शनिवार, 3 जुलाई 2010
बुधवार, 30 जून 2010
.श्रीराम तिवारी का एकल काव्य पाठ
इंदौर में तारीख २७ शनिवार को जनवादी लेखक संघ की स्थानीय इकाई के तत्वाधान में मेरा एकल काव्य पाठ रखा गया .इस अवसर पर जलेस प्रलेस के साहित्यिक मित्रों ने न केवल दत्तचित्त होकर मेरी छंद बध्द रचनाओं को सुना अपितु समवेत स्वरों में जमकर समालोचना भी की .प्रोफ .देवीप्रसाद मोर्य ने इस गरिमा माय कार्यक्रम की अध्यक्षता की। सर्व श्री प्रोफ .सनत्कुमार प्रोफ गिरेंद्र्सिंग भदोरिया श्री त्रिपुरारारीलाल शर्मा प्रदीप मिश्र प्रदीप कान्त रजनीरमण शर्मा अब्ररार एहमद तथा अन्य अनेक बुद्धिजीवी और साहित्यकार उपस्थित हुए .परेश टोकेकर :संयोजक जनवादी लेखक संघ इंदौर ने आभार माना .
श्रीवर्धन त्रिवेदी को बधाई

द्रश्य मीडिया के बेजोड़ एंकर श्री श्रीवर्धन जी त्रिवेदी को उनके लिम्का बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नामित किये जाने पर
जन काव्य भारती और जनवादी लेखक संघ की और से लख लख बधाई. श्रीवर्धन दादा के नाम से मशहूर श्री त्रिवेदी जी ने सन सनी कार्यक्रम को लोकप्रियता की जिस मंजिल तक पहुँचाया है निसंदेह वह कीर्तिमान का हक़दार है.
शुक्रवार, 25 जून 2010
आशियाँ होगा ज़रूर .

आज तो है रात काली ;कल सुबह होगी ज़रूर .ईश का क्या दोष इसमें ;कुछ हमारा भी कसूर ।
हरतरफ मातम यहाँ आज क्यों पसरा हुआ .स्वाधीनता के स्वप्न क्यों हो गए सब चूर चूर ।
मुश्किलों का सामना कल तक तो मिलकर ही किया;आज फिर क्यों एकता कोसों हुई है दूर दूर ।
ज़ुल्मतों के दौर को खाद पानी दे रहे ;अमराइयां सूनी पडी ,आसमान छूते खजूर ।
निर्धनों की बस्तियों में आफतों के जलजले ;धर्म के कानों भनक ;थोरी तो होगी ज़रूर ।
आज तो है तंगहाली फान्ककस्ती की फिजा ;कल किसी भी भोर में ,किलकारियां होंगी जरुर ।
मुश्किलों का सामना करते हुए आगे बढ़ो ;कल किसी भी मोड़ पर आशियाँ होगा जरुर ।
बोलो बाबा राधे राधे .

डेंगू मलेरिया स्वान फ्लू का बुखार .अस्पतालों तक नहीं पहुँच पाते लाचार ।
सरकारी अस्पताल स्वयं बीमार .प्राइवेट नर्सिंग होम लूट का बाज़ार .
निर्धन जन करें हाहाकार .कब होगा कल्कि अवतार ।
क्रांति की चिंगारी भी कहीं बुझ न जाये दम साधे ।
बोलो बाबा राधे राधे । ।
कितनी ही चौड़ी सड़कें बनाते जाओ पर जाम बरकरार ।
फुटपाथों पर अतिक्रमण रोजी रोटी का तलबगार ।
यत्र तत्र नगर गाँव कचरे के ऊँचे उठते अम्बार .
विकास की गंगा का राजनेतिक दुष्प्रचार ।
सत्ता पर काबिज रहने के हथियार ।
जनता पिस रही शोषण का जुआ लादे लादे
बोलो बाबा राधे राधे ।
फासिस्टों की अपराधियों से,दोस्ती के इस्तहार ।
लोकतंत्र के खोल में साम्प्रदायिक बेक़रार ।
दिन दहाड़े घरों सड़कों पर इंसानियत तार तार
चेन स्नेचिंग अपहरण लूट हत्या बलात्कार ।
कदम कदम पर भय भूंख भ्रस्ताचार ।
भूमंडलीकरण का भक्तिगीत बेजार
लोग सुन रहे हैं क्यों ?दम साधे ।
बोलो बाबा राधे राधे .
