मंगलवार, 22 सितंबर 2020

हिंदुत्व पर ब्राह्मणों का एकाधिकार नही

👌बुरा न लगे तो पढ़ना👌
☺☺😊😢😊☺☺
देश का राष्ट्रपति -एस सी
देश का उपराष्ट्रपति- नायडू
देश का प्रधानमंत्री -तेली
देश का होम मिनिस्टर -जैन
देश का रक्षा मंत्री -ठाकुर
देशके सबसे बड़े राज्य यूपी.के सी.एम -ठाकुर
देश का सबसे अमीर -अंबानी गुजराती बनिया
देश का दूसरा अमीर -अजीम प्रेम जी, मुस्लिम
देश का तीसरा अमीर- टाटा, पारसी
देश का चौथा अमीर -बिड़ला, मारवाड़ी बनिया
(नोट :-देश के टॉप 50 पूंजीपतियों में कोई दलित,ब्राह्मण और आदिवासी नही)
बाबा राम देव (यादव)
जय गुरुदेव. (यादव)
गुरमीत राम रहीम (जाट).
रामपाल (जाट)
राधे मां (खत्री सिंधी)
आसाराम (धोबी सिंधी)
स्वामी नित्यानंद (दलित)
स्वामी चिन्मयानंद (दलित)
साध्वी ऋतम्भरा (नाई)
साध्वी उमा भारती (लोधी)
साक्षी महाराज (कुर्मी पटेल)
साध्वी प्रज्ञा (मलाह दलित)
साध्वी प्रभा (यादव)
साध्वी चिदर्पिता (मोर्य)
संत गणेश्वर (दलित पाशी)
ब्रह्माकुमारी लेखराज बचानी (सिंधी बनिया)
ओशो रजनीश (जैन)
दाती महाराज. (दलित)
(ऱाजस्थान)
इन सभी गैर ब्राह्मण की ताकत देखने के बाद स्वयंसिद्ध है कि भारत पर या हिंदुत्व पर ब्राह्मणों का एकाधिकार नही है!

सोमवार, 21 सितंबर 2020

कविता -३

नेता मंत्री अफसर बाबू ,
इनपर नहीं किसीका काबू!
भले बुढ़ापा आ जाए पर,
इनकी तृष्णा है बेकाबू!!
नित नित नए चुनावी फंडे,
बदल-बदल कर झंडे डंडे!
राजनीति इतनी हरजाई
कि नहीं देखती संडे मंडे!!
अंधे पीसें कुत्ते खायें यह,
रीति सदा से चली आ रही!
बेरोजगारी महंगाई मिलकर,
भारत की तरुणाई खा रही!!
बार बार जनता को ठगते,
सत्ता की प्रभुता बढ़ भारी!
भारतकी छाती पर अपने,
खुद ही चला रहे हैं आरी !!
लोकतंत्र कहने भर को है,
फासिस्टों के हाथ हैं लम्बे !
बिन मतदान बिल पास हो रहे,
जय जगदम्बे जय जगदंबे !!
श्रीराम तिवारी
****
माल गपागप खाएं चोट्टे,
कसर नहीं हैवानी में।
मंद मंद मुस्काए हुक्मराँ,
गई भैंस जब पानी में।।
सुरा सुंदरी शोहरत शक्ति,
सत्ता की गुड़ धानी में।
संविधान को धता बताते,
शासकगण आसानी में।।
लोकतंत्र के चारों खम्बे,
पथ विचलित नादानी में।
लुटिया डूबी अर्थतंत्र की,
मुल्क फसा हैरानी में।।
बेरोजगार खीजते मरते,
कोरोना की शैतानी में।
कारपोरेट पूँजीकी जयजय,
जीडीपी गई पानी में।।
निर्धन निबल लड़ें आपस में,
जाति धर्म की घानी में।
दल्ले अविरल जुटे हुए हैं,
काली कारस्तानी में।।
बलिदानों की गाथा भूले,
लिख गये भरी जवानी में।
संघर्षों की सही दिशा थी,
भगतसिंह की वाणी में।।
श्रीराम तिवारी

