बुधवार, 9 नवंबर 2022

सतगुरु नानक परगट्या,

 सतगुरु नानक परगट्या,मिटी धुंध जग चाणनअा !

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"धन्य धन्य सतगुरू नानकदेव जी, आपके अवतरण उपरांत अंधेरा मिट गया है और यह सारा जगत आलोकित हो रहा है!" 553 वीं जयंति पर सादर प्रणाम गुरुदेव...
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अपराधवृत्ति के नियन्त्रण हेतु...

 शतेन पाशैरभि धेहि वरुणैनं मा ते मोच्यनृतवाङ् नृचक्षः ।

आस्तां जाल्म उदरं श्रंसयित्वा कोश इवाबन्ध: परिकृत्यमानः ॥
(अथर्ववेद ४.१६.७)
अर्थात् - “हे वरुण ! आप इस शत्रु को पाश (रस्सी) से पूरी तरह भली प्रकार से बाँध लें (अभिधेयार्थ = एक सौ रस्सियों से भली प्रकार बाँध ले । यह आपके सुदृढ़ बन्धन से नहीं छूटे । असत्य बोलने वाला यह जुल्मी (निष्ठुर, कुकर्मी, घृणित कर्म करनेवाला) अँधे मनुष्य की भाँति नहीं देखता हुआ अपने पेट को सिकोड़कर अर्थात् बाहरी सम्बन्धों से कटा रहकर कारागार में निरुद्ध हुआ सा अपने द्वारा किये जाने वाले कर्मों से विमुख होकर पड़ा रहे ॥”
इस प्रकार वेदवाणी धर्मपथ (आचरण के नियम और दण्डविधान) से जनमानस को अवगत करने का दायित्व धर्माचार्यों के माध्यम से शासन-व्यवस्था पर सौंपती है । अपराधवृत्ति के नियन्त्रण हेतु अपराध के प्रति असहिष्णुता को अपनाने का विधान करती है तथा धर्मपथ का ज्ञान होने एवं आत्मसुधार का अवसर प्रदान करने के उपरान्त भी अपराधी द्वारा आत्मसुधार नहीं करने पर श्रुति उसे ‘कठोर दण्ड’ द्वारा दण्डित करने का उपबन्ध करती है कि- ‘इन्द्र ऐसे अपराधी को बाँधकर अपने वज्र द्वारा उनका शिरच्छेदन कर देवे’- ‘अथैषामिन्द्रो वज्रेणापि शीर्षाणि वृश्चतु ।’ (अथर्ववेद १.७.७)

*मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ कल्पना का नाम 'ईश्वर 'है !*

सैकड़ों साल पहले जब नीत्से ने कहा था कि ''ईश्वर मर चुका है '' तब फेस बुक ,ट्विटर और वॉट्सअप नहीं थे , वरना साइंस पढ़े -लिखे और साइंस को ही आजीविका बना चुके धर्मांध सपोले उस 'नीत्से' को भी डसे बिना नहीं छोड़ते। आज चाहे आईएसआईएस के खूंखार जेहादी हों ,चाहे पाकिस्तान प्रशिक्षित कश्मीरी आतंकी हों ,चाहे जैश ए मुहम्मद और सिमी के समर्थक हों या जिन्होंने दाभोलकर,पानसरे ,कलबुर्गी और अखलाख को मार डाला ऐंसे स्वयम्भू कट्ररपंथी हिंदुत्ववादी हों ये सबके सब 'नीत्से' की स्थापना के जीवन्त प्रमाण हैं।
मानव सभ्यता के इतिहास में बेहतरीन मनुष्यों द्वारा आहूत उच्चतर मानवीय मूल्यों को धारण करने की कला का नाम 'धर्म' है !मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ कल्पना का नाम 'ईश्वर' है। भारतीय वांग्मय के 'धर्म' शब्द का अर्थ 'मर्यादा को धारण करना' माना गया है। जबकि दुनिया की अन्य भाषाओं में 'मर्यादा को धारण करना'याने 'धर्म' शब्द का कोई वैकल्पिक शब्द ही नहीं है। जिस तरह मजहब ,रिलिजन इत्यादि शब्दों का वास्तविक अर्थ या अनुवाद 'धर्म' नहीं है। उसी तरह 'परमात्मा या ईश्वर जैसे शब्दों का अभिप्राय भी अल्लाह या गॉड कदापि नहीं है।