सरकारी अस्पताल स्वयं बीमार .प्राइवेट नर्सिंग होम लूट का बाज़ार .
निर्धन जन करें हाहाकार .कब होगा कल्कि अवतार ।
क्रांति की चिंगारी भी कहीं बुझ न जाये दम साधे ।
बोलो बाबा राधे राधे । ।
कितनी ही चौड़ी सड़कें बनाते जाओ पर जाम बरकरार ।
फुटपाथों पर अतिक्रमण रोजी रोटी का तलबगार ।
यत्र तत्र नगर गाँव कचरे के ऊँचे उठते अम्बार .
विकास की गंगा का राजनेतिक दुष्प्रचार ।
सत्ता पर काबिज रहने के हथियार ।
जनता पिस रही शोषण का जुआ लादे लादे
बोलो बाबा राधे राधे ।
फासिस्टों की अपराधियों से,दोस्ती के इस्तहार ।
लोकतंत्र के खोल में साम्प्रदायिक बेक़रार ।
दिन दहाड़े घरों सड़कों पर इंसानियत तार तार
चेन स्नेचिंग अपहरण लूट हत्या बलात्कार ।
कदम कदम पर भय भूंख भ्रस्ताचार ।
भूमंडलीकरण का भक्तिगीत बेजार
लोग सुन रहे हैं क्यों ?दम साधे ।
बोलो बाबा राधे राधे .
गुरुवार, 24 जून 2010
आनर किलिंग का दूसरा पक्ष
आनर किलिंग पर लाइव इंडिया में डा प्रवीण तिवारी का प्रायोजित कार्यक्रम देखा .सभी सहभागियों ने एक स्वर में खाप पंचायतों के संविधानेतर सत्ता केंद्र बन जाने पर आपत्ति जताई .उधर मर्डर करने वालों ने भी बहादुरी ?से स्वीकार किया की हाँ हमने अपने कुटुंब के सम्मान की रक्षार्थ ऐंसा किया .भारत के महान्ययाबदी से लेकर अदना सा सामाजिक कार्यकर्त्ता और उधर पूरा का पूरा श्रव्य द्रश्य छप्या मीडिया गिरमा तोड़कर इस कुव्यवस्था ?पर प्रहार कर रहा है .मानो एक सकरात्मक क्रांति का आगाज़ बस होने ही जा रहा है.मेरा इन सभी व्यक्तियों संस्थाओं से अनुरोध है की दो प्रश्नों का संवैधानिक जबाब दें की यदि किसी परिवार की जवान लड़की को गुमराह कर कोई भगा कर ले जाए और वह रसूखदार हो पुलिश कानून पीड़ितों का उपहास करें तो भी क्या चुपचाप अन्याय सहना होगा .दूसरा सवाल की जो लोग अपने बेटा बेटियों को अपनी मन मर्जी से नैतिक अनितिक आचरण की छुट दें उनके सामाजिक बहिष्कार हो जाने के उपरांत शेष बच्चों के विवाह इत्यादि का संकट आने पर कोई बोध्धिकता काम नहीं आती .दूसरी और आनर किलिंग के दोषियों को सर पे बिठाने के लिए अनेक मिल जायेंगे .इस दिशा में सामाजिक संरक्ष्ण हेतु सत्ता प्र्तष्ठ्नो को आगे आना चाहिए .