*तीसरी बकरी*

*तीसरी बकरी* 🐐🐐🐐
पांचवी क्लास में दो विद्यार्थी थे। एक का नाम था अमित और दूसरे का नंदू!
एक दिन जब स्कूल की छुट्टी हो गयी तब नंदू ने अमित से कहा, “दोस्त, मेरे दिमाग में एक आईडिया है!”
“बताओ-बताओ.. क्या आईडिया है?” अमित ने एक्साईटेड होते हुए पूछा।
नंदू - “वो देखो, सामने तीन बकरियां चर रही हैं।”🐐🐐🐐
अमित :- “तो! इनसे हमे क्या लेना-देना है?”
नंदू - "हम आज सबसे अंत में स्कूल से निकलेंगे और जाने से पहले इन बकरियों को पकड़ कर स्कूल में छोड़ देंगे, कल जब स्कूल खुलेगा तब सभी इन्हें खोजने में अपना समय बर्वाद करेगे और हमें पढाई नहीं करनी पड़ेगी..”🐐🐐🐐
अमित :- “पर इतनी बड़ी बकरियां खोजना कोई कठिन काम थोड़े ही है? कुछ ही समय में ये मिल जायेंगी और फिर सबकुछ नार्मल हो जाएगा..”
नंदू : “हाहाहा.. यही तो बात है, वे बकरियां आसानी से नहीं ढूंढ पायेंगे, बस तुम देखते जाओ मैं क्या करता हूँ!”🐐🐐🐐
इसके बाद दोनों दोस्त छुट्टी के बाद भी पढ़ायी के बहाने अपने क्लास में बैठे रहे और जब सभी लोग चले गए तो ये तीनो बकरियों को पकड़ कर क्लास के अन्दर ले आये।
अन्दर लाकर दोनों दोस्तों ने बकरियों की पीठ पर काले रंग का गोला बना दिया। इसके बाद नंदू बोला, “अब मैं इन बकरियों पे नंबर डाल देता हूँ। और उसने सफेद रंग से नंबर लिखने शुरू किये:
पहली बकरी पे नंबर 1,🐐
दूसरी पे नंबर 2,🐐
और तीसरी पे नंबर 4.🐐
“ये क्या? तुमने तीसरी बकरी पे नंबर 4 क्यों डाल दिया?” अमित ने आश्चर्य से पूछा।
नंदू हंसते हुए बोला-“दोस्त यही तो मेरा आईडिया है, अब कल देखना सभी तीसरी नंबर की बकरी ढूँढने में पूरा दिन निकाल देंगे.. और वो कभी मिलेगी ही नहीं..”
अगले दिन दोनों दोस्त समय से कुछ पहले ही स्कूल पहुँच गए।🐐🐐🐐
थोड़ी ही देर में स्कूल के अन्दर बकरियों के होने का शोर मच गया।🐐🐐🐐
कोई चिल्ला रहा था, “चार बकरियां हैं, पहले, दुसरे और चौथे नंबर की बकरियां तो आसानी से मिल गयीं.. बस तीसरे नंबर वाली को ढूँढना बाकी है।”🐐🐐🐐
स्कूल का सारा स्टाफ तीसरे नंबर की बकरी ढूढने में लगा गया.. एक-एक क्लास में टीचर गए अच्छे से तालाशी ली। कुछ खोजूवीर स्कूल की छतों पर भी बकरी ढूंढते देखे गए.. कई सीनियर बच्चों को भी इस काम में लगा दिया गया।🐐🐐🐐
तीसरी बकरी ढूँढने का बहुत प्रयास किया गया, पर बकरी तब तो मिलती जब वो होती..! बकरी तो थी ही नहीं!
आज सभी परेशान थे पर अमित और नंदू इतने खुश पहले कभी नहीं हुए थे। आज उन्होंने अपनी चालाकी से एक बकरी अदृश्य कर दी थी।
इस कहानी को पढ़कर चेहरे पे हलकी सी मुस्कान आना स्वाभाविक है। पर _इस मुस्कान के साथ-साथ हमें इसमें छिपे सन्देश को भी ज़रूर समझना चाहिए_।
तीसरी बकरी, *दरअसल वो चीजें हैं जिन्हें खोजने के लिए हम बेचैन हैं पर वो हमें कभी मिलती ही नहीं.. क्योंकि वो वास्तव में है ही नहीं*!
*और वो तीसरी बकरी है: "अच्छे दिन"*

