शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

आतंकवाद की कोरी शाब्दिक निंदा का मतलब है किसान ने खुरपी फेंक दी है !



मानसून आने पर किसान खरीफ -फसल की बोनी करता है। इससे पहले कि खेत में बोये गए बीज अंकुरित हों , घास - खरपतवार' इत्यादि  अनावश्यक पौधे  पहले से ही उगने लग जाते हैं। खेत में बोये गए अन्न-धान या बीज की  बढ़वार के सापेक्ष घास- 'खरपतवार' की  बढ़त बड़ी तेजी से होती ही। लेकिन किसान अपना काम-धाम छोड़कर गाँव की चौपाल पर जाकर उस दुष्ट घास- खरपतवार की  बढ़त का रोना नहीं रोता। बल्कि खुरपी लेकर उघारे बदन खेतों में खटकर उस 'आतंकी' खरपतवार को उखाड़ फैंकता है। इतना ही नहीं वह घास-खरपतवार नाशक दवा का छिड़काव भी करता है। वह निरंतर खेत में खड़ी फसल की रखवारी भी करता है। तब  महिनों की मशक्कत के बाद जाकर कहीं अन्न -धान की  फसल के दर्शन हो पाते हैं।इंसानियत की खेती भी इसी तरह बहुत कठिन है। जबकि शैतानियत और अमानवीयता के लिए सब कुछ सहज अनुकूल है।

इसी तरह धरती  के विभिन्न राष्ट्रों -समाजों और सम्प्रदायों में इंसानियत अथवा मानवता का बीजारोपण करने में, अमन -शांति ,स्वतंत्रता,समानता,धर्मनिरपेक्षता ,लोकतंत्र और अहिंसा के बीज वपन में अनेक दुशवारियाँ पैदा हुआ करतीं हैं। आर्थिक असमानता,शोषण-उत्पीड़न,अन्याय -अत्याचार की खरपतवार और मजहबी आतंकवाद की गाजरघास  निरंतर उगती रहती है। मानवतावाद की खेती करने वाले दुनियावी शासकों की यह जिम्मेदारी है कि इस अमानवीय गाजरघास और खरपतवार को उखाड़ फैंकने में वे 'अमनपसंद' जनता का मार्गदर्शन करें! इस  मजहबी आतंक रुपी खरपतवार और गाजरघास ने दो-तिहाई दुनिया को कवर आकर लिया है। मानवता, का दम  घुट रहा है।कभी अमेरिका,कभी अफ्रीका,कभी यूरोप ,कभी एसिया , कभी ब्रुसेल्स ,कभी ऑर्लेंडो ,कभी इस्ताम्बूल, कभी पेरिस,कभी लन्दन,कभी मुंबई, कभी काबुल,कभी ढाका और कभी नीस [फ़्रांस] में आतंकवाद ने इंसानियत को शर्मशार किया है। इस नृशंस नरसंहार की ,मजहबी कटटरवाद -आतंकवाद की कोरी शाब्दिक निंदा  का मतलब है ,किसान ने खुरपी फेंक दी है। वह गाँव की चौपाल पर जाकर, गाजरघास-खरपतवार' की बढ़वार पर  ढिंढोरा पीटने का उपक्रम कर रहा है। आतंकवाद से पीड़ित देशों के शासक उसी खुरपी फेंकू प्रमादी किसान की तरह केवल आतंकवाद को शब्दों में कोस  रहे है हैं।   -:श्रीराम तिवारी :-  

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