रविवार, 9 मई 2010
गुदड़ी के लाल- साभार www.drpraveentiwari.blogspot.com

आईपीएल, ललित मोदी, सदन में हंगामा, इस्तीफों का सिलसिला, कसाब को फांसी आदि-इत्यादि के बीच आशु मिश्रा और हरीशचन्द्र जैसे लोगों से मुलाक़ात राहत देने वाली होती है और एक बूस्टर का काम भी करती है। ये दोनों नाम बड़े राजनेताओं की तरह या बॉलीवु़ड की हस्तियों की तरह मी़डिया प्रिय नाम तो नहीं हैं लेकिन मुझे लगता है असल ज़िंदगी के हीरो ऐसे ही लोग होते हैं। हरीशचन्द्र सबसे यंग आईएएस चुने गए हैं उनकी उम्र 22 साल है और आशु उनके प्रेरणा स्त्रोत हैं और दिल्ली यूनिवर्सिटी से एम. ए. कर रहे हैं।
सैंकड़ों छात्र आईएएस चुने जाते हैं और उनके दोस्तों और प्रेरणा स्त्रोतों की भी लंबी फेहरिस्त होती है फिर ऐसा क्या ख़ास है इन दोनों में? ख़ास है इन दोनों के हालात और पृष्ठभूमि जिसमें इन्होंने ये क़ामयाबी हासिल की है। ख़ास है इनका जज़्बा जो दुष्यंत कुमार के शेर, “कौन कहता है आसमां में सुराख़ नहीं होता एक पत्थर तो तबियत से उछालों यारों” या बशीर बद्र के शेर, “मैं दरिया हूं अपना हुनर जानता हूं जहां से गुज़रुंगा रास्ता बना लूंगा”, को ज़िंदगी की हक़ीकत साबित करते हैं।

इन दोनों की पृष्ठभूमि पर नज़र दौड़ाएंगें तो शायद मुझ पर पड़े इनके प्रभाव को आप और बेहतर तरीक़े से समझ पाएंगे और शायद आपका जज़्बा और कुछ कर गुज़रने की तमन्ना एक बार फिर जाग उठेगी, अगर वो सो चुकी है तो। सबसे पहले बात हरीशचन्द्र की ये दिल्ली के एक बड़े स्लम किंग्सवे के रहने वाले हैं इनके पिता मज़दूर हैं और मां दूसरों के घरों में झाड़ू पोछा और बर्तन मांझने का काम करती हैं। हर साल स्कॉलरशिप हासिल करने में कामयाब रहने वाले हरीश मानते है कि ये हमारे देश की ख़ूबसूरती है कि मेरे जैसी पृष्ठ भूमि का एक नौजवान अपने सपनों को पूरा कर सकता है। अब बात अगर आशू मिश्रा कि करें तो उनके सामने चुनौती कमज़ोर पृष्ठभूमि और सहुलियतों की कमी से कहीं बढ़कर है, दरअसल आशू जन्मांध हैं लेकिन इसके बावजूद वो न सिर्फ हरीश के प्रेरणा स्त्रोत है बल्कि ऐसे कई छात्रों के लिए एक मिसाल हैं जो ज़िंदगी की चुनौतियों के सामने घुटने टेक देते हैं।
दसवीं की परीक्षा में जब हरीश महज़ 45 प्रतिशत अंक ला पाए थे उस वक़्त आशू 75 प्रतिशत अंकों के साथ टॉपर रहे थे। आशू एम ए इन पॉलिटिकल सांइस के फर्स्ट ईयर में अव्वल नंबर रहे हैं और हरीश को उम्मीद है कि वो इस बार के गोल्ड मेडलिस्ट भी रहेंगे। इन दोनों का ही सपना है सबसे पहले अपने परिवार के बाक़ी सदस्यों के जीवन को बेहतर बनाना, छोटे भाई-बहनों का अच्छा करियर बनाने में उनकी मदद करना। हांलाकि ये दोनों इस बात को भी मानते हैं कि अच्छा करियर बनाने के लिए किसी भी तरह की बाह्य मदद से ज़्यादा आंतरिक इच्छाशक्ति और कुछ कर गुज़रने के जज़्बे की ज़रुरत होती है।