#कार्य_ऊर्जा_विमर्श


सत्ता में संपृक्त प्रकृति ऊर्जा-संपन्न है, बल-संपन्न है, क्रियाशील है. मानव-प्रकृति सत्ता में संपृक्तता वश ज्ञान-संपन्न है. मानव-प्रकृति ज्ञान के अनुसार कार्य-व्यवहार करती है. जड़-प्रकृति साम्य-ऊर्जा के आधार पर क्रियाशील है. जड़-परमाणुओं में इस तरह क्रियाशील होने का क्या प्रयोजन निकला? परमाणुओं में संतुलन का प्रयोजन निकला. संतुलित रूप में क्रियाशीलता वश या कार्य करने से जड़-प्रकृति में कार्य-ऊर्जा पैदा होता है. यह जड़-प्रकृति में कार्य-ऊर्जा का स्वरूप है - ताप, ध्वनि, और विद्युत. कार्य-ऊर्जा का यह प्रकटन व्यवस्था के अर्थ में है. कार्य करने की योग्यता सभी प्रजातियों के परमाणुओं में साम्य है. कार्य-ऊर्जा की frequency हर प्रजाति की अलग-अलग है. हर जड़-परमाणु का ताप, ध्वनि, और विद्युत को प्रकट करने का frequency अलग-अलग है. यह उनमें होने वाली मात्रा के आधार पर है.
प्रश्न: परमाणु में ताप का क्या स्वरूप है?
परमाणु की क्रियाशीलता को रोक सकने वाला ऐसा शून्य-ताप नहीं है. परमाणु स्वयं में व्यवस्था में रहने के लिए जितने ताप की आवश्यकता है, उसको परमाणु स्वयं बनाए रखता है. परमाणु अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए आवश्यक ताप को अपनी क्रियाशीलता द्वारा उत्पन्न करता है. विकीर्नीय या अजीर्ण परमाणुओं में परिवेशीय अंशों की वर्तुलात्मक गति से उत्पन्न ताप का नाभिक पर स्वाभाविक रूप में अंतर्नियोजन होता रहता है. भूखे परमाणुओं में ताप का स्वाभाविक रूप में बहिर्नियोजन होता रहता है. यह आपको प्रचलित-विज्ञान में नहीं पढ़ाते हैं. इस ओर विज्ञान गया ही नहीं है. सकल कुकर्म का आधार यही बना. अजीर्ण परमाणुओं में स्वाभाविक रूप से होने वाले ताप के अंतर्नियोजन से विकीर्नीय प्रभाव बनता है. नाभिक पर आघात करने से परिवेशीय अंशों द्वारा ताप का अंतर्नियोजन निरस्त हो जाता है, ताप बहिर्गत हो जाता है.
प्रश्न: परमाणु में विद्युत कैसे तैयार होता है?
जैसे डायनमो में चुम्बकीय धाराओं के armature के घूर्णन गति द्वारा विखंडन पूर्वक विद्युत तैयार होता है – वैसे ही परमाणु में परिवेशीय अंशों के वर्तुलात्मक गति से उत्पन्न चुम्बकीय प्रभाव का मध्यांशों के घूर्णन से विखंडन पूर्वक विद्युत तैयार होता है. व्यापक में संपृक्त रहने के फल में यह सब होता है.
प्रश्न: जड़ प्रकृति में जो कार्य-ऊर्जा प्रकट होती है, क्या मनुष्य उसको घटा-बढ़ा सकता है?
उसको घटना-बढ़ाना कुछ नहीं होता है, उपयोग करना होता है.
प्रश्न: एक पतीले में रखी दाल को हमने लकड़ी जला कर गर्म किया तो क्या इस प्रक्रिया में कार्य-ऊर्जा बढ़ी या वही रही?
कार्य-ऊर्जा बढ़ी नहीं. कार्य-ऊर्जा का हमने उपयोग किया. कुल वस्तु उतना ही रहा. परिवर्तन हुआ – लकड़ी राख बनी और दाल पक गयी पर कुल कार्य-ऊर्जा वही रही.
प्रश्न: किसी धरती के विकसित होने में, उस पर क्रमशः अवस्थाओं के प्रगटन होने में क्या उसकी कार्य-ऊर्जा बढ़ती नहीं है?
धरती की कुल कार्य-ऊर्जा यथावत रहती है. कोई भी चीज न बढ़ती है, न घटती है. ह्रास-परम स्थिति में भी वस्तु उतना ही है. विकास-परम स्थिति में भी वस्तु उतना ही है. अस्तित्व में ऊर्जाएं यथावत रहते हैं, मात्राएं यथावत रहते हैं. परिवर्तन होता रहता है. परिवर्तन नहीं होता तो विकास होना ही नहीं था. परिवर्तन दो तरह का है – मात्रात्मक परिवर्तन और गुणात्मक परिवर्तन. इसमें मनुष्येत्तर प्रकृति में जो मात्रात्मक और गुणात्मक परिवर्तन हुआ है – वह व्यवस्था के अर्थ में हुआ है. मानव के प्रगटन में मात्रात्मक-परिवर्तन जो हुआ (शरीर-परंपरा के स्थापित होने में) – वह व्यवस्था के अर्थ में हुआ. पर गुणात्मक-परिवर्तन जो होना था, उसमें मानव पीछे है. यह बात तर्क-सम्मत है, व्यवहारिक है, और आवश्यक है.
