महाकाव्य का सृजन करें वर्ण-शब्द-पंक्तियाँ,
बलिदान जनित चादर हो रही तार-तार है।
एकजुट होकर बचा लो नीड़ अपना पंछियों,
बहेलियों का जाल वरना हर तरफ तैयार है।।
सहज नहीं जीवन तुम्हारा सरित सर की मछलियों,
कदम-कदम पर घात में सैंकड़ों घड़ियाल हैं।।
एकजुट होकर बचा लो नीड़ अपना पंछियों,
बहेलियों का जाल वरना हर तरफ तैयार है।।
माली ही चमन को रौंदकर जब खीसें नीपोरता,
फूल-पत्ते-तितलियां पस्त शेष गर्द-ओ-गुबार है।
आत्मायें अमर शहीदों की शोकाकुल स्वर्गस्थ,
आज फिर वही मादर-ए-वतन बेचैन बेज़ार है।।
एकजुट होकर बचा लो नीड़ अपना पंछियों,
बहेलियों का जाल वरना हर तरफ तैयार है।।
ज़र्रे-ज़र्रे पर मेंड़ का क़ब्ज़ा उर्वरा भूमि स्तब्ध,
काबिज़ है स्यार, श्वान, भेड़िये तादाद बेशुमार है।
जागो बुधिजन जागो कविजन जागो हे देशाभिमानी,
जागो वतनपरस्तों जागो अब किसका इंतज़ार है।।
एकजुट होकर बचा लो नीड़ अपना पंछियों,
बहेलियों का जाल वरना हर तरफ तैयार है।।
:-श्रीराम तिवारी
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