कुरान के अनुसार 'अल्लाह' महान है और मुहम्मद साहब उसके रसूल हैं तथा अल्लाह ही कयामत के रोज सभी मृतकों के उनकी नेकी-बदी के अनुसार फैसले करता है।इसी तरह बाईबिल का 'गॉड ' भी अलग किस्म की थ्योरी के अनुसार पूरी दुनिया का निर्माण महज ६ दिनों में करता है और अपने 'पुत्र' ईसा को शक्ति प्रदान करता है की धरती के लोगों का उद्धार करे। जबकि गीता ,वेद और उपनिषद का कहना है की 'आत्मा ही परमात्मा है' ''तत स्वयं योग संसिद्धि कालेन आत्मनि विन्दति''या ''पूर्णमदः पूर्णमिदम ,पूर्णात पूर्णम उदचचते। पूर्णस्य पूर्णमादाय ,पूर्णम एवाविष्य्ते '' याने प्रत्येक जीवात्मा का अंतिम लक्ष्य अपनी पूर्णता को प्राप्त करना है ,अर्थात परमात्मा में समाहित हो जाना है।

इस उच्चतर दर्शन को श्रेष्ठतम मानवीय सामाजिक मूल्यों से संगति बिठाकर जो जीवन पद्धति बनाई गयी उसे 'सनातन धर्म' कहते हैं। कालांतर में स्वार्थी राजाओं ,लोभी बनियों और पाखण्डी पुरोहितों ने अपने निजी स्वार्थ के लिए धर्मको शोषण-उत्पीड़न का साधन बना डाला। उन्होंने पवित इस धर्म को जात -पांत ,ऊंच -नीच घृणा ,अहंकार और अनीति का भयानक कॉकटेल बना डाला जिसे सभी लोग अब 'अधर्म' कहते हैं। इस अधर्म में जब अंधराष्ट्रवाद और धर्मान्धता का बोलवाला हो गया तब कार्ल मार्क्स ने उसे अफीम कहा था । धर्म-मजहब की यह अफीम इन दिनों पूरी दुनिया में इफरात से मुफ्त में मिल रही है। श्रीराम तिवारी !

उसे सूली पर लटका आया हूँ

अपना विवेक ताक़ पर रख आया हूँ

दिल चट्टान तले दबा आया हूँ
जी, धुंध में खो दी हैं आँखें
संवेदना तार पर सुखा आया हूँ
जी, सत्य की औक़ात ही क्या है
उसे सूली पर लटका आया हूँ
जी, जीवित हूँ औरों की तरह
इंसानियत दफ़्न कर आया हूँ !

ख्वाहिशों से नहीं गिरते फूल झोली में,
कर्म की शाख को भी हिलाना पड़ता है।
मात्र अंधेरे को कोसने से कुछ नहीं होता,
दिया अपने हिस्से का खुद जलाना पडता है।"

हिंदी कविता का एंग्री यंगमैन -धूमिल

 हिंदी कविता का एंग्री यंगमैन-

धूमिल के जन्मदिन पर उनकी यादों का कारवाँ...
हिंदी कविता के एंग्री यंगमैन-सुदामा पांडे जो हिंदी साहित्य जगत में धूमिल के नाम से मशहूर हुए,जिनकी कविताओं में आजादी के सपनों के मोहभंगकी पीड़ा और आक्रोश की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है.व्यवस्था जिसने जनता को छला है,उसको आइना दिखाना मानों धूमिल की कविताओं का परम लक्ष्य रहा है.इसलिए उन्होंने कहा-
"क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है, जिन्हें एक पहिया ढोता है या इसका कोई मतलब होता है?"
धूमिल का जन्म वाराणसी के पास खेवली गांव में हुआ था.धूमिल का जन्म नौ नवंबर, 1936 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के खेवली गांव में माता रसवंती देवी के गर्भ से हुआ था.३८ वर्ष की अल्पायु में ही ब्रेन ट्यूमर से उनकी मृत्यु हो गई.उनके परिजन रेडियो पर उनके निधन की खबर सुनने के बाद ही जाना कि वे कितने बड़े कवि थे.
धूमिल के जीवित रहते 1972 में उनका सिर्फ एक कविता संग्रह प्रकाशित हो पाया था- संसद से सड़क तक. ‘कल सुनना मुझे’ उनके निधन के कई बरस बाद छपा और उस पर 1979 का प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार उन्हें मरणोपरांत दिया गया. बाद में उनके बेटे रत्नशंकर की कोशिशों से उनका एक और संग्रह छपा- सुदामा पांडे का प्रजातंत्र.आज उनके जन्मदिन पर उनकी इस लोकप्रिय कविता को याद करें------
एक आदमी रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं
यह तीसरा आदमी कौन है
और मेरे देश की संसद मौन है…