प्रश्न: चैतन्य-प्रकृति का मानव जड़-प्रकृति की कार्य-ऊर्जा को कैसे उपयोग करता है?
चैतन्य-प्रकृति में चेतना ही कार्य-ऊर्जा है. जड़-प्रकृति में प्रगट होने वाले कार्य-ऊर्जा को मनुष्य उपयोग करता है. अब मानव को इन्हें “आबाद होने” या व्यवस्था के अर्थ में उपयोग करना है. अभी तक सभी मानवों ने – चाहे ज्ञानी हों, अज्ञानी हों, विज्ञानी हों - जड़-प्रकृति को बर्बाद करते हुए उपयोग किया कि नहीं? जड़-प्रकृति में तीनो ऊर्जाओं (ध्वनि, ताप, और विद्युत) को प्रकट करना ही उनका प्रयोजन है. जड़-प्रकृति की कार्य-ऊर्जा का प्रयोजन है अगली स्थितियों (रसायन-संसार, वनस्पति-संसार, जीव-संसार, और आगे मानव-संसार) के लिए उपयोगी होना. मानव को इन ऊर्जाओं का उपयोग करना है, उपलब्धियां पाना है, उनके स्त्रोत को बनाए रखते हुए, तथा जिससे प्रदूषण न हो. तथा इन ऊर्जाओं का मानव-चेतना, देव-चेतना, और दिव्य-चेतना पूर्वक जीने में प्रयोग करना है.
“साम्य-ऊर्जा समस्त जड़-चैतन्य वस्तुओं को प्राप्त है.” आज प्रचलित-विज्ञान इस मुद्दे को पढ़ाने योग्य नहीं है. पहले कदम पर ही आज का विज्ञान गलत है – तो उसके आगे सही होने का रास्ता कहाँ है? मूल में ही हम भटके हैं तो सही होने की जगह कहाँ है? इस तरह चल कर गलतियों का मानव ने अंत-विहीन तरीके से अनुसंधान किया है. सहीपन के लिए कितने लोगों ने अपना सर लगाया?
कार्य-ऊर्जा की उपयोगिता को लेकर मानव ने जो भी काम किया वह साहसिक है. पर स्त्रोत को मिटा कर कार्य-ऊर्जा का उपयोग करना गलत हो गया, अपराधिक हो गया. जिसके फलस्वरूप ही प्रदूषण आना आदि हो गया. ऊर्जा तो मनुष्य को चाहिए. मानव ही अस्तित्व में सभी वस्तुओं के उपयोग और दुरूपयोग करने के अधिकार से संपन्न है. सदुपयोग पूर्वक विकास होता है. दुरूपयोग पूर्वक ह्रास होता है. अभी तक मानव में दुरूपयोग किया. सदुपयोग करने के लिए सद-बुद्धि चाहिए. मानव-चेतना से सद-बुद्धि की शुरुआत है.
सभी मनुष्य अपनी उपयोगिता प्रमाणित होने की इच्छा में ही जीना चाहते हैं. प्रयोजन पता नहीं होने पर परेशान होते ही हैं. उस परेशानी को दूर करने के लिए हम प्रस्ताव रखे हैं. जड़-प्रकृति साम्य-ऊर्जा में किस तरह संपृक्त है, और कार्य-ऊर्जा के रूप में किस प्रकार काम करता है, उसको स्पष्ट करने का कोशिश किया है. साम्य-ऊर्जा सम्पन्नता वश क्रियाशीलता, क्रियाशीलता वश कार्य-ऊर्जा तैयार हुई. यह क्रियाशीलता संतुलन के अर्थ में है. मानव के अलावा शेष प्रकृति संतुलन के अर्थ में ही क्रियाशील है. मानव संतुलन और असंतुलन दोनों अर्थों में क्रियाशील दिखाई देता है. अस्तित्व में स्वयं असंतुलित रह कर असंतुलन फैलाने वाला मानव ही है. संतुलित रह कर नियम, नियंत्रण, संतुलन, न्याय, धर्म, सत्य को प्रमाणित करने वाला भी केवल मानव ही है. मानव का संतुलित क्रियाकलाप मानव-चेतना, देव-चेतना, और दिव्य-चेतना है. जो चाहते हैं, वही अपनाएं.
1. समझदारी से समाधान
2. श्रम से समृद्धि
3. अखंड-समाज से अभय
4. सार्वभौम-व्यवस्था से सह-अस्तित्व
इन चारों को प्रमाणित करने वाला केवल मानव है. इनको न जानवर प्रमाणित करेगा, न झाड़ करेगा, न मिट्टी-पत्थर करेगा.