कोचिंग क्लासेस की तलाश में देश के कोने-कोने में भटक रहे छात्रों के लिए ये दोनों बड़ी प्रेरणा है क्योंकि इन दोनों ने कभी किसी कोचिंग में क़दम नही रखा, हां सही मार्ग दर्शन इन्हे हमेशा मिलता रहा लेकिन वो भी इनके अपने प्रयासों और इच्छा शक्ति के चलते। माता-पिता के सपोर्ट और तमाम सहुलियतों के बावजूद जब छात्र फ्रस्ट्रेशन का शिकार होते हैँ और आशू और हरीश जैसे छात्र कामयाबी हासिल करते हैं तो एक बात तो साफ हो जाती है कि करियर और कामयाबी के लिए मज़बूत पृष्ठभूमि से ज़्यादा ज़रूरी है सही लक्ष्य का चुनाव और उसे लेकर एकाग्रता।
बातचीत के अंत में इन दोनों ने एक मूलमंत्र भी दिया जो आप सबके साथ साझा कर रहा हूं। इनके मुताबिक कोई प्रयास, पहला प्रयास मानकर नहीं करना चाहिए बल्कि अंतिम प्रयास मानकर करना चाहिए। पहला प्रयास असफल होने के बाद दूसरे प्रयास की संभावना का विचार आपके प्रयास को कमज़ोर करता है। साथ ही हरीश का कहना है कि जब भी नकारात्मक विचार आए, चुनौतियां कठिन लगे तो अपने से ज्यादा परेशानियों को झेल रहे लोगों को देखकर खुद की बेहतर स्थिति के लिए ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए। मेरी पृष्ठभूमि बहुतों के लिए एक बुरा सपना हो सकती है लेकिन मेरे सामने भी आशू जैसा एक उदाहरण है जो मुझसे बड़ी चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर रहा है।
डॉ प्रवीण तिवारी
एंकर-लाइव इंडिया
शनिवार, 1 मई 2010
शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010
बीएसएनएल की मीडिया आलोचना के निहितार्थ

दुनिया भर में रोज़-रोज़, नई-नई तकनीक के उद्भव, विकास तथा विश्व बाज़ार में मांग की नित्यता के कारण दूरसंचार क्षेत्र ने अन्य सेवाओं और आवश्यक्ताओं में अग्रिम जगह बना ली है। रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाने से दूरसंचार सोवाओं का साहित्येतर आलोचनात्मक स्वरूप भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। सेवा उपलब्धता, गुणवत्ता, कनेक्टीविटी तथा बिलिंग समेत अन्य मूल्य वर्धित प्रति-उत्पादों को ग्रोथ-क्राइसिस के कारण सर्वत्र ख़ामियों का मुंह देखना पड़ रहा है। ख़ासतौर से पीत-पत्रकारिता वाले अख़बार समूहों में अक्सर सरकारी क्षेत्र की खिंचाई होती दिखाई देती है। भले ही सर्विस ब्रेक का ज़िम्मेदार स्वयं निजी क्षेत्र ही क्यों न हो।
नि:संदेह वर्तमान PSUs (BSNL/MTNL) अतीत में केन्द्रीय सरकार की “मोनोपाली” के प्रतीक थे। ये कतई आश्चर्यजनक नहीं है कि इस कंपनी के मैनेजर्स तथा मज़दूर-कर्मचारियों में कंपनीगत मानसिकता अथवा निजी क्षेत्र के बरअक्स प्रतिस्पर्धागत बाज़ारी भावना पैदा नहीं हो सकी। किन्तु यह भी सच है कि अतीत में पूरे सौ साल तक सरकार से बिना एक पैसा लिये इन्हीं मजदूर-कर्मचारियों ने एक शानदार इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया जो सन् 2000 के दरम्यान खण्डित कर तीन टुकड़ों- BSNL+MTNL+VSNL में बांट दिया गया था।