द्वंदात्मक भौतिकवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद मार्क्सवादी दर्शन ....

 द्वंदात्मक भौतिकवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद मार्क्सवादी दर्शन के अभिन्न अंग हैं-

मार्क्सवादी दर्शन उन्नीसवीं सदी के लगभग मध्य में प्रकट हुआ। किन्तु इसने प्रकृति और समाज के विकास के नियमों का उद्घाटन कर प्राकृतिक और सामाजिक विज्ञान की विविध शाखाओं के अध्ययन को एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया।
दर्शनों की बातें प्रायः अटकलें ही रह जाती यदि विज्ञान की कसौटी पर वह खरी न उतरती।मार्क्सवादी दर्शन की बहुत बड़ी विशेषता यह है कि उसके निष्कर्षों को विज्ञान ने सत्यापन कर प्रमाणित कर दिया !
ऐसा नहीं है कि मार्क्स के पहले के सभी दार्शनिकों की सारी बातें असत्य थीं। लेकिन उन सबकी एक कमजोरी यह थी कि वह सभी मूलतः आदर्शवादी (आध्यात्मवादी, विचारवादी और प्रत्ययवादी और भाववादी आदि) थे।
यहां तक कि मार्क्स के पहले के भौतिक वादी भी भाववादी ही थे।वह प्रकृति के रहस्य का उद्घाटन तो भौतिकवादी नजरिए से करते थे किन्तु मनुष्य ,मानव समाज और उसके इतिहास का अध्ययन करते समय भाववादी या आदर्शवादी हो जाते थे।अर्थात यह मानते थे कि समाज अच्छे अच्छे विचारों से ही चलता है।इसके उलट मार्क्सवाद व्यवस्था के बदलाव के साथ ही अच्छे विचारों की सार्थकता की बात करता है।
लुडविग फायर बाख जैसे भौतिक वादी ने भी मानव समाज का अध्ययन भाववादी नजरिए से ही किया था।उसने प्रकृति के मामले में तो वस्तु को प्राथमिकता दी किन्तु समाज के मामले में चेतना को।
मार्क्स ने वस्तुगत या पदार्थिक और चेतना दोनों को प्राकृतिक कहा। वस्तु और चेतना दोनों को महत्व दिया।किन्तु वस्तु यावस्तुगत स्थिति को प्राथमिक और चेतनाको द्वितीयक माना।वस्तु को आधार और चेतनाको शिखर माना।
मार्क्स ने यह माना कि चेतना या भाव वस्तु से उपजते हैं.वस्तु ही चेतना को प्रभावित करती है ! किन्तु अपनी बारी में चेतना भी वस्तु पर अपना असर डालती है, उसे प्रभावित करती है।
मार्क्सवादी दर्शन की एक मौलिक बात यह है कि वस्तु चेतना से वह सदा स्वतंत्र होती है ,किन्तु चेतना वस्तु से स्वतंत्र नहीं होती।वस्तु चेतना के बाहर अस्तित्व रखती है।किन्तु चेतना वस्तु के नियमों को समझ कर उसे नियंत्रित कर सकती है।#(#न्यूटन के गतिज नियम )
:-श्रीराम तिवारी

गुरुवार, 3 नवंबर 2022

आपने सिर्फ नफरत करना सीखा है

 फ़र्ज़ कीजिये आप चाय का कप हाथ में लिये खड़े हैं और कोई आपको धक्का दे देता है तो क्या होता है? आपके कप से चाय छलक जाती है। अगर आपसे पूछा जाए कि आपके कप से चाय क्यों छलकी तो आपका जवाब होगा कि मुझे धक्का दिया।

