- पिछड़े सभी वैश्विक जन संकट के मुहाने पर खड़े हैं!
यह ध्यान देने योग्य बात यह है कि भारत में इस कोरोना महामारी के संकटकाल में एक सर्वशक्तिमान और नामंमकिन को मुमकिन बनाने के लिये कटिबद्ध सरकार सत्ता में है! यदि सौभाग्य से भाजपा विपक्ष में होती,और कांग्रेस सत्ता में होती,तो भक्तगण प्रधानमंत्री को ही कोरोना कैरियर घोषित कर देते! तब अन्ना हजारे,स्वामी रामदेव और तमाम जहरीले अंधभक्तों द्वारा सोनियाजी को इटली भेजने का और कांग्रेस को सत्ता छोड़ने का राष्ट्र व्यापी आंदोलन छेड़ दिया जाता! अस्तु! हो

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

कोरोना संकट आने पर हमें मालूम पड़ा:-

 ह सच जो कोरोना संकट आने पर हमें मालूम पड़ा:-

1. अब अमेरिका अग्रणी देश नहीं है।
2. चीन कभी विश्व कल्याण की नही सोचता!
3. यूरोपीय उतने शिक्षित नहीं जितना उन्हें समझा जाता रहा था !
4. हम भारतीय अपनी छुट्टियॉ बिना यूरोप या अमेरिका गये यहीं आनन्द से बिता सकते हैं।
5. भारतीयों की रोग प्रतिरोधक क्षमता विश्व के अन्य लोगों से बहुत ज्यादा हैं ।
6. स्वास्थ्यकर्मी, पुलिसकर्मी, शिक्षाकर्मी, प्रशासनकर्मी और दिन-रात लोगों के सेवा में नि:स्वार्थ भाव से लगे स्वयंसेवी ही असली हीरो हैं ना कि तथाकथित नेता, क्रिकेटर या फिल्मी सितारे ।
7. बिना उपभोग के विश्व में सोना चॉदी व तेल का कोई महत्व नहीं।
8. पहली बार पशु व परिन्दों को लगा कि यह संसार उनका भी है।
9. तारे वास्तव में टिमटिमाते हैं यह विश्वास महानगरों के बच्चों को पहली बार हुआ।
10. विश्व के अधिकतर लोग अपना कार्य घर से भी कर सकते हैं।
11. हम और हमारी सन्तान बिना 'जंक फूड' के भी जिन्दा रह सकते है।
12. एक साफ सुथरा व स्वच्छ जीवन जीना कोई कठिन कार्य नहीं है।
13. भोजन पकाना केवल स्त्रियां ही नहीं जानती।
14. प्रिंट मीडिया को छोड़कर ज्यादातर मीडिया केवल झूठ और बकवास का पुलिन्दा है।
15.अभिनेता केवल मनोरंजनकर्ता हैं, जीवन में वास्तविक नायक नहीं।
16.भारतीय नारी कि वजह से ही घर मंदिर बनता है ।
17. भारत में दानवीर हर दौर में पैदा होते हैं?!
19.विकट समय को सही तरीक़े से भारतीय ही संभाल सकता है।
20. सामूहिक परिवार, एकल परिवार से अच्छा होता है।
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वे वास्तव में हिंदुत्व के वोट वटोरु खिलाड़ी हैं

