शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

वर्तमान मीडिया पर दोहे :-

         वर्तमान  मीडिया पर दोहे :-


                 टी वी चेनल मीडिया ,सचिन क्रिकेट संन्यास।

                 'भारत रत्न 'ब्रह्मास्त्र अब ,कांग्रेस की आस।।


                 सुरा- सुंदरी- सम्पदा,सिस्टम के   गुलफाम।

                  ख़ाक करे वो  'तहलका' , जो खुद नंगा हम्माम ।। 


                  जिन  हाथों में मीडिया ,नैतिकता  के बोल ।

                 तरुण -तेज के कृत्य से  ,खुली ढोल की  पोल।।


                 सब चेनल में छा रहे ,आसाराम एंड  सन्स।

                  इनसे पीड़ित  लड़कियाँ ,भोग रहीं  सब  दंश।।

              
                    मोदी -राहुल -सोनिया ,मनमोहन- शिवराज।

                     दिग्गी- बैनी - बोलते  ,अनचाहे अल्फाज।।


                    छप्य -दृश्य -पठ -मीडिया, पसर चुका चहुँ ओर।

                    प्रतिस्पर्धा क्षितिज पर ,विज्ञापन की भोर।। 


                      पूंजीवादी  मीडिया ,भृष्टाचार का बाप।

                     पीछे  पड़ा जो  'आप' के , वो अन्ना  अभिशाप।।



                                                          श्रीराम तिवारी -

                                                 १४-डी ,एस-४ ,स्कीम -७८

                                                'अरण्य ' विजयनगर। इंदौर।






                  

2 टिप्‍पणियां:

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  2. मुझे वोट डालना आता है __ मैंने वोट ड़ाल दिया_ ८ -९ तारीख को क्या होगा_ मुझे क्या ? सब के कहने पर आम नागरिक का कर्त्तव्य निभाया__ मुझे 'राम मंदिर' से क्या लेना देना__ मैं तो सुबह काम के लिए निकलते समय सभी मंदिर-मस्ज़िद-गुरूद्वारे-चर्च के आगे शीश झुकाता निकल जाता हूँ_ मैं अंदर जाकर क्या करूंगा_ मेरे पास समय भी नहीं है और न मैं उन लोगों जितना समझदार हूँ कि इबादत कैसे की जाती है__ मुझे नहीं मालूम कि रोड पर मस्ज़िद या मंदिर आने से क्या-क्या बाधाएं आती हैं_ मैं तो कच्चे रास्ते की धूल में अपनी फिक्र को उडाता हुआ चला जाता हूँ_ कल बस्ती मैं शराब बटीं, रोज कि तरह मैंने भी पी ली_ सरकार किसी की भी हो, दोनों अपना धर्म निभाती आ रहीं हैं-- कितने अच्छे हैं ये लोग_ भूखे पेट तो नींद नहीं आती लेकिन इनके द्वारा प्रायोजित नीलाम की गई दुकानो से प्राप्त सोमरस द्वारा भूख का पता भी नहीं चलता_ सपने भी अच्छे आते हैं_ अलसाया हुआ सुबह-सुबह वोट डालने गया_ भीड़ भी नहीं थी_ रात में परोसा गया सोमरस किसके द्वारा आया यह भी मुझे याद था_ लेकिन अचानक वोट डालते समय जोरदार 'भूख की याद' आ गई _होश में था ना_ 'नोटा' तक ही जैसे तैसे बेहाल 'भूखी-नंगी' ऊँगली पहुंची_ मैं भूख से प्रभावित, महंगाई से ग्रसित एक आम जवाबदार नागरिक था_ मैंने दोनों प्रमुख पार्टियों में से कोई भी नाराज़ न हो, इसलिए 'नोटा' बटन दबा दिया_ क्योंकि दोनों पार्टियां गरीबी हटाएं या न हटाएं _ सोमरस कि आसान उपलब्धि के द्वारा हमें नींद की दवा तो अच्छी देती है_ वास्तव में कौन लोग हमारे हितेषी हैं यह भी दोनों सोचने नहीं देते_ क्योंकि ये लोग इतने अच्छे हैं कि सोचने का टेंशन भी नहीं देना चाहते_ साथ में पञ्च वर्ष में एक पर एक फ्री_ मैं हूँ एक बहुसंख्यक अति गरीब आदमी। (by Yeshwant Kaushik, Indore)

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