ग़लत जवाब! सही जवाब ये है कि आपके कप में चाय थी इसलिये छलकी। आपके कप से वही छलकेगा जो उसमें है। इसी तरह जब ज़िंदगी में हमें धक्के लगते हैं लोगों के व्यवहार से, या हमारे मज़हब पर कोई टिप्पणी की जाती है हमारी मज़हबी जज़्बात को तकलीफ पहुंचती है तो उस वक़्त हमारी असलियत ही छलकती है।
आपका असल उस वक़्त तक सामने नहीं आता जब तक आपको धक्का ना लगे। तो देखना है कि जब आपको धक्का लगा या आपके मज़हबी जज़्बात को ठेस पहुंची तो क्या छलका; सब्र, ख़ामोशी, रवादारी, सम्मान, इंसानियत या जुनून, गुस्सा, नफरत या हिंसा।
आपके अंदर से वही छलकेगा जो आपने भरा हुआ है अपने अंदर एक काल्पनिक खुदा और उसके तथाकथित पैगंबर के नाम पर। आपने सिर्फ नफरत करना सीखा है। आप इंसानियत और मुहब्बत का दावा करते हैं लेकिन वे सारे झूठे साबित हुए हैं हर बार।
मज़हब के नाम पर आपने अपने अंदर नफरत, गुस्सा भरा हुआ है। आप मज़हब से बाहर निकल कर सोचने समझने की जहमत नहीं करना चाहते।
इंतज़ार करें उस दिन का जब दुनिया कहेगी कि इंसानियत और साम्प्रदायिकता दोनों अलग अलग हैं।

शब्द' के हाथ न पांव!

 शब्दों के दांत नहीं होते

लेकिन शब्द जब काटते हैं
तो दर्द बहुत होता है!और कभी कभी
घाव इतने गहरे हो जाते हैं की
जीवन ही समाप्त हो जाता है
परन्तु घाव नहीं भरते....!


'शब्द' 'शब्द' सब कोई कहे,
'शब्द' के हाथ न पांव!
एक 'शब्द' 'औषधि" करे,
एक 'शब्द' 'सौ' 'घाव"!!

साहिलकी तमन्ना कौन करे !

 एक ज़माना था जब हर तरक्की पसंद शायर की एक नज़्म उसका ट्रेडमार्क बन जाती थी जैसे 'मजाज़' का ट्रेडमार्क उनकी नज़्म 'आवारा' थी। उसी तरह उनके समकालीन मोइन एहसान 'जज़्बी' की नज़्म 'मौत' उनका ट्रेडमार्क थी।