 *चींटियाँ घर बनाती हैं और साँप उसमें रहने आ जाते हैं ! *

चींटियाँ खूब मेहनती होती हैं। अपनी9 एकता और मेहनत से अपनी सामूहिक सुरक्षा के निमत्त ठिकाना बनाती हैं। लेकिन उनके इस सार्वजनिक घर [वामी] में साँप जबरन घुस आते हैं। शायद इसीलिये कहावत चल पड़ी है कि 'चींटियाँ घर बनाती हैं और साँप उसमें रहने आ जाते हैं '। हर जानकार इंसान वामी के पास जाने से डरता है। हालाँकि उसे कोई गलतफहमी नहीं कि वह वामी से क्यों डरता है ? दरशल इंसान ही नहीं बल्कि वन्य जीव जन्तु -चूहा,बिल्ली ,कुत्ते ,कीट ,पतंगे भी जानते है कि 'वामी'में उसकी सृजनहार चींटियाँ नहीं बल्कि 'विषधर' निवास करते हैं। वास्तव में तो 'वामी ' के रूप - आकार से किसी को कोई खतरा नहीं। किन्तु वामी में डेरा डालने वाले 'जहरीले' केरेक्टर से हरेक को खतरा है। कहने को तो हर इंसान एक सामाजिक प्राणी है। किन्तु सीधे -सादे सरल लोगों के हक छीनकर ,ओरों के त्याग -बलिदान के कंधों पर चढ़कर जब कोई खास व्यक्ति या संगठन ताकतवर हो जाता है तो उसका आचरण किसी तक्षक ,वासुकि या कालियानाग से कम नहीं होता।
जिन्होंने १९८० के मुंबई अधिवेशन में 'भाजपा' की स्थापना की , जिन्होंने रथयात्राओं और कमंडल यात्राओं के बहाने देश भर में साम्प्रदायिकता का तांडव नृत्य नचाया,जिनके बहकावे में देश के निर्धन -गरीब सर्वहारा मजदूर -किसान ने हल-बैल छोड़कर अयोध्या कुच किया,जिन के भाषणों से उत्तेजित उन्मादियों ने अयोध्या का ढांचा गिराया,जिनके कारण हिन्दू -मुस्लिम दंगे हुए ,जिनके कारण गोधरा काण्ड हुआ,जिनके कारण गुजरात और देश भर में साम्प्रदायिक सौहाद्र की रुसवाई हुई, जिनके कारण अनेक बेकसूर जेल गए और दंगों में सैकड़ों जाने गईं,उन् लालकृष्ण आडवाणी,मुरली मनोहर जोशी,उमा भारती और शांताकुमार को आज सथापना दिवस पर घर में बैठकर ही संतोष करना पड़ा।
मोदी शाह की जोड़ी ने मुरली मनोहर जोशी,आडवाणी को राष्ट्रीय मंच पर सम्बोधन से वंचित कर सिद्ध कर दिया! याने कि कहावत सही है। चींटियां घर बनाती हैं और सांप उसमें रहने आ जाते हैं! और इसके अलावा भाजपा के वर्तमान,'बलात कब्जाधारियों ने यह भी सावित कर दिया कि :-
''मूर्ख लोग तो मकान बनाते- बनाते मर जाते हैं किन्तु विद्वान [धूर्त-चालाक ] ही उसमें रह सकते हैं!"
देश की ज्वलंत समस्याओं की रंचमात्र चर्चा न करना,बड़े नेताओं द्वारा अपने ही काल्पनिक और उन्मुक्त भाषणों को उपलब्धियों बताना,खुद ही अपनी पीठ थपथपाना,गरीबी,भुखमरी बेरोजगारी,और भ्रस्टाचार की तरफ से आँखें मूदकर,अर्जुन लक्ष्य की तरह ऐन केन प्रकारेण केवल हर *चुनाव में फतह हासिल करना* ही मौजूदा भाजपा नेतत्व का अभीष्ठ रह गया है!
दुनिया की तथाकथित 'सबसे बड़ी पार्टी' भाजपा के कुछ वणिकवादी नेता समझते हैं कि भाजपा में अब सर्वहारा वर्ग या किसानों की बातों का कोई महत्व नहीं रहा,वे वास्तव में हिंदुत्व के वोट वटोरु कार्ड के खिलाड़ी हैं!उनके लिये अंततोगत्वा असल चीज है सत्ता पिपासा। इसके सहारे ही भारत में लोकतंत्र की जगह फास्जिम,समाजवाद की जगह अब अडानी अंबानी जैसे अमीरों का विकास दमक रहा है!
धर्मनिरपेक्षता की जगह साम्प्रदायिकता की धमक सुनी सुनायी दे रही है। कार्पोरेट आवारा पूँजी के दलाल ,साम्राज्य्वाद के पिठ्ठू और बहुसंख्यक समुदाय के अंध भक्त मिलकर भारत को आर्थिक अराजकता की अंधी सुरंग में धकेल रहे हैं! खुदा खैर करे ! :-श्रीराम तिवारी

देशभक्ति का सर्टिफिकेट

 कुछ मंदमति न तो भारतीय संविधान पढ़ते हैं,न ही उन्हें भारतीय स्वाधीनता संग्राम की सेक्युलर महत्ता का ज्ञान है!और न ही उन्हें लोकतंत्र के बारे में सही ज्ञान है! वे अक्सर इस बात का रोना रोते रहते हैं कि भारत में कुछ पढ़े लिखे हिंदू सेक्युलर क्यों हैं?

उन्हें तो खुश होना चाहिये कि भारत में सब के सब कूड़ मगज धर्मांध और शाखाम्रग नही हैं!उन्हें गर्व होना चाहिये कि कुछ तो हैं जो लोकतंत्र संविधान और सर्वधर्म समभाव पर अडिग हैं!सेक्युलर होना तो सभ्य संसार में सबसे अच्छी बात है! यह गर्व की बात है, यही भारतीय संविधान का नीति निर्देशक सिद्धांत हैं!
यदि कोई कहता है कि वह सेक्युलर नही है तो वह भारतीय नही गद्दार है,फासिस्ट है! अमन का दुश्मन है!वेशक अतीत में कुछ अल्पसंख्यक लोग हिंदूओं के खिलाफ रहे हैं और भारत के प्रति उनकी निष्ठा संदेहास्पद रही है! वे जेहाद और दारुल हरम की बात करते रहे हैं! वे ISI और वैश्विक इस्लामिक आतंकवाद के लिये खाद पानी देते रहे हैं!
किंतु रामलला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर भारत के अधिकांस मुसलमानों की सकारात्मक प्रतिक्रिया रही! इसी तरह NRC पर तमाम हिंदूओं ने मुस्लिम समाज का पक्ष लिया ! अब कोरोना जैसी महामारी के साझा संकट ने हिंदू मुस्लिम को एक नाव में बिठा दिया है! अब यदि कोई किसी को देशभक्ति का सर्टिफिकेट बांटता है तो वह घटिया राजनीति कर रहा है!
इस कोरोना संकटकाल में जिंदा रहने के लिये सभी समान रूप से संघर्षरत हैं!याने इस मुल्क की मिट्टी से मुहब्बत करने लगे हैं!
जय हिंद.. लाल सलाम...