अब सैम पित्रोदा समिति की अनुशंसाओं को अमल में लाया जाता है तो बचे-खुचे BSNL का सत्यानाश होने से कोई नहीं रोक सकता। चूंकि बाज़ार में निजी क्षेत्र के खिलाड़ी पस्त होते जा रहे हैं, उनकी नकली ऑडिट रिपोर्टों का भाण्डा फूटता जा रहा है उदाहरणार्थ; सत्यम कम्पनी का महाघोटाला; वे अपने मज़दूरों से 12-12 घण्टे काम लेने, कम तनख्वाह देने तथा पेंशन, ग्रेच्युटी नहीं देने एवं राजनीतिज्ञों को भ्रष्ट करने में कुख्यात रहे हैं, इस सबके बावजूद दूरसंचार क्षेत्र में पहले की तरह अंधाधुंध मुनाफा नहीं कमा पा रहे हैं। यदि वे कॉल दरें बढ़ाते हैं तो उपभोक्ता BSNL या सरकारी उपक्रमों पास चला जायेगा, जहां हर तरह की कथित लापरवाही के बावजूद एक बात की गारण्टी ज़रूर है कि हिडन चार्ज या नक़ली बिलिंग नहीं होती। यही वजह है कि निजी क्षेत्र के सारे ऑपरेटर्स द्वारा तयशुदा रणनीति के तहत केन्द्र सरकार पर दबाव बनाया गया है कि BSNL का तियापांचा फौरन करो वरना लोकसभा में उनके पूंजीवादी नुमाईन्दे सरकार नहीं चलने देंगे क्योंकि BSNL के बाज़ार में रहते हुए कॉल-रेट बढ़ा पाना संभव नहीं है। अत: BSNL (सार्वजनिक उपक्रम) को एक बार फिर राजनैतिक दुराधरष षड़यंत्रों का शिकार बनाया जा सकता है। निजी क्षेत्र के कतिपय ऑपरेटर राजनीतिज्ञों से सीधे संबंध रखते हैं। सुखराम काण्ड, प्रमोद महाजन काण्ड तथा हाल ही में उजागर BSNL का 3G मैगा-टेण्डर निरस्तीकाण्ड अंतिम दुर्घटनाएं नहीं हैं। स्पैक्ट्रम नीलामी स्केम जगज़ाहिर है। आये दिन जान-बूझकर निजी क्षेत्र एवं प्रशासन तंत्र की मिलीभगत से BSNL के नेटवर्क को क्षति पहुंचाई जाती है।
चूंकी वर्तमान संचार मंत्री और पूर्व संचार मंत्री द्रमुक सुप्रीमो परिवार से सम्बन्धित हैं और इस परिवार में सत्ता संग्राम छिड़ा हुआ है अत: एक दूसरे को बाहर का रास्ता दिखाने की गरज से DOT/PMO में BSNL मैनेजमैंट तथा कम्पनी की सकल मिलकियत से सम्बन्धित सैम पित्रोदा कमेटी इत्यादि के बहाने विभिन्न घपलों को आये दिन उजागर किया जा रहा है। ऐसा करने वालों का मकसद भले ही पूरा न हो किन्तु BSNL की एक केन्द्रीय सार्वजनिक उपक्रम के रूप में किरकिरी ज़रुर हो रही है।
कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के कतिपय मंत्री जो स्टेट मिनिस्ट्री से संतुष्ट नहीं हैं; वे इस जुगाड़ में लगे हुए हैं कि इधर राजाजी के काम लगे और उधर उनकी कैबिनेट में ताजपोशी हो जाये या मंत्रालय का स्वतन्त्र प्रभार ही मिल जाये। यही वजह है कि विभिन्न ज़िलों के स्थानीय छुटभैये नेता बिना सोचे समझे BSNL (केन्द्रीय सार्वजनिक उपक्रम) पर तोहमत लगाते रहते हैं। ये नादान इतना भी नहीं समझते कि BSNL को कमज़ोर करने की कड़ी (I.T.I.) श्रीमती सोनिया गांधी के हाथों में है। प्रबन्धकीय अक्षमता (I.T.S.) की बागडोर स्वयं प्रधानमंत्री के हाथों में है। स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं से अपील है कि BSNL की कमज़ोरियों, ख़ामियों तथा तकनीकी अवरोधों का ढिण्ढोरा अखबारों में पीटने के बजाय उन नापाक तत्वों को सबक सिखाएं जो दिन-दहाड़े BSNL के नेटवर्क में गड़बड़ी के लिए BRTS/HIGHWAY/FOURLANE एवं निगम द्वारा शहर में सीमेंटीकरण के दरम्यान अंधाधुंद खुदाई करते है और जिसके कारण विगत दिनों BSNL को बहुत कुछ खोना पड़ा है। क्या वजह है कि निजी ऑपरेटर्स की केबल कटने या नेटवर्क में गड़बड़ी जो की अक्सर रहती है, के बावजूद अखबारों में इनके बारें में कुछ नहीं छपता? क्या वजह है कि उनके दर्जनों अवैध टॉवर रातों-रात वैध कर