अलीगढ़ में जज़्बी साहब से मिलने जुलने का थोड़ा बहुत मौका मिला था। उस जमाने में वो अलीगढ़ के ही नहीं बल्कि उर्दू के बहुत सीनियर शायरों में शुमार किए जाते थे।
जज़्बी साहब ने एक वाक्य बताया था। रोजगार और काम की तलाश में वो मुंबई पहुंचे थे लेकिन न कोई काम मिला और न कोई नौकरी।
तीन दिन से खाने को कुछ नहीं मिला था। चौपाटी में समंदर के किनारे रेत पर लेटे हुए थे और दिमाग में यह ख्याल आ रहा था के इस तबाह हाली में मौत तक हो सकती है। बस यह ख्याल आते ही एक मिसरा कानों में गूंजने लगा था। शेर हुआ था। फिल्म ग़ज़ल भी हुई थी।
इलाही मौत न आए तबाह हाली में
ये नाम होगा ग़में रोज़गार सह न सका
..............
लेकिन वक्त बदला उनकी एक ग़ज़ल फिल्म में ले ली गई। उनका बड़ा नाम हुआ !
नीचे दी गयी उनकी ग़ज़ल गायक किशोर कुमार का पहला एकल गीत फिल्मी ज़िद्दी (1948) में थी। यह फ़िल्म इस्मत चुगताई की एक कहानी पर आधारित थी। इसमें मुख्य नायक के रूप में देव आनंद ने कैरियर की शुरुआत की थी।
बाद में जज़्बी साहब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में जीवन भर पढ़ाते रहे।
मरने की दुआएँ क्यूँ माँगूँ जीने की तमन्ना कौन करे !
ये दुनिया हो या वो दुनिया ख़्वाहिश-ए-दुनिया कौन करे !!
कश्ती साबित-ओ-सालिम साहिल की तमन्ना किसको थी,
अब ऐसी शिकस्ता कश्ती पर साहिलकी तमन्ना कौन करे !
जो आग लगाई थी तुम ने उस को तो बुझाया अश्कों ने!
जो अश्कों ने भड़काई है उस आग को ठंडा कौन करे !!
दुनियाने हमको छोड़ा 'जज़्बी' हम छोड़ न दें क्यूँ दुनिया को?
दुनिया को समझ कर बैठे हैं अब दुनिया दुनिया कौन करे ?
उनकी ट्रेडमार्क नज़्म
मौत
मुईन अहसन जज़्बी
अपनी सोई हुई दुनिया को जगा लूँ तो चलूँ
अपने ग़म-ख़ाने में इक धूम मचा लूँ तो चलूँ
और इक जाम-ए-मय-ए-तल्ख़ चढ़ा लूँ तो चलूँ
अभी चलता हूँ ज़रा ख़ुद को सँभालूँ तो चलूँ
जाने कब पी थी अभी तक है मय-ए-ग़म का ख़ुमार
धुँदला धुँदला नज़र आता है जहान-ए-बेदार
आँधियाँ चलती हैं दुनिया हुई जाती है ग़ुबार
आँख तो मल लूँ ज़रा होश में आ लूँ तो चलूँ
वो मिरा सेहर वो एजाज़ कहाँ है लाना
मेरी खोई हुई आवाज़ कहाँ है लाना
मिरा टूटा हुआ वो साज़ कहाँ है लाना
इक ज़रा गीत भी इस साज़ पे गा लूँ तो चलूँ
मैं थका हारा था इतने में जो आए बादल
किसी मतवाले ने चुपके से बढ़ा दी बोतल
उफ़ वो रंगीन पुर-असरार ख़यालों के महल
ऐसे दो चार महल और बना लूँ तो चलूँ
मुझ से कुछ कहने को आई है मिरे दिल की जलन
क्या किया मैं ने ज़माने में नहीं जिस का चलन
आँसुओ तुम ने तो बेकार भिगोया दामन
अपने भीगे हुए दामन को सुखा लूँ तो चलूँ
मेरी आँखों में अभी तक है मोहब्बत का ग़ुरूर
मेरे होंटों को अभी तक है सदाक़त का ग़ुरूर
मेरे माथे पे अभी तक है शराफ़त का ग़ुरूर
ऐसे वहमों से ज़रा ख़ुद को निकालूँ तो चलूँ

काहे की धर्मनिरपेक्षता ?

 भारत में जब हर एक राजनैतिक पार्टी, हर चुनाव क्षेत्र में जाति धर्म के आधार पर उम्मीदवार खड़ा करती है,चुनाव प्रचार में मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने से नही हिचकती और मतदाता भी जाती धर्म के आधारपर सिर्फ टैक्टि्कल वोटिंग करते हैं तो फिर काहे की धर्मनिरपेक्षता? दरसल भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्षता और समाजवादी गणतंत्र होने की घोषणा करता है, किंतु वह सिर्फ संविधान की किताब में बंद है!

जिस तरह अमेरिका, इंग्लैंड, इजरायल की लोकतांत्रिक व्यवस्था में धर्मनिरपेक्षता सिर्फ दिखावे की उद्घोषणा मात्र है,उसी तरह अल्पसंख्यकों के अलगाववाद ने टैक्टिकल वोटिंग करके भारत के बहुसंख्यक हिंदू समाज को जबरन दक्षिणपंथी रूढ़ीवादी समाज व्यवस्था के गड्ढे में धकेल दिया है अब तो धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के खंडहर बता रहे हैं कि इमारत *लाख का महल* थी ,जिसमें भारतीय संविधान के नीतिनिर्देशक सिद्धांत रूपी पांडव जलकर खाक हो गये हैं!