औकात हो तो हेल्दी कम्पटीशन करो.

निजीकरण करो भाई कौन रोक रहा है ? लेकिन फिर अपनी जमीन खरीदो!अपनी पटरी बिछाओ! सिग्नलिंग सिस्टम लगाओ! स्किल्ड स्टाफ को नौकरी दो!अपना इंजन कारखाना लगाओ!अपनी बोगी बनाओ! फिर ट्रेन चलाओ !स्टेशन बनाओ!जितना विकसित करने का मन करे करो!स्वर्ग से सुंदर बना दो! user charge लो!चाहे उधर ताकने पर भी पैसा वसूलो!कौन रोक रहा है भाई ?
हमारा बूता होगा तो तुम्हारे स्टेशन से तुम्हारी ट्रेन पकड़ेंगे और औकात से बाहर होगा तो अपनी पुरनिया छुकछुकिया पे जाके बैठ जाएंगे! जिसे हमारे बाप दादा अपना टैक्स देकर धीरे धीरे इक्कठा करके बनाये है |
औकात हो तो हेल्दी कम्पटीशन करो ...! अपना parallel मॉडल रखो हमारे मॉडल के सामने , केवल एक रुट बनाने में फेंचकुर न फेंक दिए तो कहना ....चोट्टे :

बालीबुड के अंदर

सोशल मीडिया का एक सकारात्मक पहलू यह है कि जिसे दुनिया सभ्य समाज का आईना समझती रही, उस बालीबुड के अंदर पनपती अनैतिक सड़ाँध और असामाजिक तत्वों को उजागर किया है ! इसके साथ ही कुछ पगलैट, नशेड़ी,गंजेडी,अय्यास, बाचाल अभिनेता अभिनेत्रियों ने बजबजाते निक्रिष्ट फिल्मी समाज पर कीटनाशक स्प्रे करने का काम किया है!

बुधवार, 16 सितंबर 2020

*बैसाखी* एक कहानी...

