विगत सप्ताह एक दिन दोपहर के बाद वातावरण में ठंडक बढ़ चली थी ,कमरे का तापमान लगातार नीचे लुढ़कने लगा था और बाहर की सुखद सहनीय धूप ने मानों आसपास के वातावरण को उन्मादी बना दिया हो। दिन का तापमान खुशनुमा हो चला था । मानों कवि सेनापति कह रहे हों कि
"शिशिर में शशि को सरूप पावे सविताहु ,घामहुँ में चांदनी की दुति दमकत है"।
कभी मोबाईल पर चल रही ग्लोबल ख़बरों पर, कभी अपनी कलाई पर बंधी स्मार्ट वॉच पर नजर डालते हुए मैं अपरान्ह ५ बजे के दरम्यान घर के नजदीक नगर के सर्वश्रेष्ठ गार्डन में वॉकिंग करने जा पहुंचा । चलते -चलते जब थक गया तब एक मानव संचालित झूले पर पैर लटकाकर पैगें भरने लगा । स्मार्ट फोन को ब्लू टूथ से कनेक्ट कर रूस यूक्रेन युद्ध,भारत और अमरीका के बीच तनाव जिओ पॉलिटिक्स पर तीखी बहस सुन रहा था। गार्डन में इक्का-दुक्का स्त्री पुरुष पथ संचलन कर रहे थे। छोटे छोटे सुंदर बच्चे निर्दोष सौंदर्य के मामले में गार्डन के फूलों से स्पर्धा कर रहे थे।
मैं झूला झूलते हुए मोबाईल पर कभी राजनीति,कभी दर्शन,कभी आध्यात्म,कभी पुराने फ़िल्मी गीत इत्यादि विषयों का भी आनंद ले रहा था।तभी अचानक मुझे पैरों में हल्की सी गुदगुदी महसूस हुई। मैनें हड़बड़ाकर पैरों की ओर देखा। किसी अनहोनी की आशंका से घबराकर मैनें देखा एक पाँच वर्षीय सूंदर गौरवर्ण बालक ने मेरे चरण स्पर्श करते हुए माथा टेककर कहा -प्रणाम दादाजी !
सुखद आश्चर्य से आल्हादित, मैंने पुछा - बेटा मेरे पोते तो दिल्ली में हैं,आप मेरे पोते कैसे हुए?
वह अपने रत्नारे नयनों को गोल गोल घुमाकर मंद मंद मुस्कराकर, मेरे प्रश्नों के जबाब न देकर मेरी अधीरतापूर्ण किंकर्तव्यपूर्ण स्थिति के मजे ले रहा था।
प्रश्न का उत्तर न पाकर मैंने उसका नाम पूछा -उसने अपना नाम बताया -आरव ! उसकी खीसें निपोरने की अदा यथावत थी। मैंने अवसर की दुरूह स्थिति का सामान्यीकरण करने के उद्देश्य से बातचीत जारी रखी। किन्तु उसका हर बात में अस्पष्ट जबाब और स्मित मुखड़ा मेरे लिए कठिन पहेली बनता जा था था।
मैंने स्थिति को उसके पक्ष में जाता देख नया दाव चलाऔर पूछा -तुम्हारे मम्मी डैडी कहाँ हैं ?
पापा आर्मी में हैं और "ईस्टर्न फ्रंट की चाइना बार्डर" पर तैनात हैं ! फिर उसने अपने हाथ की तर्जनी उठाकर इशारा किया कि वो जो गार्डेन की बेंच पर बैठी है। मैनें देखा एक सिम्पल सी लड़की जींस टॉप पहने है और किसी कालेज गर्ल की तरह मोबाईल पर बात कर रही है। वहीं उसके सामने गार्डेन की हरी घास पर एक कुत्ता लोट पोट हो रहा था।
मैनें अपनी स्मार्ट बाच पर नजर डाली और झूले को पैरों के ब्रेक से रोका।और छ्ड़ी उठाकर वॉकिंग के लिए चलने को उद्दत हुआ। तभी हमारे नवआगंतुक नए नवेले पौत्र श्री आरवजी* बोल पड़े -दादाजी एक बात कहूं ,बुरा तो नहीं मानोगे ?मैंने तनिक हिचक साथ कहा - ठीक है नहीं मानूंगा।
उसने कुछ झेंपते हुए कुटिल हास्य के साथ पूछा -दादाजी अभी कौन सा सन चल रहा है ?मैं कोई उत्तर देता उससे पहले ही उसने अपने सवाल का उत्तर दिया और कहा की -2025 है न ! मैंने कहा हाँ ! फिर वह अकस्मात् मंद स्वर में बोला -दादाजी -आप 2030 में नहीं रहोगे इससे पहले की मैं आशय समझ पाता ,उस बालक रुपी पोते ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि *2030 में आप ऊपर चले जाओगे।*
ज्योतिषरुपी नवागन्तुक की मर्मघाती भविष्यवाणी से आक्रांत होने के बजाय,मैं हर्षित मन कबीरदास जी का एक दोहा गुनगुनाता हुआ गार्डेन मैं वॉकिंग पर निकल पड़ा।
"जिस मरने से जग डरे, मेरे मन आनंद !
मरने से ही पाऐंगे ,पूरन परमानंद।" {कबीरदास}