दिये गए? क्यों कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं की गई? क्या BSNL के साथ इस प्रकार की सहनुभूति संभावित हो सकती है? कदापि नहीं! क्योंकि स्थानीय प्रशासन, भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, गैर-जिम्मेदार मीडिया-अखबारों तथा ठेकेदारों को देने के लिए धन खर्च की कोई वैधानिक मद BSNL के पास मौजूद नहीं है। अच्छे से अच्छा तकनीकी क्षमताधारक उपक्रम BSNL ग़लत प्रबंधन के कारण बाज़ार की अपेक्षित पूर्ति नहीं कर पा रहा है फिर भी उसकी शानदार विरासत के कारण ईमानदार ग्राहकों (जनता) का भरोसा क़ायम है।
यदि कोई सचेत राजनीतिज्ञ-अख़बारनवीस या आम जनता वाक़ई चाहती है कि देश में महंगाई और ज्यादा तेजी से न बढ़े, देश की संचार-व्यवस्था में विदेशी ताक़तों की घुसपैठ न हो, संचार क्षेत्र की दरें वर्तमान सस्ती दरों पर क़ायम रहें तथा नेटवर्क विश्व स्तरीय हो तो उन्हे चाहिये कि सार्वजनिक उपक्रम BSNL को बर्बाद करने वाली ताक़तों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करें।
BSNL एम्पलाइज यूनियन का प्रत्येक संघर्ष इस अर्थ में देशभक्ति पूर्ण है कि वह एक ज़िम्मेदार संगठन की हैसियत से न केवल कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए संघर्षरत है अपितु निजी क्षेत्र से देश की जनता को लूट से बचाने के लिए दृढ़-संकल्पित है। जो उपभोक्ता BSNL की सेवाएं ले रहे हैं, वे देशभक्ति पूर्ण कार्य कर रहे हैं, क्योंकि वे पं. जवाहरलाल नेहरु के सकल्पों का सम्मान कर रहे हैं। जो उपभोक्ता निजी ऑपरेटरों की सेवाएं ले रहे हैं उन्हें ये जान लेना चाहिए कि उनका ऑपरेटर तभी तक वर्तमान निर्धारित दरों पर सेवाएं देगा जब तक निजी क्षेत्र का प्रतिस्पर्धी अर्थात सरकारी उपक्रम BSNL मैदान में डटा रहेगा। अन्ततोगत्वा निष्कर्ष यह है कि तमाम आलोचनाओं का स्वागत करते हुए BSNL निरन्तर अपनी पूर्व अवस्था में शिखर पर पहुंचने के लिए प्रयत्नशील है, किन्तु जिनके हाथों में इसकी बागडोर है, वे हाथ देशभक्ति पूर्ण होने चाहिए।
क्रान्तिकारी अभिवादन सहित आपका साथी
श्रीराम तिवारी
राष्ट्रीय संगठन सचिव,
B.S.N.L.E.U. C.H.Q.
शनिवार, 27 मार्च 2010
अमीर देश की जनता ग़रीब क्यों है?

दुनिया के बड़े-बड़े महासागरों में एक,
हिन्द महासागर की चारों ओर धूम है।
उत्तर में इसके हरी भरी धरती,
वंदनीय जग में भारत की भूमि है।।
मानसूनी हवाओं के लोम-अनुलोम होते,
ग्रीष्म संग पावस की ऋतु रही झूम है।
शरद-शिशिर-हेमंत-वसंत जहां,
ऐसे ऋतु चक्र से तो देव महरूम हैं।।
हिम शैलनंदिनी सदा नीरा सरिताएं,
कल-कल करती किलोल मची धूम है।
हरी-भरी वादियां हिमालय की गोद में,
प्राकृतिक संपदा खनिज भरपूर हैं।।
वन-उपवन फैले फली-फूली खेतियां,
क्यों कुछ मालामाल बाकी मज़लूम हैं।
त्याग बलिदान की विरासतें भी कम नहीं,
कीर्ति पताका रही नील गगन चूम हैं।।
बुद्धि-ज्ञान-कर्मयोग धरम की धुरन्धरी,
अतृप्त चंचला-सी क्यों मचल रही भूमि है।
संवेदनाएं भेंट चढ़ी स्वार्थी उत्तंग ऋंग,
कौन ज़िम्मेदार है हमको मालूम है।।
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