*बैसाखी* एक कहानी..... जो हरएक भारतीय को जातीय आरक्षण के बारे में सोचने पर मजबूर कर देगी....
रात के समय एक आदमी को उसके घर वाले अस्पताल ले कर आये,शायद उसके पैर की हड्डी में फ्रैक्चर था.मरीज का फ्रैक्चर गंभीर नहीं था,अत: कुछ दिनों बाद उसे छुट्टी दे दी गयी! पर घर पर ही रहने की सलाह दी गयी !चूंकि वो बिना सहारे के चल पाने में असमर्थ था अतएव डॉक्टरों ने इस समस्या के हल के रूप में उसे सरकारी अस्पताल से मुफ़्त में मिलने वाली एक बैसाखी देते वक़्त समझाया कि -
" यह बैसाखी सरकारकी तरफ से है इसलिए इसकी संख्या व सीमा निर्धारित है!जब आप खुद से चलने में समर्थ हो जाएं तो इसे लौटा दें ताकि यह भविष्य में आने वाले आप जैसे अन्य लोगों के भी काम आ सके".
तदुपरांत वह आंशिक अपंग दवा की पर्ची लेकर दवाएं लेने सरकारी दवाखाने पंहुचा! वहां लाइन में लग गया!लाइन में लगे बाकि लोगो ने जब उसके पैर में प्लास्टर बंधा देखा और बैसाखी के सहारे विवश खड़े देखा तो मानवता के चलते उसे सबसे आगे भी जाने दिया और उसे दवा जल्द मिल गयी !
अब उसे स्टेशन जाना था तो ऑटो पकड़ने पंहुचा. ऑटो रुकी तो ऑटो वाले ने उसकी लाचारी देखते हुए उसका सामान उठा कर आटो में रख दिया और उसको भी चढ़ने में मदद कि और हिफाजत से स्टेशन छोड़ा!
ट्रेन में चढ़ते वक्त बहुत भीड़ थी,बैठने की जगह ना होने से खड़ा रहना पड़ा!किंतु कुछ लोगो ने देखा कि बेचारा अपंग बैसाखी के सहारे खड़ा है,तो एक आदमी ने उठ कर उसे तत्काल अपनी सीट दे दी और वह अपंग व्यक्ति अपने घर आराम से पहुच गया !
कुछ दिनों में उसकी मेडिकल लीव भी ख़त्म हो गई,चूंकि ऑफिस जाना था,अतएव सुबह तैयार हो के बाहर निकला और बस का वेट करने लगा. पड़ोसी ने देखा कि एक बेचारा बैसाखीके सहारे चल रहा है तो उसेऑफिस तक अपने स्कूटर पर छोड़ दिया!
इतने दिन बाद ऑफिस पंहुचा था तो काम बहुत था! लेकिन ऑफिस सहकर्मियों ने भी उसके लाचारी पर सहानभूति दिखाई और उसके ज्यादातर काम करके उसका भी हाथ बटाया!ऑफिस में भी उसको आराम रहा !
घर लौटा तो साथ वालेने घर तक छोड़दिया!
चूंकि उस आंशिक चोटग्रस्त का यह दिन बड़े आराम से बीता था,इसलिए उसके दिमाग में कुछ उपद्रव पनपने लगा!
वह सोचने लगा....
"अगर मैं ठीक ना होने का नाटक करूं तो ऐसे ही लोगों की सहानभूति मिलती रहेगी".
"या फिर ये बैसाखी ही ना छोड़ूं तो ?? तो सारे काम आसानी से होते रहेंगे".
और फिर ये बैसाखी अपने बच्चे को दे दूं तो..??वो भी मेरी तरह फायदा उठा पायेंगे!
उसके दिल में कपट आ गया और फिर उसने अस्पताल में बैसाखी वापस नहीं की !
ऐसे ही और भी कई मरीजों ने किया होगा! और कुछ दिनों में ही सरकारी बैसाखियां जो लोगो के मदद के लिए थी ख़त्म हो गयी !तनाम बैसाखियां चंद लोगो की व्यक्तिगत सुख साधन बन चुकी थी! और वे अपने बच्चों को भी यह बैसाखी थमाने का प्लान बना चुके थे!जबकि उनके बच्चे अपंग या असहाय नही थे!दूसरी ओर हजारों लाखों उसके जैसे दूसरे मरीज़ अब भी बैसाखियों के आस लगाये बैठे हैं!सहज ही प्रश्न उठता है किआखिर कब तक लोग उसके झूठ को सहते रहेंगे और अनदेखा करते रहेंगे!अत: एक न एक दिन विरोध तो होना ही था!
फिर आगे क्या हुआ वो हम सब ( याने देश की जनता) देख भी रहे हैं !और महसूस भी कर रहे हैं!